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Tuesday, May 5, 2026

मिट्टी बनाने वाले


-संजीव परसाई -
हम अक्सर जोश में धरती की सौगंध खाते हैं। ये धरती मेरी माँ है, इसका कर्ज हमें चुकाना है जैसे डायलॉग फिल्मी पर्दों की शोभा बढ़ा रहे हैं। असल में यह धरती महज माटी का ढेर नहीं है, इसमें शामिल है करोड़ों सालों के जीवन, विकास की इबारत और वो जज्बात जिनसे मिलकर हम सब बने हैं।

ये धरती, आकाश, पेड़, हवा, पानी एक ऐसे सिस्टम का हिस्सा हैं, जिसका कोई भी भाग हमने नहीं बनाया। हमारा काम सिर्फ इनका बेतहाशा उपयोग करना ही रह गया है। हम शायद आखिरी हैं, जिन्होंने मिट्टी की पूजा होते देखी है । न कोई आडम्बर, न कर्मकांड। बस सीधा भूमि को जल से सींचा, गाय के गोबर से लीपकर, गेहूं के आटे से चौक पूर दिया। फूल बेलपत्री चढ़ाई, पांच अनाज, हल्दी की गांठ, एक फल, पान और लौंग इलाइची। जल फेरकर परिक्रमा किया, धरती मैया पर माथा टिकाया। लो हो गयी मिट्टी पूजा। मध्यप्रदेश के बुन्देल खंड, बघेलखंड और मालवा के किसान परिवारों में यह आम है। लेकिन अब खात्मे की ओर है।

आज के दौर में यूं तो मानुस होना भले कठिन काम है, लेकिन प्रकृति के प्रति संवेदना रखकर भगवान हो सकते हैं। हम इन सब प्राकृतिक सम्पदाओं को संभालकर आने वाली पीढ़ी को एक बेहतर भविष्य दे सकते हैं। 
मिट्टी के मामले में शहर अभागे हैं, वो अपने हिस्से की मिट्टी को धूल में बदल चुके हैं या बदल रहे हैं, अब मिट्टी सिर्फ शहरों के बाहर या गांवों में रह गयी है। इसीलिए जब शहरों ने अपने हिस्से की मिट्टी खत्म कर दी है तो, उनको मिट्टी बचाने पर जोर देना ही चाहिए। ये मिट्टी किसने बनाई, कौन बनाता है इसे, कैसे बनाता होगा। मिट्टी और भूमि बस इतनी ही है। फिर सीमेंट कांक्रीट में मिट्टी कहाँ से लाएं। विकास के नाम पर नायलोन की चदरिया ओढ़ घूम रहे हैं। इससे ऊपरी सुख तो मिल रहा है लेकिन अंदर से बैचेन बना के रखा है। लेकिन अब एआई के जमाने में पर्यावरण को सहेजने की चिंता भी आकार लेने लगी है। एक बड़ा वर्ग इस बारे में सोच रहा है, और अपनी बारी के इंतज़ार में नहीं है।

आज देश के शहरों में मिट्टी बनाने का मिशन दबे पांव पसर रहा है। देश के लाखों परिवार हैं जो अपने घर में मिट्टी बना रहे हैं। घर की बनी मिट्टी पूरी तरह, शुद्ध और उपजाऊ है। ये घरेलू नर्सरी, गमलों और बगीचों में उपयोग कर रहे हैं। लोग समझ गए हैं इन विषयों की जरूरत। अब लोग खुद अपने आप आगे आ रहे हैं। ऐसे ही कई रहवासी कॉलोनियां भी अपना योगदान कर रही हैं। वे अपने कैंपस में ही लाखों टन मिट्टी बना रहीं हैं। कई होटल, रेस्टोरेंट, रिसॉर्ट हैं जो आगे आए और अपने परिसर में ही मिट्टी बनाने का यूनिट डाल दिया। आखिर ये कैसे संभव हो सका? कैसे एक छोटी सी पहल आंदोलन बन गई? लोग आखिर क्यों समझ रहे हैं इसकी भूमिका जैसे विषयों पर विस्तार से बात करने की जरूरत है। 
देश के लाखों परिवार अपने घर मिट्टी बनाने का संकल्प ले रखे हैं। बाकी लोग अपने घर के सब्जी भाजी के छिलके, बीज, बचे हुए भाग, चायपत्ती या घर ले बचे भोजन का क्या करते हैं। उसे कचरे में भेज देते हैं। यानी जो कचरा गाड़ी में दे देते हैं और अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं। ये लाखों परिवार ऐसा नहीं करते हैं। ये सब्जी, फल के कचरे को अपने गमलों में ही दफन कर देते हैं। मिट्टी की हल्की परत उसके ऊपर कचरा। ये सिलसिला तब तक चलता है, जब तक गमला भर न जाए। जैसे हो गमला भर गया उसके ऊपर लगा दिया एक सुंदर सा फलदार या फूलदार पौधा। अब इस गमले में सिर्फ बीस प्रतिशत मिट्टी और अस्सी प्रतिशत बायो डिग्रेडेबल कचरा है। इस संपर्क, समन्वय से प्रकृति ने सौ प्रतिशत उपजाऊ मिट्टी तैयार कर दी। 

बात बहुत छोटी है, ऐसे सैकड़ों मॉडल उपलब्ध हैं। जिनके माध्यम से इस काम को किया जा सकता है। मटके में, टंकी में, गमले में, या कम्पोस्टर में कैसे भी इस काम को आसानी से किया जा सकता है। भारत सरकार के स्वच्छ भारत मिशन में इसके लिए विशेष प्रोत्साहन की व्यवस्था भी है। इस प्रकार बिना किसी अतिरिक्त व्यय या श्रम के हर परिवार साल भर में दो से तीन क्विंटल तक मिट्टी बना सकता है। 
इसके मूल में कचरे के प्रति जिम्मेदारी की भावना है। एक अनुमान लगाएं तो हर शहरी परिवार प्रतिदिन औसतन तीन - चार किलो कचरा पैदा करता है। जिसमें करीब आधा बायो डिग्रेडेबल कचरा होता है। यह कचरा गाड़ियों से शहर की लैंडफिल पर जाकर पहाड़ में बदल जाता है। इस पहाड़ को बनने और बढ़ने में हर शहरी का योगदान है। इसके नीचे की भूमि और आसपास का क्षेत्र एक बड़े कूड़ादान में बदल जाता है। कुछ सालों पहले हर छोटे बड़े शहरों में ऐसे पहाड़ खड़े थे।

जिन मिट्टी बनाने वालों ने अपने घर का कचरा इस ढेर का हिस्सा बनने से रोक दिया, वही धरती बचाने का जरिया बना। इसके सहारे पर्यावरण, जल और आर्थिक संसाधनों को बचाने के लक्ष्य भी सहजता से पूरे हो सकते हैं। इस पूरी प्रक्रिया को समझने की दृष्टि से आप होम कम्पोस्टिंग भी कह सकते हैं। लेकिन ये महज कम्पोस्टिंग न होकर एक बड़े लक्ष्य की ओर इशारा करती है। शहरी कचरे से बनी खाद बड़ी मात्रा में खेतों में जाकर उर्वरा शक्ति को बढ़ा रही है। स्वच्छ भारत मिशन के अनुमान के मुताबिक हर दिन में करीब 129206 टन शहरी कचरा प्रोसेस हो रहा है। इसमें से सरकारों और आम लोगों द्वारा करीब 35-40 प्रतिशत को हर रोज कम्पोस्ट बनाकर धरती को वापस सौंप दिया जाता है। अगर कुल कचरे में 60 फीसदी गीले या बायो डिग्रेडेबल कचरे को मानें तो अभी इस दिशा में और प्रयास करना है।
इससे एक बड़ी शुरुआत के संकेत मिलते हैं, बस सफलता जनता और सरकार के साझा प्रयासों पर निर्भर है।
Sanjeev Persai

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