Total Pageviews

Showing posts with label Bhopal Talkies. Show all posts
Showing posts with label Bhopal Talkies. Show all posts

Monday, May 5, 2025

Book Review - Bhopal Talkies

महबूब शहर भोपाल की चुटीली दास्तां है- ‘भोपाल टॉकीज_शहर की किस्सागोई’ 

सत्तर के दशक की फिल्म ‘शोले’ का यह डायलॉग बहुत मशहूर हुआ था कि ‘हमारा नाम भी सूरमा भोपाली ऐसई नई है..,’ सोचिए, जब भोपाल से जुड़े एक संवाद ने देशभर में इतनी लोकप्रियता हासिल की थी तो अगर पूरे भोपाल के मिजाज़ को जानने का मौका मिल जाए तो वह कितना जबरदस्त होगा। वैसे भी, कहते हैं न कि सयाने लोग एक चावल से अंदाजा लगा लेते हैं कि बिरयानी कैसी पकी होगी।

जाने माने संचारकर्मी, लेखक और व्यंग्यकार संजीव परसाई की नई किताब ‘भोपाल टॉकीज: शहर की किस्सागोई’ भी भोपाली बिरयानी की तरह लज़ीज़ है। यह हमें इस महबूब शहर के हर जायके से रूबरू कराती है। जब भी भोपाल की बात चलती है तो इस शहर को न केवल अपनी खूबसूरती के लिए बल्कि यहां के लोगों की जिंदादिली और स्वभाव की सहजता के लिए जाना जाता है। 

संजीव ने इसी सरलता को केंद्र में रखकर करीने से तानाबाना बुना है। मूल भोपाली अपनी चटकारेदार भाषा,चुटीली शैली और हंसी मज़ाक में करारा व्यंग्य करने के लिए मशहूर हैं इसलिए जब आप ‘भोपाल टॉकीज: शहर की किस्सागोई’ किताब के पन्ने पलटना शुरू करते हैं तो धीरे-धीरे आप शहर की संस्कृति, किस्सागोई की परंपरा और शहर की आबोहवा में गोता लगाने लगते हैं।

यह किताब और इसके लेख शहद की मिठास और कालीमिर्च के पाउडर के मिश्रण की तरह हैं जो गले में मिठास के साथ होले से झटका देते हुए निकलते हैं और आप बिना वक्त गंवाए एक के बाद एक पन्ने पलटते जाते हैं। करीब 200 पन्नों की यह किताब मोटे तौर पर चार भागों में हमें भोपाल की गलियों, घरों, लोगों, इतिहास, परंपरा और संस्कार से जुड़ी कहानियों की सैर पर ले जाती है।

  ‘रानी कमलापति से बेगमों तक भोपाल के किस्से’ नामक चैप्टर में हमें रानी कमलापति के दौर, बेगम और उनके शासन, भोपाल रियासत का भारत में विलय और रानी कमलापति के साथ हुई गद्दारी से जुड़ी गंभीर बातें हल्के-फुल्के कहानी के अंदाज में पढ़ने को मिलती हैं। वहीं, ‘भोपाल बन बिगड़ रिया है खां’ चैप्टर में लज्जतदार भाषा में भोपाल के इतिहास से लेकर मौजूदा दौर तक की यात्रा पर जाने का मौका मिलता है। खास तौर पर जीप पर सवार सूअर, जर्दा पर्दा, नामर्दा और अब ना मुराद गैस, यह सूरमा भोपाली कौन है मियां, गुप्त रोगों की डिस्पेंसरी जैसे लेख बिना रुके पढ़ने के लिए मजबूर कर देते हैं। 

किताब का सबसे मजेदार हिस्सा ‘और सुनाओ और बताओ की जंग से निकले किस्से’ है। यहां हमें एक नहीं बल्कि दर्जनों सूरमा भोपालियों से मिलने, उनके डींगे हांकने के अनूठे अंदाज, चुटीले किस्सों और भोपाली लोगों के मूल स्वभाव से परिचित होने का मौका मिलता है। यहां संजीव परसाई भोपाली का ईगो, मोर पकड़ने की उस्तादी, गोबर के बतोले, मुजरा भोपाल का, मियां शेर अलर्ट पलट हो लिया जैसे मनमोहक शीर्षकों के जरिए भोपाल की नब्ज पकड़ने का प्रयास करते हैं। खास तौर पर ‘यह किताब और कल्लन’ अध्याय में वे सीधे तौर पर समाज को आज पुस्तकों के प्रकाशन, हिंदी के लेखकों की स्थिति और पाठकों की घटती संख्या जैसी स्थितियों को कल्लन मियां के व्यंग्य के जरिए आईना दिखाने का प्रयास करते हैं ।

किताब का आखिरी हिस्सा ‘आज भोपाल कैसा है मियां’ चैप्टर है। इसमें भोपाल का ताल, गैस कांड के बाद का भोपाल और पढ़ने लिखने वालों का भोपाल जैसे अध्यायों के माध्यम से संजीव बदलते-संवरते भोपाल को कलम के हुनर के जरिए विनोदी अंदाज़ में परोसते हैं। जैसा कि हम सब जानते हैं भोपाल नगर निगम भोपाल को ‘यूनेस्को सिटी आफ लिटरेचर’ का दर्जा दिलाने के लिए लगातार कोशिश कर रहा है, संजीव परसाई भी ‘पढ़ने लिखने वालों का भोपाल’ अध्याय में हमें शहर की इसी पहचान से जोड़ते हैं। वे हमें दुष्यंत कुमार से लेकर कैफ भोपाली तक और जावेद अख्तर से लेकर बशीर बद्र तक साहित्य के गलियारों में घुमाते हैं। वह मौजूदा दौर के सशक्त हस्ताक्षर राजेश जोशी की बात करते हैं तो गिरजा भैया (वरिष्ठ पत्रकार गिरिजा शंकर जी) के योगदान की चर्चा भी। वे रूमी जाफरी को भोपाल से जोड़ते हैं तो पद्मश्री से सम्मानित विजय दत्त श्रीधर के अवदान का भी पूरे सम्मान से स्मरण करते हैं। वे व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी, खोजी पत्रकार राजकुमार केसवानी और मध्य प्रदेश की राजनीति की गहरी समझ रखने वाले हमारे अपने दौर के दीपक तिवारी से भी अपने अंदाज में हमारी पहचान कराते हैं। 

संजीव परसाई ने इस किताब की भूमिका में खुद लिखा है कि यह भोपाल का इतिहास नहीं है बल्कि भोपाल का कर्ज चुकाने का एक प्रयास है। उन्हीं के शब्दों को दोहराएं तो वे वाकई भोपाल का कर्ज सूद समेत चुकाने में कामयाब रहे हैं । भोपाल को इतने अलग अंदाज में एक किताब के तौर पर देखने या पढ़ने का मौका मुझे तो अब तक नहीं मिला इसलिए यदि आप भोपाल से हैं या भोपाल को जानना चाहते हैं तो ‘भोपाल टॉकीज: शहर की किस्सागोई’ किताब जरूर पढ़िए। यह किताब आपको भोपाल के बड़े तालाब से लेकर नए शहर की साफ सुथरी चौड़ी सड़कों पर तफरी कराएगी तो पुराने शहर की भूल भुलैया जैसी गलियों में छिपे कोहिनूरों की चमक भी दिखाएगी। भोपाल पर एक अच्छी,मजेदार,पठनीय किताब के लिए लेखक संजीव परसाई को बधाई। 

यह किताब अपने बेहतरीन प्रकाशनों के विख्यात 'लोक प्रकाशन', भोपाल ने प्रकाशित की है । उम्दा छपाई, आकर्षक, साफ सुथरे फोंट और पढ़ने के अनुकूल अक्षरों वाली महज ₹300 की यह किताब पैसा वसूल है। ‘भोपाल टॉकीज: शहर की किस्सागोई’ किताब आपको चंद घंटों में भोपाल के 100 साल का सफर करा देती है और सबसे अच्छी बात यह है कि आप किताब पढ़ते हुए किसी सुपरहिट फिल्म के शो की तरह भरपूर मनोरंजन के साथ इससे बाहर निकलते हैं। सही मायने में यह सूरमा भोपाली का भोपाल है जिसे हम भोपाल टॉकीज के जरिए देख पा रहे हैं।

किताब: भोपाल टॉकीज: शहर की किस्सागोई
पृष्ठ: 194
कीमत: 300 रुपए 
प्रकाशक: लोक प्रकाशन, भोपाल

Sunday, May 4, 2025

पुस्तक समीक्षा - भोपाल टॉकीज

भोपाली किस्सागोई से बाबस्ता "भोपाल टॉकीज 

"हमारा नाम सूरमा भोपाली ऐसेइ नइ है।" शोले फिल्म के इस डायलॉग ने भोपाली किस्सागोई की पहचान जो दुनिया भर में कराई है, उसी मिज़ाज से बाबस्ता है, भाई संजीव परसाई की नई किताब "भोपाल टॉकीज"

भोपाल एकमात्र ऐसा शहर है। जितना आप इसके अंदर घुसेंगे। उतना ही यह आपके अंदर घुसता चला जाएगा। फिर यह आपकी बोलचाल में ।आपके मिजाज में। आपके लिबास में और आपके हिसाब में दिखने लगेगा।

 इसीलिए संजीव भाई ने अपनी किताब में खुद ही लिख दिया है कि, आपके हाथ में जो किताब है। असल में यह भोपाल शहर का उधार है। हालांकि शहर ने कभी तकाजा नहीं किया । पर उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को निभाते हुए इस शहर का कर्ज शब्दों से उतारने का प्रयास किया है।

भोपाल को सबने अपने-अपने हिसाब से देखा है। राजा भोज का भोपाल अलग है। रानी कमलापति का भोपाल अलग है। केफ़ भोपाली का भोपाल अलग है। उद्धवदास मेहता का भोपाल अलग है। बशीर बद्र का भोपाल अलग है। डॉ शंकर दयाल शर्मा का भोपाल अलग है। एक शहर को देखने के कितने नजरिया हो सकते हैं, यह तो देखने वाले की नजर पर निर्भर करता है।

अगर चौक से देखा जाएगा तो भोपाल अलग दिखेगा। न्यू मार्केट से देखा जाएगा तो अलग दिखेगा। बैरागढ़ का भोपाल अलग है। तो भेल क्षेत्र का भोपाल अलग है। इतिहास का भोपाल अलग है, किस्सों का भोपाल अलग है, हकीकत तो यह है जो यहाँ रह रहा है, उसके हिस्से का भोपाल अलग है। 

पर संजीव भाई ने अपनी किताब में उन सब नजरियों को एक एंगल पर लाने का प्रयास किया है। इस किताब की शब्द यात्रा करके भोपाल के तमाम नजरियों को समझा जा सकता है। यह भोपाल नवाबों का नहीं ,कमलापति का शहर है। राजा भोज का शहर है। लेकिन इस शहर की निजामत कई सालो तक नवाबों और बेगमों ने भी की है, इस बात की तारीखी पैरवी इस किताब में है।

संजीव परसाई जी , संजीव शर्मा जी, मनोज अग्रवाल जी के साथ मेरा 30 साल पुराना संबंध है। इस दौरान हम सबने मिलकर भोपाल को खूब जिया हैं। नए शहर में आशियाना होने के बाद भी पुराने शहर की गलियों में, पटियों पर, सदर मंजिल के सीडियो पर , लक्ष्मी टॉकीज की गलियों में, ताजुल मस्जिदों की सीढ़िया पर बैठकर शहर के मिजाज को जानने का लगातार प्रयास किया।

हम शहर के होते चले गए और शहर हमारे अंदर बस्ता चला गया। धीरे-धीरे हमारी जुबान में भी वह शब्द जगह बनाने लगे, जो भोपाली किस्सागोई के खास जुमले थे। 

कहने को तो हर बात सामान्य है, पर बात करने का तरीका ही किस्सागोई का उस्ताद बनता है। संजीव भाई की इस किताब में इतिहास है, किस्से हैं, जानकारी है, राजनीति है, रणनीति है, भोपाली लफ़बाजी है। पर सबमें किस्सागोई का तरीका एक जैसा है। 

इसलिए ऐतिहासिक घटनाएं भी आपको पढ़ने में रुचिकर लगेगी। सामान्य घटना को रुचिकर बनाने का काम ही आपकी किस्सागोई पर निर्भर करता है। मशहूर शायर वसीम बरेलवी का शेर है। 

कौन सी बात, कब कैसे कही जाती है, 
यह तरीका हो तो, हर बात सुनी जाती है।

संजीव भाई ने अपनी किताब को चार हिस्सों में तक़सीम है। आजादी के पहले के ऐतिहासिक तारीखों को पहले भाग में सहेजने की कोशिश की है। वहीं दूसरे भाग में आजादी के बाद की घटनाओं प्रस्तुत किया गया है। तीसरे हिस्से में भोपाली बतोलेबाजी और चौथे हिस्से में भोपाल की वर्तमान स्थिति को बखूबी बयां किया है।

मैं तो में इतना ही कह सकता हूं, हर शहर के पास अपनी संस्कृति होती है। अपनी जुबान होती है। अपनी पहचान होती है । अगर उसकी इस पहचान से बाकी जानकारी को जोड़ दिया जाए, तो संजीव परसाई की यह किताब बनती है। जिस किसी को भोपाल को जानना है। समझना है। देखना है। अपने पास संदर्भ के लिए सुरक्षित रखना है । उनके लिए यह किताब एक बेहतर दस्तावेज है।

संजीव परसाई द्वारा लिखित किताब के कई वाक़िए हम दोनों के साथ ही गुजरे हैं। भोपाल की सड़कों पर न जाने कितने सूरमा भोपाली घूम रहे हैं । जिनके पास खुद की अपनी कई कहानियां है। कुछ तो इस किताब के माध्यम से आप तक पहुंच रही हैं। कुछ अभी भी शहर की फिजाओं में घूम रही है। उम्मीद है संजीव परसाई जल्दी ही उनको सहेज कर भी सबके सामने प्रस्तुत करेंगे। 

मुझे प्रसन्नता है कि संजीव परसाई में लीक से हटकर लेखन शैली को अपनाया है। यह पुस्तक ना होकर एक दस्तावेज बन गया है। पाठकों के लिए यह एक रूचिकर और संग्रहणीय पुस्तक होगी। मैं निजी तौर पर प्रसन्न हूं और श्री संजीव परसाई की दृष्टि एवं प्रयास की सराहना करता हूं ।
मेरी ओर से अशेष मंगलकामनाओं के साथ सभी से निवेदन है कि इस किताब के झरोखे से एक बार भोपाल को देखने की कोशिश जरूर करें।

संजय सक्सेना

#भोपाल_टॉकीज

Bhopal Talkies by Sanjeev Persai - Book Review by Ms. Manisha Sharma

ब्लॉकबस्टर फिल्म की तरह है ‘भोपाल टॉकीज’

क्यूँ भाई मियां, भोपाल टॉकीज चल रिये को क्या… ये बात भोपाल वासियों के लिए कोई नई नहीं है। तो चलिए ऑटो में बैठकर भोपाल टॉकीज चलते हैं। आप सोच रहे होंगे कि क्या वाकई में आज भी भोपाल टॉकीज उतनी ही शानोशौकत से खड़ी है, जैसे पहले थी? शायद नहीं, पर फिर भी मैं आपको भोपाल टॉकीज ले जाए बिना नहीं मानूंगी।

 आप सोच रहे होंगे कि भोपाल टॉकीज में ऐसा क्या है तो मैं स्पष्ट कर दूं कि मेरा आशय पुराने भोपाल में स्थित थिएटर से नहीं बल्कि हमारे अज़ीज़ संजीव (परसाई) भैया के सपनों की किताब भोपाल टाकीज से है. जिसमें हमें एक फिल्म की भान्ति प्यार, तकरार, इंकार ,इजहार, दोस्ती और चटपटी कहानियों  के साथ साथ एक अलग ही मसालेदार थ्रिलर का अनुभव मिलता है. यह किताब एक सफल और ब्लॉकबस्टर फिल्म की तरह कई पहलुओं को भी छूने की कोशिश है.

    जहां एक ओर ये किताब आपको भोपाल की नवाबी विरासत से रूबरू कराती है.वही दूसरी ओर ये हमें भोपाली लहजे के साथ भोपाल के इतिहास के रोचक पहलुओं को भी सामने लाती है. ये किताब रानी कमलापति जैसी बेगमों और बेगम सुल्तान शाहजहाँ के रुतबे को जानने का माध्यम भी है. भोपाल की  पहचान हमीदिया कालेज, भारत भवन, एमपी नगर, चौक बाज़ार  भोपाल ताल, जैसे अनेक स्रोतों की प्राचीन और नवीन स्थितियों से भी अवगत कराती है. 

किताब कुछ संजीदा पहलुओं को भी छूती है जिनमें भोपाल गैस त्रासदी, स्कूल मरघट मिठाई, भोपाल का मुजरा, जर्दा और पर्दा पर केंद्रित अध्याय विशेष है. इन सबके साथ साथ मनोरंजन की दुनिया में भी भोपाल टाकीज किताब ने अपनी बात काफी सुंदर ढंग से रखी है. दुष्यंत कुमार जैसे कवियों,जावेद अख्तर जैसे लेखक और गीतकार ,बशीर बद्र जैसे शायरों, रूमी जाफरी जैसी सिनेमा जगत की हस्ती और वरिष्ठ पत्रकार लेखक गिरिजा शंकर जी और विजय दत्त श्रीधर जी जैसे जाने  माने नामों  के बारे में भी हमारा ज्ञान वर्धन करती है.

 किताब भोपाल टाकीज अपने नाम के अनुरूप ही हमारी सारी जिज्ञासाओं और अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरी उतरती है. आप सभी इसे अवश्य खरीदकर पढ़े और अपने अनुभव भी जरूर साझा करें।