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Tuesday, July 28, 2026

मीडिया, नैरेटिव और जनचेतना और हम

संजीव परसाई -

साल 1920 के दशक में जनसंचार की एक थ्योरी आई थी। इसे 'मैजिक बुलेट थ्योरी' कहा जाता है। जर्मनी, फ्रांस,  इटली, तत्कालीन सोवियत संघ, आदि कई देशों में सफलतापूर्वक प्रयोग किया गया। इस सिद्धांत का बुनियादी आधार यह था कि दर्शक या पाठक निष्क्रिय होते हैं। यानी मीडिया रूपी सिरिंज से सूचना का जो भी 'इंजेक्शन' जनता को लगा दिया जाए, समाज बिना कोई सवाल पूछे उसे सच मान लेता है। क्योंकि उसके पास सूचना को वेरिफाई करने का कोई तरीका नहीं होता। 

सालों से देश में सूचनाओं के नाम पर एक ही तरह का नैरेटिव और एजेंडा परोसने के लिए इसी मॉडल को स्थायी बिजनेस मॉडल बना लिया गया। इसे मदद मिली जनसंचार के एक और मॉडल '360 डिग्री कम्युनिकेशन' से —जहाँ सारे उपलब्ध संचार माध्यमों से एक ही विचार या संदेश को बार-बार दोहराया जाता है, ताकि व्यक्ति को सोचने का कोई दूसरा विकल्प ही न मिले।


पिछले कुछ सालों में इसका प्रभाव फिल्म, टीवी, सोशल मीडिया, डिजिटल के साथ सभाओं, मीटिंग और संपर्क अभियानों तक में देखा गया। 'द कश्मीर फाइल्स', 'द केरला स्टोरी', 'आर्टिकल 370' जैसी कई फिल्मों के माध्यम से एक खास नैरेटिव को आगे बढ़ाया गया। इन फिल्मों को हर हाल में 'सुपरहिट' के रूप में पेश करने की कोशिश भी की गई, ताकि आम जनता के मन में यह संदेश जाए कि बहुसंख्यक समाज की सोच भी यही है। अभी भी कई फिल्में इसी नैरेटिव के आसपास आने वाली हैं। आज ओटीटी पर सर्च कीजिए कई सीरीज इसी नैरेटिव के आसपास मिल जाएंगी। वॉट्सऐप संदेशों से लेकर X, फेसबुक, यू ट्यूब आदि पर लाखों अकाउंट्स और राजनेताओं द्वारा एक जैसे पोस्ट और कंटेंट की बाढ़ ला दी जाती है। यहाँ तक कि कॉपी-पेस्ट के चक्कर में कभी स्पेलिंग की गलतियाँ भी एक साथ वायरल हो जाती हैं और बाद में उन्हें सुधारा जाता है, ताकि रीच (पहुँच) प्रभावित न हो।


इस सबके पीछे वही होता है जो इसका अंतिम लाभार्थी होता है। लेकिन कई व्यापारी भी बहती गंगा में हाथ धो लेते हैं। अक्सर कहा जाता है मीडिया एक तरफा है, एकतरफा होने की कोई कीमत भी होती होगी। लेकिन यह पैटर्न भी देखा गया है कि एक माहौल बनाया गया कि लोग यह देखना चाहते हैं, और अब जिसको अपनी आउटरीच बढ़ानी है, वो इस गोरखधंधे में उतर ही जाएगा। 80-90 के दशक में जब फिल्मों में बोल्ड सीन आने लगे तब यही तर्क दिया गया कि दर्शक ये सब देखना चाहते हैं। कुल मिलाकर ऐसा माहौल भी बनाया जाता है कि यही पब्लिक की डिमांड है।


बहरहाल यह सब करने के पीछे उद्देश्य साफ था—जनता को सिर्फ एक उपभोक्ता बनाकर रखना, जो सवाल न पूछे। लेकिन मीडिया की हर थ्योरी की एक सीमा होती है। जनसंचार के आधुनिक शोध यह सिद्ध करते हैं कि ऑडियंस हमेशा बेवकूफ नहीं रहती; एक निश्चित समय के बाद वह पैटर्न को समझने लगती है।


इस बदलाव की शुरुआत 2019 के आसपास ही दिखने लगी थी, जब विभिन्न अध्ययनों और सर्वे में पाया गया कि आम लोगों ने संवेदनशील राजनैतिक मुद्दों पर सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया देना (React करना) कम या बंद कर दिया था। यह एक प्रकार का 'साइलेंट रेजिस्टेंस' (शांत विरोध) था। हाल के जन-आंदोलनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि मीडिया द्वारा बनाए गए नैरेटिव और जमीनी हकीकत के बीच एक बड़ा अंतर आ चुका है। जब मुख्यधारा का मीडिया वास्तविक समस्याओं (रोजगार, महंगाई, शिक्षा) से आँखें मूँद लेता है, तब जनता विकल्प तलाशने लगती है। यहीं से आम लोगों ने गोदी मीडिया को पहचान लिया। इसी वजह से हाल के सालों में  पत्रकारों के साथ हुए दुर्व्यवहार के मामले बढ़े।


हालाँकि, इस पूरे इकोसिस्टम की सबसे बड़ी ताकत है—इसकी रणनीति बदलने की स्पीड । जब एक ही तरह के कंटेंट की अधिकता से लोगों का मोहभंग होने लगा, तब रणनीति लगातार बदली गई. हाल के आंदोलन के बाद इस नैरेटिव का रुख इंस्टाग्राम जैसे रील्स और विजुअल प्लेटफॉर्म्स की ओर मोड़ दिया गया है. असल में बड़े रणनीतिकारों का ध्यान जेन ज़ी पर था ही नहीं. सभी पेंशन याफ़्ता बुजुर्गों के मोबाइल में व्हाट्सएप कंटेंट और महिलाओं के खाते में पैसे डालने को ही मास्टर स्ट्रोक मान रहे थे।

आज के समय में युवा आबादी का एक बड़ा हिस्सा इंस्टाग्राम पर सक्रिय है। वो आमतौर पर राजनीति पर अपने विचार नहीं रखते हैं. लेकिन उनकी मोबाइल और कंटेंट पर पकड़ ने राजनीति को चौंका दिया. अब सारे नेता सक्रिय हो गए हैं. इसलिए अब इन्फ्लुएंसर्स और रील के माध्यम से उसी नैरेटिव को नए कलेवर में परोसने का काम शुरू हो चुका है।


लोकतंत्र में निष्पक्ष सूचना ही नागरिक की सबसे बड़ी ताकत होती है। सोशल मीडिया, जो कभी आम इंसान की स्वतंत्र अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा और शायद एकमात्र जरिया बनकर उभरा था, अब उसे भी उसी नियंत्रित इकोसिस्टम का हिस्सा बनाने की कोशिशें तेज़ की जा रहीं हैं।

यदि आने वाले समय में सोशल मीडिया पर भी स्वतंत्र विचार खत्म हो गए या उस पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया गया, तो आम नागरिक के पास अपनी बात रखने का कोई लोकतांत्रिक मंच नहीं बचेगा। समय की माँग है कि डिजिटल स्पेस की स्वतंत्रता को बचाए रखा जाए और नागरिक के रूप में हम सिर्फ सूचनाओं के 'निष्क्रिय उपभोक्ता' न बनें, बल्कि सूचना को वेरिफाई करने और सवाल पूछने की अपनी क्षमता को जीवित रखें।

सबकी कलई खोल गया आंदोलन

आखिरकार धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो ही गया। लेकिन यह आंदोलन हमारे सामने लोकतांत्रिक यादों के साथ कुछ सवाल भी छोड़ गया। आंदोलन क्या हुआ, समाज, राजनीति और प्रशासन के सारे नकाब एक-एक करके उतर गए। क्या लड़के, क्या आम लोग, नेता, अभिनेता, पुलिस, पत्रकार, 'सिस्टम' और 'कस्टम'—हर कोई बेपर्दा खड़ा नज़र आने लगा।
जिन लड़कों को कल तक घर में माँ से ‘दिन भर मोबाइल में घुसे रहने’ का ताना मिलता था, जो पिता से 'आलसी' होने का सर्टिफिकेट जेब में लिए घूमते थे, वही दुबले-पतले, मोटे चश्मे वाले युवा जब सड़क पर उतरे, तो तस्वीर बदल गई। वे सिर्फ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन ही नहीं कर रहे थे; वे व्यवस्था संभाल रहे थे, धरना स्थल का कचरा बीन रहे थे, घायल साथियों को अस्पताल पहुँचा रहे थे और ज़रूरत पड़ने पर पुलिस को छका भी रहे थे। उनका आंदोलन पारंपरिक नहीं, 'स्मार्ट' था—जहाँ Swiggy और Zomato से खाना ऑर्डर हो रहा था और वहीं से नए-नए नारे गढ़े जा रहे थे। आंदोलन की सबसे सशक्त तस्वीर लड़कियों ने पेश की। इस दौर की लड़कियों ने वो कर दिखाया, जो पहले के दौर में शायद ही कभी देखा गया। वे पुलिस के सामने डटकर खड़ी हुईं, नारे गढ़े, तंज कसे, सरकारी गाड़ियों के आगे दीवार बनकर खड़ी हो गईं और सोशल मीडिया पर सीधे लाइव आकर सिस्टम से सवाल पूछे। उन्होंने स्थापित मानकों को तोड़ते हुए यह साबित कर दिया कि सिस्टम की अकड़ को चुनौती देने में वे किसी से पीछे नहीं हैं।

इस आंदोलन में राजनीति की भूमिका पुराने ढ़र्रे पर ही रही। वही अड़ियल और नाक बचाने की हर कोशिश और भूल को स्वीकार करने से बचने वाला। यह निर्णय समय से भी लिया जा सकता था। लेकिन हमेशा की तरह राजनेता इस बार भी स्थिति का आकलन करने में चूक गए। जब तक वे अपनी रणनीति सोचते, तब तक पानी सिर से ऊपर जा चुका था। वे इस उलझन में फंसे रह गए कि अपना राजनीतिक करियर और राजनीति बचाएं या देश की भावना को समझें। इस आंदोलन ने राजनीति को स्पष्ट संदेश दिया है कि उनके पुराने दांव-पेच अब सिर्फ पुराने ही नहीं, बल्कि पूरी तरह सड़ चुके हैं। नेताओं से तो कहीं बेहतर वे अभिनेता साबित हुए, जिन्होंने बिना किसी झिझक के अपनी बात बेबाकी से जनता के सामने रखी।
'सिस्टम' की अकर्मण्यता और पंगु पुलिस ने सबसे ज्यादा दुखी किया । हमारा प्रशासनिक ढांचा (सिस्टम) भले ही थोड़ा हिला हो, लेकिन उसकी अकड़ और काम करने का सामंती तरीका अब भी वही है। हर बड़े अधिकारी ने अपनी टेबल पर पार्टी का एजेंडा रखा हुआ है। अब नेता से ज्यादा  अधिकारी राजनीतिक नफा-नुकसान तौलते हैं। यही कारण है कि गलत फैसले, अधूरे प्रोजेक्ट और सिर्फ मीटिंग दर मीटिंग भागना ही इनकी नीयत बन चुकी है।
रही बात पुलिस की, तो उसने इस दौरान वो सब किया जो एक पेशेवर पुलिस को कभी नहीं करना चाहिए। पारंपरिक नेतृत्व की जंग और राजनीतिक आकाओं के इशारों पर चलने की मजबूरी में संविधान और नियम-कायदों को किनारे रख दिया गया। ऐसा लगता है कि हमारी पुलिस व्यवस्था अब सिर्फ जेबकतरी, छोटी-मोटी चोरी, रॉन्ग पार्किंग, हेलमेट चेकिंग या आम आदमी को दबाने तक ही सीमित रह गई है। निष्पक्षता और संवेदना की जगह पुलिस ने संवैधानिक संरक्षण में सख्त और एकतरफा रवैया अपना लिया है। देश की पुलिस को अब बड़े रिफॉर्म और सेंसिटाइजेशन से गुजारने की जरूरत है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे निराशाजनक भूमिका मुख्यधारा के मीडिया की रही। एसी स्टूडियो में बैठकर नरेटिव गढ़ने वाले और टी पी पर आदेश बजाने वाले 'गोदी एंकर' मैदान से गायब दिखे। प्रायोजित रिपोर्टिंग करने वाले चैनलों को अब यह समझ लेना चाहिए कि जनता सब समझती है। युवा पत्रकारों को भीड़ के गुस्से का सामना करने के लिए आगे धकेलने के बजाय, उन एंकरों को खुद धरातल पर उतरना चाहिए। अब मीडिया की इस एकाधिकारवादी व्यवस्था की जरूरत नहीं रही, क्योंकि युवाओं ने सूचना का तंत्र (मोबाइल) अपने हाथों में ले लिया है। इलेक्ट्रॉनिक समाचार मीडिया अपने अंतिम दौर में है, जिसे बस व्हाट्सएप फारवर्ड से आंखें सूजने के बाद रिटायर्ड लोगों के मनोरंजन का साधन भर बचा है।

यह आंदोलन इतिहास के पन्नों में सफल जरूर दर्ज हो गया, लेकिन इसका सबसे बड़ा हासिल यह है कि इसने हमारी मौजूदा राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक व्यवस्था के खोखलेपन को पूरी तरह उजागर कर दिया है।

Tuesday, May 5, 2026

मिट्टी बनाने वाले


-संजीव परसाई -
हम अक्सर जोश में धरती की सौगंध खाते हैं। ये धरती मेरी माँ है, इसका कर्ज हमें चुकाना है जैसे डायलॉग फिल्मी पर्दों की शोभा बढ़ा रहे हैं। असल में यह धरती महज माटी का ढेर नहीं है, इसमें शामिल है करोड़ों सालों के जीवन, विकास की इबारत और वो जज्बात जिनसे मिलकर हम सब बने हैं।

ये धरती, आकाश, पेड़, हवा, पानी एक ऐसे सिस्टम का हिस्सा हैं, जिसका कोई भी भाग हमने नहीं बनाया। हमारा काम सिर्फ इनका बेतहाशा उपयोग करना ही रह गया है। हम शायद आखिरी हैं, जिन्होंने मिट्टी की पूजा होते देखी है । न कोई आडम्बर, न कर्मकांड। बस सीधा भूमि को जल से सींचा, गाय के गोबर से लीपकर, गेहूं के आटे से चौक पूर दिया। फूल बेलपत्री चढ़ाई, पांच अनाज, हल्दी की गांठ, एक फल, पान और लौंग इलाइची। जल फेरकर परिक्रमा किया, धरती मैया पर माथा टिकाया। लो हो गयी मिट्टी पूजा। मध्यप्रदेश के बुन्देल खंड, बघेलखंड और मालवा के किसान परिवारों में यह आम है। लेकिन अब खात्मे की ओर है।

आज के दौर में यूं तो मानुस होना भले कठिन काम है, लेकिन प्रकृति के प्रति संवेदना रखकर भगवान हो सकते हैं। हम इन सब प्राकृतिक सम्पदाओं को संभालकर आने वाली पीढ़ी को एक बेहतर भविष्य दे सकते हैं। 
मिट्टी के मामले में शहर अभागे हैं, वो अपने हिस्से की मिट्टी को धूल में बदल चुके हैं या बदल रहे हैं, अब मिट्टी सिर्फ शहरों के बाहर या गांवों में रह गयी है। इसीलिए जब शहरों ने अपने हिस्से की मिट्टी खत्म कर दी है तो, उनको मिट्टी बचाने पर जोर देना ही चाहिए। ये मिट्टी किसने बनाई, कौन बनाता है इसे, कैसे बनाता होगा। मिट्टी और भूमि बस इतनी ही है। फिर सीमेंट कांक्रीट में मिट्टी कहाँ से लाएं। विकास के नाम पर नायलोन की चदरिया ओढ़ घूम रहे हैं। इससे ऊपरी सुख तो मिल रहा है लेकिन अंदर से बैचेन बना के रखा है। लेकिन अब एआई के जमाने में पर्यावरण को सहेजने की चिंता भी आकार लेने लगी है। एक बड़ा वर्ग इस बारे में सोच रहा है, और अपनी बारी के इंतज़ार में नहीं है।

आज देश के शहरों में मिट्टी बनाने का मिशन दबे पांव पसर रहा है। देश के लाखों परिवार हैं जो अपने घर में मिट्टी बना रहे हैं। घर की बनी मिट्टी पूरी तरह, शुद्ध और उपजाऊ है। ये घरेलू नर्सरी, गमलों और बगीचों में उपयोग कर रहे हैं। लोग समझ गए हैं इन विषयों की जरूरत। अब लोग खुद अपने आप आगे आ रहे हैं। ऐसे ही कई रहवासी कॉलोनियां भी अपना योगदान कर रही हैं। वे अपने कैंपस में ही लाखों टन मिट्टी बना रहीं हैं। कई होटल, रेस्टोरेंट, रिसॉर्ट हैं जो आगे आए और अपने परिसर में ही मिट्टी बनाने का यूनिट डाल दिया। आखिर ये कैसे संभव हो सका? कैसे एक छोटी सी पहल आंदोलन बन गई? लोग आखिर क्यों समझ रहे हैं इसकी भूमिका जैसे विषयों पर विस्तार से बात करने की जरूरत है। 
देश के लाखों परिवार अपने घर मिट्टी बनाने का संकल्प ले रखे हैं। बाकी लोग अपने घर के सब्जी भाजी के छिलके, बीज, बचे हुए भाग, चायपत्ती या घर ले बचे भोजन का क्या करते हैं। उसे कचरे में भेज देते हैं। यानी जो कचरा गाड़ी में दे देते हैं और अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं। ये लाखों परिवार ऐसा नहीं करते हैं। ये सब्जी, फल के कचरे को अपने गमलों में ही दफन कर देते हैं। मिट्टी की हल्की परत उसके ऊपर कचरा। ये सिलसिला तब तक चलता है, जब तक गमला भर न जाए। जैसे हो गमला भर गया उसके ऊपर लगा दिया एक सुंदर सा फलदार या फूलदार पौधा। अब इस गमले में सिर्फ बीस प्रतिशत मिट्टी और अस्सी प्रतिशत बायो डिग्रेडेबल कचरा है। इस संपर्क, समन्वय से प्रकृति ने सौ प्रतिशत उपजाऊ मिट्टी तैयार कर दी। 

बात बहुत छोटी है, ऐसे सैकड़ों मॉडल उपलब्ध हैं। जिनके माध्यम से इस काम को किया जा सकता है। मटके में, टंकी में, गमले में, या कम्पोस्टर में कैसे भी इस काम को आसानी से किया जा सकता है। भारत सरकार के स्वच्छ भारत मिशन में इसके लिए विशेष प्रोत्साहन की व्यवस्था भी है। इस प्रकार बिना किसी अतिरिक्त व्यय या श्रम के हर परिवार साल भर में दो से तीन क्विंटल तक मिट्टी बना सकता है। 
इसके मूल में कचरे के प्रति जिम्मेदारी की भावना है। एक अनुमान लगाएं तो हर शहरी परिवार प्रतिदिन औसतन तीन - चार किलो कचरा पैदा करता है। जिसमें करीब आधा बायो डिग्रेडेबल कचरा होता है। यह कचरा गाड़ियों से शहर की लैंडफिल पर जाकर पहाड़ में बदल जाता है। इस पहाड़ को बनने और बढ़ने में हर शहरी का योगदान है। इसके नीचे की भूमि और आसपास का क्षेत्र एक बड़े कूड़ादान में बदल जाता है। कुछ सालों पहले हर छोटे बड़े शहरों में ऐसे पहाड़ खड़े थे।

जिन मिट्टी बनाने वालों ने अपने घर का कचरा इस ढेर का हिस्सा बनने से रोक दिया, वही धरती बचाने का जरिया बना। इसके सहारे पर्यावरण, जल और आर्थिक संसाधनों को बचाने के लक्ष्य भी सहजता से पूरे हो सकते हैं। इस पूरी प्रक्रिया को समझने की दृष्टि से आप होम कम्पोस्टिंग भी कह सकते हैं। लेकिन ये महज कम्पोस्टिंग न होकर एक बड़े लक्ष्य की ओर इशारा करती है। शहरी कचरे से बनी खाद बड़ी मात्रा में खेतों में जाकर उर्वरा शक्ति को बढ़ा रही है। स्वच्छ भारत मिशन के अनुमान के मुताबिक हर दिन में करीब 129206 टन शहरी कचरा प्रोसेस हो रहा है। इसमें से सरकारों और आम लोगों द्वारा करीब 35-40 प्रतिशत को हर रोज कम्पोस्ट बनाकर धरती को वापस सौंप दिया जाता है। अगर कुल कचरे में 60 फीसदी गीले या बायो डिग्रेडेबल कचरे को मानें तो अभी इस दिशा में और प्रयास करना है।
इससे एक बड़ी शुरुआत के संकेत मिलते हैं, बस सफलता जनता और सरकार के साझा प्रयासों पर निर्भर है।
Sanjeev Persai

Wednesday, November 26, 2025

क्रोटन

क्रोटन 
आजकल हर रविवार को भोपाल में पांच एक जगहों पर नैतिकता सम्मेलन हो ही जाते है। जिनमें नैतिकता का पारायण होता है और बताते हैं कि किस तरह नैतिकता की पालना करके हम देश और समाज को एक बेहतर दिशा दे सकते हैं। 

हफ्ते दो हफ्ते में कोई मुझे भी बुला लेता है। सो मैं भी साहित्यकार को शोभा दे, ऐसी अचकन डाल पहुंच जाता हूं। वहां सब अपने अपने ढोल और उसे पीटने के लिए लकड़ी साथ लेकर आते हैं। मैं भी इस गुल गपाड़े में शामिल होकर, अपना राग भी बजाता हूं। कुत्ते को रोटी देने का महात्म्य, गरीब की मदद, दलित प्रेम, संगठित परिवार, सामाजिक सौहार्द जैसे घिसे पिटे विषयों पर अपने विचार ठेलता हूं। मेरे ही आसपास रोजाना गोलमाल करने वाले नैतिकता पर भाषण देते हैं। जो रात गले भर के पीते, वो नशाबंदी को जायज ठहराते हैं। चपरासी तक की तनख़ा में कमीशन मांगने वाले देश को आर्थिक महाशक्ति बनाने के गुर सिखाते हैं । मैं खुद को इनसे थोड़ी बेहतर स्थिति में पाता हूं। मेरा आत्मविश्वास जिसे वो अकड़ कहते हैं, देखकर वे झेंप जाते हैं।

दर्शक दीर्घा के लोग खुश ही हैं, वो अब किसी के विचार पर उंगली नहीं उठाते। ये सबको या तो चोर मानकर चलते हैं या कि ये मात्र बतोलेबाजी का दौर है, तो गंभीरता से क्यों लेना। ये बात आयोजक भी जानते हैं, सो उनका फोकस इस बात पर होता है, की नए लोग ही आएं ।

एक वो समय भी था जब नैतिकता का वरण करने वाले सीना तानकर घूमते। हल्की बात करने वालों को खड़का देते। हल्के काम करने वालों को घर में न घुसने देते। बेईमान को मुंह पर ही सुना देते। इसके आगे जो गड़बड़ टाइप के लोग थे, उनके नाम के आगे कोई ऐसा शब्द जोड़ देते जो उसके व्यक्तित्व और चरित्र की व्याख्या कर सके। ये वो दौर था, जब स्कूली पाठ्यक्रम में भी नैतिक शिक्षा का पाठ हुआ करता था। सब मिलकर रहते, बड़ों का सम्मान करते, छोटों को खूब प्यार करते, एक दूसरे के काम आना सीखते और सदाचार की शपथ लेते। कालांतर में यही सदाचार, सदा चार के मीम चुटकुले में बदल गई।

दौर बदला, जब नैतिकता जरूरतों पर भारी पड़ना शुरू हो गई। इस दौर में सबसे ज्यादा गड़बड़ हुई, दिमाग जरूरतें और दिल में नैतिकता पाली जाने लगीं। जाहिर है लोग दिमाग का ज्यादा प्रयोग करने लगे। शायद इसी दौर में कानों के बीच रास्ता बनाया गया होगा। जिससे नैतिकता एक कान से अगर अंदर आ जाए, तो दूसरे कान के सुरक्षित रास्ते से बाहर निकल भी सके। अब नैतिकता रंग बिरंगी क्रोटन हो गई, इसका मतलब कुछ नहीं, बस शोभा के लिए आंगन में रोप लेते हैं। 

अब नैतिकता के लिहाज से सबसे बढ़िया दौर है। लोग नैतिकता की बात सुनकर हंस रहे हैं। इसका इससे अच्छा उपयोग और क्या हो सकता है भला। नैतिकता को प्रचार की दरकार हो गई। यह शब्द आचार, विचार संबंधी भाव या नीति से बना है। अब जब लूटकर खा जाने का विचार मन में छिपा बैठा हो, तो ऐसी स्थिति में नैतिकता सिर्फ बूढ़े व्याघ्र के पास सोने के कड़े सी है। 

नैतिकता का पालक अगर आम आदमी है तो बड़ी बात नहीं कि वह अपमान का शिकार हो जाए। लेकिन अगर खास हो तो उसको महान साबित करने सब एक साथ कूद पड़ेंगे।

नैतिकता के प्रहसन का लाभ सबको चाहिए, लेकिन आसरा कोई न देगा। मैंने भी बची खुची नैतिकता के तागे सहेजने की गरज से एक मोटा कंबल बनवा लिया है। उसे बस ठंड में निकालता हूं। ओढ़ो तो चुभता बहुत है, सो सहृदयता की लिहाफ में लपेट ओढ़कर चबूतरे पर बैठ जाता हूं । आने जाने वाले सम्मान से देखते हैं, उचक्के हिकारत से। जल्द ही ये कंबल अब बदलना पड़ेगा। बदरंग और झीना हो चला है। 

अब नैतिकता से आसपास के लोग खीझने, झल्लाने लगे हैं। जल्द ही वो समय भी चला आयेगा जब लोग नैतिकता के नाम पर थूंकने लगेंगे।

संजीव परसाई

जरा सी जात

अभी हम संविधान का दिन मना रहे थे, और पृष्ठभूमि में जातिवाद का लाउड म्यूजिक बज रहा था। जिसमें अजाक्स मध्यप्रदेश का नया अध्यक्ष गा रहा था कि उसे ब्राह्मण की बेटी को अपनी बहू बनाने की इच्छा है। साथ में सारे धड़ों के जातिवादी, अपना अपना साज बजा रहे थे। कुल मिलाकर मनभावन दृश्यावली है ।

सुबह सुबह राम सिंह आ गया, कहने लगा - भाई साहब, ये सब फालतू बातें हैं, अब जातिवाद है कहां?

मेरे मुंह से "लूज टॉक" निकल गया - अबे साले...
माफ करना मैं गुस्से में थोड़ा इधर उधर निकल जाता हूं...

जात के बिना आज तक कोई पैदा ही न हुआ। आदमी हो या जानवर सब इस बंधन से अनायास ही बांध दिए जाते हैं। खासकर जिस समाज का आधार ही जाति के बांस पर टिका हो, वहां यह कोई अनोखी बात नहीं।

क्या हम अभी अभी आजाद हुए हैं?
क्या हम संवैधानिक दायित्वों की अवहेलना करते हैं?
क्या हम मूलरूप से भेदभाव के पक्षधर हैं?

इन सबका जवाब - नहीं है। 

लेकिन आज जातिवाद हमारे बीच कहीं दुबक कर बैठा है, हम हैं कि खुद को आधुनिक बताने पर तुले हैं। जाति अब बोलने से ज्यादा, महसूस करने की चीज हो गई है। हमने पिछले पचास सालों में यह सीख लिया है, की कब प्रगतिशीलता का लबादा ओढ़ना है और कब उसे फेंकना है। हाल ही में बिहार चुनाव खत्म हुए, इससे जातियों पर ज्ञानार्जन हुआ। ऐसी ऐसी जातियां, जो यूपीएससी के सिलेबस में भी न पढ़ीं थीं। चुनाव के दौरान जातिवाद का नग्न नर्तन हुआ। सबने इस मंजर का आनंद लिया। अब सब अपने काम में लग गए हैं।

हकीकत ये है कि अब मोबाइल में जातिवाद के लिए, पांच डंडी का फुल नेटवर्क सक्रिय है। आदमी अपना आधार कार्ड भूल जाए, चल जाएगा… पर अपनी जात भूल जाए तो समाज उसे माफ न करे। अगर सरनेम से जाति का अंदाज न लगे, तो आदमी आसपास के किसी न किसी से पूछ ही लेता है। हालांकि जाति ढोने और भोगने की जिम्मेदारी गरीब पर सबसे ज्यादा है। सक्षम वर्ग सिर्फ खुद को स्थापित करने में लगा है। 

जात समाज के अपने गौरव तलाशे जा रहे हैं। जिन समाजों में कुरीतियों के पहाड़ खड़े हैं वो अपने गौरव पूज रहीं हैं। रामलाल का बेटा आईएएस लग गया। उसकी जात के लोगों को गर्व हुआ। 
इसी समय दूसरी जात के लोग दुखी थे, कि उनकी समाज का कोई बेटा चपरासी भी नहीं लगा। 
लड़का भी भूल गया कि उसे आईएएस देश के लिए चुना है।

हाई सोसाइटी के दृश्य और भी मज़ेदार है। अपर कास्ट के पढ़े-लिखे कहते हैं, "आई डोंट बिलीव इन कास्ट"। देखो हमारे बीच ये दो कलीग हैं, इनसे कभी किसी ने उनकी कास्ट पूछी है क्या? फिर यही लोग सोशल मीडिया पर समानता का भाषण देने के बाद व्हाट्सऐप ग्रुप में जातीय गौरव का पोस्ट डालते हैं और फिर कहते हैं—"अरे, यह तो बस जानकारी के लिए है।"

जात वह दीवार है, जिसे हमने खुद बनाया है और समय समय पर पुताई कर, रंग-बिरंगी लाइट लगाकर सजाते हैं। दीवार तोड़ने की बात करो तो लोग कहते हैं—तोड़ तो देंगे… पर अभी नहीं। पहले ये बताओ कि दीवार की नींव किसने रखी थी।" बहस शुरू हो जाती है परंपराओं की, और दीवार वहीं की वहीं खड़ी रहती है—थोड़ी और मजबूत होकर।

जात का सच यह है कि हम अपनी छोड़ना नहीं चाहते, और दूसरे की देख-देखकर जलते भी हैं। जात हमारे लिए वही है जैसे घर के बाहर रखा जूता—हम जानते हैं कि गंदा है, लेकिन बाहर से आते ही उसे साफ करके फिर पहन लेते हैं। 

अगर सोच बदले बिना जातिवाद खत्म करने की कोशिश करेंगे, तो हालत वैसी ही होगी जैसे कोई लहसुन का भभका मारते हुए कोई कहे— मैं तो खुशबूदार सोशल रिफॉर्मर हूँ। हिंदू या मुसलमान धर्म बदल सकते हैं। लेकिन क्या अहिरवार जी चाहें तो वे गुप्ता जी हो सकते हैं?

अब कोई सीधे जात पर टीका नहीं लिखता। अब जातिवाद लाखों करोड़ों लोगों के पेट ही नहीं भर रहा, वो उनको गाड़ी, बंगले, रसूख भी दिलवा रहा है। कई नेता जातिवाद का स्टार्टअप चला रहे हैं। उनका मानना है कि इससे वे समाज का भला कर रहे हैं। हम भी उनको ही समाज मानते हैं। अब जातिवाद सिर्फ वह नहीं जिससे किसी का अपमान हो, अब जातिवाद बड़ी निर्लज्जता के साथ एक हथियार की तरह उपयोग किया जा रहा है। इस माध्यम से समाज को वर्ग संघर्ष की ओर धकियाने की कोशिश भी होती है।

ये देश कभी सांप्रदायिकता और जातिवाद की बीमारी से मुक्ति की कल्पना न कर सकेगा। ये वो वायरस है, जिसको दबाए रखना ही उपलब्धि है। जब जब ये सक्रिय होता है, चारों तरफ छींक, खांसी, खुजली और बेचैनी फैल जाती है। सो, सोशल इम्यूनिटी पर ध्यान दें, जिससे हम ऐसे या किसी दूसरे वायरस से सामना करने को तैयार रहे।
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संजीव परसाई
A 40 भेल संगम सोसाइटी
भोपाल मध्यप्रदेश 
8878800027

Monday, August 4, 2025

राग दरबारी - उपन्यास से आगे

..रंगनाथ का चेहरा तमतमा गया। अपनी आवाज को ऊंचा उठाकर, जैसे उसी के साथ सच्चाई का झंडा भी उठा रहा हो, बोला "प्रिंसिपल साहब, आपकी बातचीत से मुझे नफरत हो रही है। इसे बंद कीजिए।"
प्रिंसिपल ने यह बात बड़े आश्चर्य से सुनी। फिर उदास होकर बोले,"बाबू रंगनाथ, तुम्हारे विचार बहुत ऊंचे हैं। पर कुल मिलाकर उससे यही साबित होता है कि तुम गधे हो।"
यह बात राग दरबारी के मुख्य पात्रों की आखिरी बातचीत है। कई बार ऐसा लगता है कि प्रिंसिपल साहब, ये रंगनाथ बाबू से नहीं मुझ से कह रहे हैं। कोई न कोई प्रिंसिपल, अपने आसपास के रंगनाथ को भलाई, सदाचार, मेहनत और समर्पण के कारण बुद्धू कह देता है, या मान लेता है। 
बहरहाल, राग दरबारी, साल 1968 में लिखी गई थी। अब तक मेरी जानकारी के अनुसार बयालीस संस्करण आ चुके हैं। लेकिन दूसरा भाग नहीं आया। साल 2011 में श्रीलाल शुक्ल जी ने इस शिवपाल गंज रूपी संसार को अलविदा कह दिया। लेकिन राग दरबारी हमारे बीच आज भी मौजूद है। ठीक उसी रूप में, जैसा कि लिखा गया है। उपन्यास भले ही 1968 में प्रकाशित हुआ हो, लेकिन इसके भीतर जो व्यंग्य, राजनीतिक विडंबना, नौकरशाही की चालबाजियाँ और सामाजिक ढांचे की पोल उजागर की गई है, वह आज भी उतनी ही सटीक बैठती है।

शिवपालगंज आज भी भारत में हर स्तर पर हैं जहाँ विकास योजनाएं तो आती हैं, लेकिन उसका लाभ किन्हें मिलता है यह अलग सवाल है। पंचायत राजनीति, जातिवाद, बाहुबल और सत्ता की मिलीभगत आज भी वैसी ही दिखाई देती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस और राजनीति तंत्र पर उपन्यास का व्यंग्य आज की नौकरशाही और राजनीति की विफलताओं को भी उजागर करता है। 'कॉलेज' और 'प्रिंसिपल वैद्यनाथ मिश्र' जैसे चरित्र आज भी सिस्टम के भीतर मौज़ूद अनेक ऐसे पात्रों के प्रतिनिधि हैं।
उपन्यास के पात्र (रंगा मास्टर, वैद्यनाथ मिश्र, लंगड़, बद्री पहलवान आदि) प्रतीक हैं उन लोगों के जो समाज को अपने फायदे के अनुसार चलाते हैं। ऐसे लोग आज भी हर गाँव, कस्बे, या छोटे शहर में मिल जाते हैं। यह किताब पढ़ने हुए अहसास होता है कि हम समाज, संसाधन और सुविधाओं के दुरुपयोग के लिए सीधे सक्षम वर्ग को दोषी ठहरा देते हैं। लेकिन सर्वहारा वर्ग भी कम नहीं है, जहां मौका मिलता है, चौका मार ही देता है।

शुक्ल जी की भाषा शैली, व्यंग्य और कटाक्ष आज के सोशल मीडिया के व्यंग्यात्मक कंटेंट की तरह ही प्रभावशाली है। आज जब मीम्स और सटायर आम हो गए हैं, तब 'राग दरबारी' का व्यंग्य उससे कहीं अधिक गहराई लिए होता है। असल में इस किताब में ‘विकास’ और ‘यथास्थिति वाद’ की टकराहट साफ दिखाई देती है। उपन्यास में साफ दिखाई देता है कि बदलाव की कोई भी कोशिश गांव के पारंपरिक ढांचे को असहज करती है। इसीलिए आज भी सरकार की कई नीतियाँ सिर्फ़ काग़ज़ पर लागू होती हैं, ज़मीन पर नहीं ।
"राग दरबारी" केवल एक व्यंग्यात्मक उपन्यास नहीं है, यह भारत की प्रशासनिक, सामाजिक और राजनीतिक जड़ों की पड़ताल करता है। यदि आप सिस्टम को सही सही पहचानते हैं तो मेरी बात से तत्काल सहमत हो जाएंगे।

आज जब हम 'नए भारत' की बात करते हैं, तो यह जरूरी हो जाता है कि हम "राग दरबारी" जैसे साहित्य को फिर से पढ़ें, समझें और देखें कि बदलाव की राह में क्या अब भी वही अड़चनें हैं जो तब थीं। 
यह मेरी सर्वाधिक पसंदीदा किताबों में से है। जब भी उदास होता हूं, कोई भी पन्ना पढ़ने लगता हूं। मौका मिले तो जरूर पढ़िए...अगर गांव से ताल्लुक हो तो पढ़ने में ज्यादा मजा आएगा।

जय जय ...

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Friday, July 25, 2025

सामूहिकता और सशक्तिकरण के सच

अभी पिछले दिनों एक जनप्रतिनिधि से मुलाकात हुई, वे अब तक कई नेताओं और अधिकारियों के चक्कर लगा चुके थे। उनके क्षेत्र में कुछ विकास कार्य लंबित थे, जो पैसों की कमी से पूरे नहीं हो रहे थे। उनके पास कामों की जो सूची थी, उनमें अधिकांश काम ऐसे थे, जो सामूहिक भागीदारी से संभव थे। लेकिन उनका तर्क था, अब वो दौर नहीं जब लोग आगे आकर इन कामों में सहयोग करते थे। ये बहुत हद तक सही है, लेकिन इसका जिम्मेदार कौन? 
तेजी से भागते भागते हम समाज के रूप कमजोर हो रहे हैं। ये आरोप नहीं चिंता है, और यह अकारण भी नहीं। इस आत्मकेंद्रित समाज में अब कितने लोग है, जो सामाजिक सरोकार और लोगों के हित की बात कर रहे हैं? इसके मूल में वे योजनाकार हैं, जो विकास योजनाओं में समाज की भूमिका को या तो नगण्य मानते हैं या उनको इसपर भरोसा ही नहीं। हम अपने समाज को प्रतिपल दुत्कार रहे हैं और अब यह एक सर्वसम्मत परंपरा बन रही है। पर्यावरण, प्रदूषण, कानूनों का उल्लंघन, भ्रष्टाचार, अपराध, उच्छृंखलता जो हो इसके लिए हम छूटते ही समाज को जिम्मेदार ठहरा देते हैं।
दूसरे सामूहिकता के साथ सशक्तिकरण जुड़ा हुआ है। लेकिन सशक्तिकरण से आँखें चुराने वाले भी कम नहीं हैं। ऐसे समूह चाहिए जो पेड़ लगा दें, बाग की सफाई कर दें, जनजागरुकता में जुट जाएं। लेकिन अगर वे अधिकारों, सामाजिक मुद्दों की बात करेंगे तो सिस्टम असहज हो जाएगा।
हमारे यहां कुएं खोदने, तालाब बनाने, बाग, जंगल रोपने, पहाड़ हटाने, सफाई, आपदा, संकट सब में समुदाय की भागीदारी के हजारों उदाहरण हैं। लेकिन इनके बाद भी हमारा भरोसा कैसे कम हो रहा है। स्वसहायता के मॉडल को सफल नहीं मानने वालों की बड़ी संख्या हो सकती है, लेकिन एक बहुत बड़ी आबादी सफलता की गाथाओं से भरी है। ऐसे नेता भी हैं जिनके आह्वान पर लोग घर से बाहर न झाकें, लेकिन वो नेता हैं।
समाज के आगे आने की शुरुआत नेतृत्व से होती रही है। निरर्थक जल्दबाजी के दौर में जमीनी नेतृत्व का मूल्य, भरोसा और रसूख घट गया। अब इसका खामियाजा समूचे समाज को इस रूप में देखना है कि जो काम समाज के सहारे संभव हो सकते हैं, वे भी किसी की कृपादृष्टि की आस में सालों पड़े होते हैं। अब कोई मसीहा चमत्कारी, और भरोसेमंद छबि के साथ आए और इस भ्रम को तोड़े।
एक बार फिर समाज को खंगालने की जरूरत है, लाखों लोग हैं जो कुछ सकारात्मक करना चाहते हैं। उनको आगे लाकर भरोसा दिलाने वाला चाहिए। फिर चाहे वो कोई हो..

जय जय..
संजीव परसाई

#Sanjeev Persai