संजीव परसाई -
साल 1920 के दशक में जनसंचार की एक थ्योरी आई थी। इसे 'मैजिक बुलेट थ्योरी' कहा जाता है। जर्मनी, फ्रांस, इटली, तत्कालीन सोवियत संघ, आदि कई देशों में सफलतापूर्वक प्रयोग किया गया। इस सिद्धांत का बुनियादी आधार यह था कि दर्शक या पाठक निष्क्रिय होते हैं। यानी मीडिया रूपी सिरिंज से सूचना का जो भी 'इंजेक्शन' जनता को लगा दिया जाए, समाज बिना कोई सवाल पूछे उसे सच मान लेता है। क्योंकि उसके पास सूचना को वेरिफाई करने का कोई तरीका नहीं होता।
सालों से देश में सूचनाओं के नाम पर एक ही तरह का नैरेटिव और एजेंडा परोसने के लिए इसी मॉडल को स्थायी बिजनेस मॉडल बना लिया गया। इसे मदद मिली जनसंचार के एक और मॉडल '360 डिग्री कम्युनिकेशन' से —जहाँ सारे उपलब्ध संचार माध्यमों से एक ही विचार या संदेश को बार-बार दोहराया जाता है, ताकि व्यक्ति को सोचने का कोई दूसरा विकल्प ही न मिले।
पिछले कुछ सालों में इसका प्रभाव फिल्म, टीवी, सोशल मीडिया, डिजिटल के साथ सभाओं, मीटिंग और संपर्क अभियानों तक में देखा गया। 'द कश्मीर फाइल्स', 'द केरला स्टोरी', 'आर्टिकल 370' जैसी कई फिल्मों के माध्यम से एक खास नैरेटिव को आगे बढ़ाया गया। इन फिल्मों को हर हाल में 'सुपरहिट' के रूप में पेश करने की कोशिश भी की गई, ताकि आम जनता के मन में यह संदेश जाए कि बहुसंख्यक समाज की सोच भी यही है। अभी भी कई फिल्में इसी नैरेटिव के आसपास आने वाली हैं। आज ओटीटी पर सर्च कीजिए कई सीरीज इसी नैरेटिव के आसपास मिल जाएंगी। वॉट्सऐप संदेशों से लेकर X, फेसबुक, यू ट्यूब आदि पर लाखों अकाउंट्स और राजनेताओं द्वारा एक जैसे पोस्ट और कंटेंट की बाढ़ ला दी जाती है। यहाँ तक कि कॉपी-पेस्ट के चक्कर में कभी स्पेलिंग की गलतियाँ भी एक साथ वायरल हो जाती हैं और बाद में उन्हें सुधारा जाता है, ताकि रीच (पहुँच) प्रभावित न हो।
इस सबके पीछे वही होता है जो इसका अंतिम लाभार्थी होता है। लेकिन कई व्यापारी भी बहती गंगा में हाथ धो लेते हैं। अक्सर कहा जाता है मीडिया एक तरफा है, एकतरफा होने की कोई कीमत भी होती होगी। लेकिन यह पैटर्न भी देखा गया है कि एक माहौल बनाया गया कि लोग यह देखना चाहते हैं, और अब जिसको अपनी आउटरीच बढ़ानी है, वो इस गोरखधंधे में उतर ही जाएगा। 80-90 के दशक में जब फिल्मों में बोल्ड सीन आने लगे तब यही तर्क दिया गया कि दर्शक ये सब देखना चाहते हैं। कुल मिलाकर ऐसा माहौल भी बनाया जाता है कि यही पब्लिक की डिमांड है।
बहरहाल यह सब करने के पीछे उद्देश्य साफ था—जनता को सिर्फ एक उपभोक्ता बनाकर रखना, जो सवाल न पूछे। लेकिन मीडिया की हर थ्योरी की एक सीमा होती है। जनसंचार के आधुनिक शोध यह सिद्ध करते हैं कि ऑडियंस हमेशा बेवकूफ नहीं रहती; एक निश्चित समय के बाद वह पैटर्न को समझने लगती है।
इस बदलाव की शुरुआत 2019 के आसपास ही दिखने लगी थी, जब विभिन्न अध्ययनों और सर्वे में पाया गया कि आम लोगों ने संवेदनशील राजनैतिक मुद्दों पर सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया देना (React करना) कम या बंद कर दिया था। यह एक प्रकार का 'साइलेंट रेजिस्टेंस' (शांत विरोध) था। हाल के जन-आंदोलनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि मीडिया द्वारा बनाए गए नैरेटिव और जमीनी हकीकत के बीच एक बड़ा अंतर आ चुका है। जब मुख्यधारा का मीडिया वास्तविक समस्याओं (रोजगार, महंगाई, शिक्षा) से आँखें मूँद लेता है, तब जनता विकल्प तलाशने लगती है। यहीं से आम लोगों ने गोदी मीडिया को पहचान लिया। इसी वजह से हाल के सालों में पत्रकारों के साथ हुए दुर्व्यवहार के मामले बढ़े।
हालाँकि, इस पूरे इकोसिस्टम की सबसे बड़ी ताकत है—इसकी रणनीति बदलने की स्पीड । जब एक ही तरह के कंटेंट की अधिकता से लोगों का मोहभंग होने लगा, तब रणनीति लगातार बदली गई. हाल के आंदोलन के बाद इस नैरेटिव का रुख इंस्टाग्राम जैसे रील्स और विजुअल प्लेटफॉर्म्स की ओर मोड़ दिया गया है. असल में बड़े रणनीतिकारों का ध्यान जेन ज़ी पर था ही नहीं. सभी पेंशन याफ़्ता बुजुर्गों के मोबाइल में व्हाट्सएप कंटेंट और महिलाओं के खाते में पैसे डालने को ही मास्टर स्ट्रोक मान रहे थे।
आज के समय में युवा आबादी का एक बड़ा हिस्सा इंस्टाग्राम पर सक्रिय है। वो आमतौर पर राजनीति पर अपने विचार नहीं रखते हैं. लेकिन उनकी मोबाइल और कंटेंट पर पकड़ ने राजनीति को चौंका दिया. अब सारे नेता सक्रिय हो गए हैं. इसलिए अब इन्फ्लुएंसर्स और रील के माध्यम से उसी नैरेटिव को नए कलेवर में परोसने का काम शुरू हो चुका है।
लोकतंत्र में निष्पक्ष सूचना ही नागरिक की सबसे बड़ी ताकत होती है। सोशल मीडिया, जो कभी आम इंसान की स्वतंत्र अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा और शायद एकमात्र जरिया बनकर उभरा था, अब उसे भी उसी नियंत्रित इकोसिस्टम का हिस्सा बनाने की कोशिशें तेज़ की जा रहीं हैं।
यदि आने वाले समय में सोशल मीडिया पर भी स्वतंत्र विचार खत्म हो गए या उस पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया गया, तो आम नागरिक के पास अपनी बात रखने का कोई लोकतांत्रिक मंच नहीं बचेगा। समय की माँग है कि डिजिटल स्पेस की स्वतंत्रता को बचाए रखा जाए और नागरिक के रूप में हम सिर्फ सूचनाओं के 'निष्क्रिय उपभोक्ता' न बनें, बल्कि सूचना को वेरिफाई करने और सवाल पूछने की अपनी क्षमता को जीवित रखें।