Monday, March 6, 2017

राजनीति में थूकने का महत्त्व..

(संजीव परसाई) नेता चुनाव के दौरानअपने ऊपर लगे आरोपों से व्यथित था। असल में वो आरोपों से ज्यादा इस बात से व्यथित था कि टेंडर का पेमेंट भी पूरा नहीं हुआ था और चुनाव की अधिसूचना लग गयी थी। मिला तो कुछ नहीं , हल्ला ज़माने भर का हो गया। वो दिनभर प्रचार करता, शाम को पार्टी कार्यालय आकर हल्का होता और बिफर बिफर के कुल्ला करता फिर घर जाता। चमचे निहाल होकर कहते- भैया का हिसाब बढ़िया है, पेट और मुँह हल्का करके ही घर जाते हैं। आज तो भैया ने सारे विपक्ष की लंगोट ही खेंच ली। भैया ने आज सबके मुंह पर चार लिवर का ताला टांग दिया।  ऐसा का कह दिया बे, सबने पूछा तो दूसरा बोला - भैया ने सारे विरोधियों की माँ-बहन को याद करते हुए कहा कि - तुम सब साला हमारी बढ़ती इमेज से बौखलाया हुआ है, हम तुम सब पर थूकते भी नहीं हैं। अबे देखा नहीं का बे, टीवी पर तीन बजे से पट्टा चल रहा है, आज तो थूकने के बयान से भैया छाए हुए हैं। टीवी की मैडम तो भैया का इतने बार नाम जप लिए हैं कि भौजी को जलन ही होने लगे।
दूसरी ओर विपक्षी कौन से कम थे, शाम होते होते उन्होंने ये कहकर सनसनी फैला दी कि - हम और जनता दोनों इनके ऊपर ही थूकेंगे। जब सोशल मीडिया नहीं था तब कस्बों की लड़कियां , छेड़ने वाले छिछोरों का विरोध थूककर करतीं थीं, अब तो सीधे पुलिस हेल्प लाइन को टैग कर देती हैं। सो हर हथकंडे अपना चुके नेता ने भी ठान ली कि विपक्षी पर थूकुंगा भी और मानूँगा नहीं, दूसरी ओर जनता नेताओं की हरकतें और ओछे बोल देख-सुनकर अपने मुँह में ढेर सारा थूक भरे घूम रही है। कहाँ थूके, बस जगह और मौके की तलाश में है। नेता बिरादरी यह जानकर सकते में थी, भैयाजी के सूत्रों ने उनतक भी यह खबर पहुंचा दी। उनका एक जड़खरीद समर्थक बाजार से बड़ी साइज़ का पीकदान ले आया। बोला कोई चिंता नहीं भैया जी, इसे साथ में लेकर चलेंगे। जिसको थूकना हो इसमें थूके। साइडवाले ने कहा भैया वैसे आजकल तो खुले में थूकना अच्छा नहीं मन जाता, देश को स्वच्छ जो बनाना है। भैया जी ने माथे पर बल लाकर मुस्कुराते हुए नगरनिगम को पीकदान खरीदकर पुरे शहर में रखने का फोन कर दिया। दो दिन में उनके भतीजे ने सप्लाई भी कर दिए।
चिंता अब भी बनी हुई थी, नेताजी ने ओएसडी से जानकारी ली कि आखिर पब्लिक को समस्या क्या है। वे बोले सर, 5 साल पहले के शिलान्यास यूँ ही पड़े हैं, मोहल्लों में सड़कें चार साल से बन रहीं है, लोगों का चलना दूभर है, आपके कार्यकर्ताओं ने बीच शहर में कब्ज़ा कर लोगों का जीवन दूभर कर रखा है, शहर में गंदगी का अंबार लगा हुआ है लोगों का सांस लेना दूभर है, आपकी पार्टी के उचक्कों की वजह से महिलाओं का घर से निकलना दूभर, तिसपर आपने थूककर विरोध जताने का आइडिया दे दिया.....
नेताजी चिल्ला पड़े..अरे बंद करो ये दूभर-दूभर। ओएसडी डर गया, सर आपने ही बोला था, सो मैं....
अरे, वो बात नहीं है तुम दूभर की जगह कोई दूसरा शब्द यूज नहीं कर सकते क्या, इस शब्द में साला थूक उड़ता है, जो हमारे ऊपर गिर रहा है। सॉरी सर कहकर ..वो निकल गया।
जड़खरीद समर्थक कहने लगा भैया, देखिए हम आपके सामने बोलते हैं, दूभर....दूभर एक बार फिर बोलते है दूभर। हमारे मुंह से तो थूक नहीं उड़ा। वो दूभर की जगह मुश्किल, परेशानी आदि भी कह सकता था, भैया मुझे तो लगता है ये भी मुँह में थूक भरे घूम रहे हैं। दोनों एक दूसरे की ओर देखते रहे...किसी नए आइडिया के बारे में सोचने लगे। उधर जनता थूकने के लिए बैचेन है।

3 comments:

Unknown said...

Kyaa baat hai Sir gazab thukkam thukaa .....sahi sahi likh dala ...

sanjeev persai said...

Dhanyawaad ji!!!

Digvijay Singh said...

Bahut khoob..jai ho