Tuesday, March 6, 2012

ब्रेकिंग न्यूज!!! हो सकते है उत्तप्रदेश में दो मुख्यमंत्री


उत्तरप्रदेश में पूर्ण बहुमत मिलने के बाद आज मुलायम सिंह और मायावती की मुलाकात हुई. बताया जा रहा है कि इस अचानक हुई मुलाकात में उत्तरप्रदेश के भविष्य को लेकर चर्चा की गयी. सपा सूत्रों के अनुसार मुलाकात के दौरान मायावती फफक फफक कर रोने लगी तो मुलायम सिंह पिघल गए और उन्होंने मायावती के फार्मूले पर चर्चा की. जिसमें कहा गया है कि भले ही समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला है लेकिन प्रदेश में दो मुख्यमंत्री होंगे. एक नाम का मुख्यमंत्री और दूसरा काम का मुख्यमंत्री. मुलायम सिंह ने बहनजी को नाम का मुख्यमंत्री पद प्रस्तावित किया है. लेकिन बहनजी अपनी आदत के अनुसार मुफ्त में मिलेगा तो दो लूंगी की तर्ज पर चार पद नाम के मंत्रियों के भी मांग रहीं हैं. जिसे सपा नेता ने पार्टी संसदीय बोर्ड की बैठक में रखने का आश्वासन दिया है. हालाँकि सपा , क्योंकि पुराने जुगाडू अमरसिंह हर हाल में सपा को समर्थन देने की जिद थाम बैठे हैं, सपा के इनकार करने पर वे पानी की टंकी से कूदने की धमकी दे रहे हैं.

दूसरी ओर उत्तरप्रदेश में लुटिया डुबो चुकी कांग्रेस के खेमे में तेजी आ गयी है. कांग्रेस अध्यक्ष ने सबसे तेज कार्यवाही करते हुए सबसे पहले राहुल बाबा को ट्यूशन पढाने वाले दिग्गी मास्टर और बैनी मास्टर के ट्यूशन पढाने पर तत्काल पाबन्दी लगा दी है. पार्टी सूत्रों की मानें तो अब पार्टी नेतृत्व उन सभी तथाकथित हेड मास्टरों और मास्टरों की कम्बल परेड कराने के आदेश जारी करने वाला है जिन्होंने राहुल बाबा को फर्स्ट डिविजन पास कराने का ठेका लिया था. (पुंगी ho-li न्यूज)

संजीव परसाई

Saturday, January 28, 2012

आओ मुझमें समां जाओ, मुझसे प्यार करो और बर्बाद हो जाओ...

(संजीव परसाई) एक समय था जब आप घर से किराने का और जरूरत का सामान लेने निकलते थे तब हमारे हाथ में सामान की एक सूची होती थी। प्रायः सिर्फ वही सामान हमारे झोले में होता था। लेकिन आज हम घर से शापिंग करने के बहाने निकलते हैं तो घर लौटने पर हमारे पास होता है, कुछ जरूरी और बहुत सारा गैर जरूरी सामान। बहुत सोचते हैं कि यह सामान आखिर हमारे घर कैसे आ गया। लेकिन हमारे पास सिवाय खुद को कोसने और भविष्य में ध्यान रखने की कसम खाने के सिवा कुछ नहीं होता।

आखिर यह होता कैसे है? ऐसा क्यों होता है कि हम गैर जरूरी सामान भी खुशी-खुशी मनचाही कीमत देकर घर लाते हैं। बाजारवाद के इस दौर में कई बार हमें इस समस्या से दो चार होना पड़ता है। असल में यह बाजार है जो हमें दबाव में लेकर अपनी चाल चलवाता है। आंखें बंद करके सोचिये कि आपके पिता या दादाजी के जमाने में हमारे घरों में एक रेडियो हुआ करता था, जो प्रायः अगली पीढ़ी को चालू हालत में प्राप्त होता था। वह हमारी पैतृक संपत्ति होती थी, जिसकी कीमत बहुत अधिक नहीं थी लेकिन वह हमारी भावनाओं से जुड़ी थी। लेकिन बदलते हालातों में देखिये कि गरीब से गरीब आदमी भी बहुत हुआ तो छः महिने या साल भर में अपना मोबाइल हैण्ड सैट बदल ही लेता है। क्योंकि यह आज हमारी संपत्ति नहीं है, हम हर इलेक्ट्रानिक सामग्री को यूज एण्ड थ्रो वाले अंदाज में ही लेते हैं। ये तो मात्र उदाहरण है लेकिन हमारे रोजमर्रा के जीवन में ऐसी कई चीजें हैं जिनको हम तबज्जो नहीं देते हैं। ऐसा नहीं है कि हमें अपने खून पसीने की कमाई की फिक्र नहीं है या बाजार में हमें घटिया सामान मिल रहा है जो एक समय के बाद हमें मजबूरन बदलना पड़ रहा हो, बल्कि हम खुद पूरे होशो हवाश में सामान को बदलने या फेंकने को तत्पर हैं।

हर सभ्यता और संस्कृति के विकास या विनाश में बाजार की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। बाजार जहां एक ओर हमें नयी नयी सामग्री और सुविधाओं के लिये प्रेरित करता है वहीं दूसरी ओर वह हमारी आकांक्षाओं और अपेक्षाओं को पंख देता है। हम बाजार की असीम संभावनाओं के साथ उड़ना चाहते हैं, बहुत ऊँचा- अपनी सामर्थ्य के भी आगे। भयानक आर्थिक मंदी के दौर से दुनिया गुजरी तो कई देश आज तक उबर नहीं सके। लेकिन भारत पर इसका सीमित असर हुआ। तमाम विरोधाभासों के बीच भारत में मरने जीने की स्थिति नहीं बनी। इस अवस्था से भारत को निकाला भारत के मध्यम वर्ग ने जो कि अपने एक संयमित और सीमित बाजारू प्रवृत्ति के चलते अपने जीवन यापन के संसाधनों को खर्च करता है। इस वर्ग ने हमेशा अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा अपने पास बचाये रखा। इसी बचत की प्रवृत्ति ने उसे विश्वव्यापी आर्थिक मंदी से निकलने में मदद की। कोई कुछ भी कहे लेकिन सरकार को अपने देश के मध्यम वर्ग पर पूरा भरोसा था कि वह हालात बिगड़ने नहीं देगा।

बाजार ने जो दिया है उससे इंकार नहीं किया जा सकता है लेकिन बदलते आर्थिक सामाजिक हालातों में बाजार अब बेकाबू हो चला है। यों कहा जाये कि अब बाजार इस हालत में पहुंच चुका है कि सरकारें भी इस पर काबू नहीं कर सकतीं। इस बेलगाम बाजारवाद में सीमित आय वर्ग के हालात बदइंतजामी के शिकार होकर बिखरने की स्थिति में आ रहे हैं। सबसे अधिक बुरे हालात भारत के मध्यम वर्ग के होने लगे हैं क्योंकि वही वर्ग आज बाजार के निशाने पर है। कमाई के सीमित संसाधन लेकिन खर्च होने के लाखों तरीके, आखिर कैसे इसे रोकें इसे। दरअसल बाजार अब मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने पर आमादा है, अमुक चीजें खरीदो नहीं तो आपको जीने का हक ही नहीं है या अमुक चीज नहीं होने पर आपका तो जीना ही बेकार है। कोई नहीं जानता कब और कैसे इस पर काबू पाया जा सकेगा।

बाजार को दो चीजें चलाती हैं एक तो भय दूसरा लालच। लालच वह कि एक खरीदोगे तो एक मुफ्त मिलेगा। भय यह कि यह आफ़र मात्र एक हफ्ते के लिये है। हालात को बदलने में कितना समय लगेगा यह तो नहीं कहा जा सकता है। लेकिन आगे हालात और भी बेकाबू हो सकते हैं इससे किसी का इंकार नहीं। अब तो बस भय का ही सहारा है, शायद यह भय ही बचायेगा हमें बाजार की गर्त में जाने से, मध्यम वर्ग की बर्बादी का और मौत का भय।

Thursday, June 30, 2011

सरकार की जय हो....सरकार की जय हो.....


बारिश मंत्री ने अपने विभाग के प्रमुख सचिवों के साथ बैठक की. बैठक में पिछले साल के बारिश प्रभावों की समीक्षा के साथ ही इस सीजन में बारिश के होने और उसके वितरण सम्बन्धी निर्णय लिए गए. आदेशित किया गया की क्षेत्रों में बारिश की उपयोगिता की समीक्षा करके रिपोर्ट एक सप्ताह के अंदर प्रस्तुत करें ताकि बारिश का अलाटमेंट किया जा सके.

जैसे ही ये खबर विभाग से बाहर आयी, प्रशासनिक हलकों में हलचल मच गयी. सब कोई इस अवसर का भरपूर लाभ लेने के लिए लालायित था. दूसरी तरफ मीडिया अलग सक्रिय हो गया. पल पल की ख़बरों का प्रसारण होने लगा. बारिश के बंटवारे की तैयारियां शुरू की सरकार ने, उधर मंत्री और प्रशासनिक प्रमुख मीडिया को वक्तव्य पर वक्तव्य जारी करने लगे. और मीडिया लगा खोदने. इस बार का क्या बजट है, कितने डूबेंगे, कितनी बस्तियों को डूबाने का लक्ष्य रखा है, क्या पिछड़े और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लिए कोई अलग से प्रावधान किया गया है, क्या गीले और सूखे का कोई अनुपात फिक्स किया गया है. बारिश पर रोमांस से लेकर सनसनीखेज खुलासों की बाढ़ आ गयी.

आवश्यकता के आकलन के लिए तत्काल आदेश जारी कर दिए गए . फैक्स या मेल से दूर दराज तक आदेश पहुँचाने का काम होने लगा. सारे नेता और जिम्मेदार लग गए अपने अपनों को इस बारिश का लाभ दिलाने. इसके साथ ही लगने लगे बारिश के भाव, नेताओं और रसूखदारों के दरवाजों पर भीड़ लगने लगी. हर कोई इस बार की बारिश से अधिक से अधिक लाभ उठाना चाहता था. बारिश के नाम से ही जगह जगह नोटों की फसल लहलहाने लगी. विपक्ष की रूचि बारिश के बाद आने वाली बाढ़, बाढ़ राहत और सरकार की हो सकने वाली किरकिरी पर टिकी थी.

जमीनी प्रस्ताव आने लगे और मंत्रालय में बंटवारे का आधार तैयार किया जाने लगा. सर्वोच्च प्राथमिकता वाले वे क्षेत्र जिनमें सरकार की स्वयं की रूचि थी, उनमें पार्टी के प्रभाव वाले क्षेत्र, रसूखदारों और पहुन्घ वालों की गलियां, मोहल्ले, खेत और फार्महाउस, इनके साथ ही वे लोग जिनका बयाना आ चुका था आदि. दूसरे स्तर पर आये वे क्षेत्र जिन्हें सत्ताधारी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने सुझाया था आखिर उन्हें किनारे नहीं किया जा सकता उनके ही दम पर तो चुनाव लड़ना है और तीसरी स्तर पर वे क्षेत्र जिनमें धनाढ्य, उद्योगपति और बड़े किसान जो देश के कृषि विकास में अपना बहुमूल्य योगदान दे रहे थे.

अधिया-बटिया किसान संघ ने भी अपनी गुहार सरकार से लगा कर बारिश की भीख मांगी. उनकी मांग थी की पिछली दो साल से बारिश नहीं आयी है और इस साल भी हमें इससे वंचित रखा जा रहा है. संवेदनशील सरकार बोली - चिंता क्यों करते हो, दो साल से बारिश नहीं आयी, इस साल भी नहीं आएगी तो अगले साल इस क्षेत्र को असिंचित सूखा क्षेत्र घोषित कर देंगे और फिर इस जमीन का अधिग्रहण, फिर देखना तुम सब कैसे लखपति बनते हो, फिर तुम्हारी जमीन पर लगेगा बड़ा सा कारखाना, राष्ट्रीय राजमार्ग और बड़े बड़े शापिंग माल आदि .. हम तो तुम्हें लखपति बनाने का विचार रखते है और तुम हो की.......

चलो छोडो, कहो किसी कही.. सरकार बोली.

क्या कहें माई बाप – खूब कही.....और इसी के साथ दूर तक नारा गूँज उठा सरकार की जय हो.... सरकार की जय हो......

अब यह नारा सरकार के जीवन काल में और किसानों की पीढियों तक यूँ ही गूंजेगा...

*संजीव परसाई, भोपाल

Saturday, April 23, 2011

पानी - असमान वितरण व कुप्रबंधन से उपजा हाहाकार

पानी के लिये हाहाकार मचने और मचाने के दिन फिर से आ गये। अखबारों से लेकर नेट तक और भीड़ से लेकर एकाकी तक सभी जलसंकट के नाम से स्यापा करने में जुट गये हैं। इसके लिये रोज नयी नयी कहानियां और घटनाएं सामने आ रहीं हैं। निरंतर कई प्रसंग सुनने देखने को मिल रहे हैं लगता है कि अलग अलग तरीकों से इसकी विकरालता दर्शाना ही सभी का उददेश्य होकर रह गया है।
ऐसा नहीं है कि वे गलत हैं या उनकी सोच में कोई खोट है। दरअसल पहले तो यह तय करना होगा कि यह क्या वाकई समस्या है, और अगर है तो कितनी विकराल है। पिछले दिनों एक जलयोदधा अनुपम मिश्र जी से मुलाकात हुई थी। बात ही बात में वे कह गये कि पानी की समस्या लोगों की निष्ठुरता और असामाजिक मानसिकता की वजह से होती है। आज भारत के शहरों में से अधिकाँश शहर पानी की भीषण समस्या से जूझ रहे हैं। समस्या की विकरालता का अंदाजा इससे लग सकता है कि लोगों की पीने के पानी के लिये भी जददोजहद करना पड़ रही है।
असल में पानी की बर्बादी, बढ़ती जनसंख्या और पानी के स्त्रोतों के रखरखाव का अभाव इस समस्या को और अधिक विकराल स्वरूप देता है। देश के अधिकाँश शहर जल को लेकर दो भागों में बँट गये हैं एक तो वह भाग जहां पानी की आपूर्ति पर्याप्त से अधिक है, वे पानी की चिंता में दुबले नहीं होते ये प्रायः शहरों का श्रेष्ठि वर्ग होता है। दूसरा वर्ग वह है जहां पानी तो पर्याप्त होता है लेकिन उचित प्रबंधन और पानी के प्रति दया के अभाव में किल्लत झेलता है। इस बात के समर्थन में उदाहरण हमारे आसपास ही मौजूद हैं। सोच का विषय यह है कि ये दोनों वर्ग आधा किमी के दायरे में ही देखने को मिल जायेंगे। इस प्रकार देखा जाये तो पानी की किल्लत पानी की कमी की वजह से नहीं है बल्कि यह समस्या तो कुप्रबंधन और जिम्मेदारी के अभाव की वजह से हो रही है।
दो नजारे ऐसे हैं जो कि एक ही नजदीकी इलाके में देखने को मिल जाते हैं एक तो कालोनियों का जिसमें सुबह शाम गाड़ियां और फर्श धोते ओर गार्डन में पानी देने के बहाने पानी जाया करते पढ़े-लिखे लोग, दूसरे नजारे में (उसी स्थान से चंद कदम दूर ही) एक सरकारी नल पर बाल्टी, कनस्तर और प्लास्टिक के डिब्बे लिये हुये लोग जो पानी पाने के लिये किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। दरअसल ये गैरस्वाभाविक परिस्थितियाँ ही पानी के प्रबंधन और वितरण व्यवस्था की पोलें खोलती है।
निरंतर बढ़ती जनसंख्या के चलते जल स्त्रोतों पर अनुचित दबाव बन रहा है। इस दबाव के चलते स्त्रोतों का रखरखाव नहीं हो पा रहा है। आज भी देष में वर्षा का औसत 1177 मिमी के आसपास बना हुआ है। जो कि देश की आवश्यकता के लिहाज से पर्याप्त है। लेकिन फिर भी पानी के लिये हाहाकार समझ से परे है। दरअसल हमने प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग के लिये न तो कोई रणनीति बनायी है न ही उनके समुचित दोहन के लिये कोई प्रक्रिया, सब मनमर्जी से चल रहा है।
हर साल गर्मियों के आते ही हालात बद से बदतर होने की खबरें सुनने को मिलती हैं जो मानसून की दस्तक के साथ ही गायब हो जाती हैं। हालात बेहतर बने रहें इसके लिये प्राकृतिक संसाधनों के प्रति संवेदनशीलता की आवश्यकता है, आखिर सवाल आने वाली पीढ़ी का भी है। यह तय है कि जल संरक्षण और प्रबंधन व्यवहार में लाने की चीज है जो सारी समस्याओं से निजात दिलाने के लिये पर्याप्त है।

संजीव परसाई

Thursday, April 21, 2011

नेट पत्रकारिता - हकीकत समझना जरूरी है

भारत में इन्टरनेट के प्रारंभिक दौर में इसका उपयोग सर्वाधिक अपनी सेक्स सम्बन्धी जिज्ञासाओं और मनोभावों की तृप्ति के लिए किया गया, समय बदला आज सुनते है कि नेट का दर्शक या उपयोगकर्ता परिपक्व हो रहा है. लेकिन इसके विपरीत देखने में यह आ रहा है कि अभी भी घटिया और मसालेदार, अटपटे सेक्स, जघन्य हत्या, हसीनाओं के चालू रोमांस, सेलिब्रिटी के नखरे आदि ख़बरों को ही सबसे अधिक हिट्स प्राप्त होते हैं, जिसके चलते अधिकांश वेब साइटस अपना कंटेंट और शीर्षक उसी तरह से लगा रही हैं. वहीँ दूसरी ऑर बेमिसाल और ज्ञान वर्धक सामग्री से भरी पड़ी वेबसाईटस पर र्लोग झाँकने भी नहीं आ रहे है, समाचारों में भी प्रायः यह देखा जा रहा है कि प्रमुख ख़बरों के बजाय हलकी ख़बरों और सडक छाप शीर्षक से डाली गयी ख़बरों को अधिक पढ़ा जा रहा है. उदाहरण के लिए जब दुनिया भर में टू जी घोटाले की ख़बरें लिखी और पढ़ी जा रही थीं, मीडिया इन ख़बरों को अधिकांश लोगों तक लाने में जी जान एक कर रहा था, ठीक उसी समय एक मनोविकृत व्यक्ति द्वारा अपनी पत्नी के साथ सेक्स के दौरान की गयी हत्या नेट पर सर्वाधिक पढ़ी गयी ख़बरों में रही.

सबसे अधिक दुर्गति के शिकार हिंदी समाचार की वेबसाइट्स हो रहीं हैं, अंग्रेजी साइट्स से मुकाबले के चलते इन्होने अपने मूल स्वरुप को ही बदल डाला और प्रतियोगिता के चलते अंग्रेजी साइट्स से एक कदम आगे भी निकल गये. परिणाम ये हुआ कि इन्हें दर्शक तो मिले लेकिन वो किसी काम के नहीं निकले. न तो उनसे किसी रेवेन्यू की ही आशा थी न ही किसी गंभीरता की. हिंदी समाचारों पर प्रतिदिन आने वाली टिप्पणियों से अंदाजा लगाया जा सकता ही की यह दर्शक किस कदर अगंभीर है. लेकिन लब्बो लुआब यह है की नेट के उपयोगकर्ता को अभी और समझदार होना बाकी है. ताजा उदाहरण एक वरिष्ठ राजनेता के अवसान की खबर से देखने को मिला, इस खबर पर भी असंवेदनशील टिप्पणियाँ की गयीं, जो दर्शकों की अपने आप में व्याख्या करतीं हैं. आखिर ये दर्शक कौन है जिसके लिए इतने बड़े पैमाने पर बदलाव किये जा रहे हैं, कि समाचार चैनलों को अपने कंटेंट बदलने पड़ रहे है और वेब साइट्स उसकी भूख मिटाने को तत्पर हैं? इसी दौरान इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने चौबीसों घंटे चलने वाले प्रसारण के चलते ख़बरों को मनोरंजन से जोड़ना शुरू कर दिया, धीरे धीरे यह रेखा महीन होती चली गयी आज अंतर करना मुश्किल हो जाता है की यह खबर है या कि विशुद्ध मनोरंजन. इसके बाद इसे एक परंपरा के रूप में ग्रहण कर लिया गया. आज नेट ख़बरों में हिट्स एलिमेंट पर जोर दिया जाना इसी परंपरा का हिस्सा है.

दरअसल इसके मूल में नेट कंटेंट पर कोई कानूनी पकड़ का न होना है, हर वेबसाईट की प्राथमिकता होती है की वो सबसे अधिक दर्शकों के द्वारा देखी जाये. जिसके चलते जाने अनजाने में मीडिया सरोकारों की मूल भावना का उल्लंघन हो जाता है. वैसे इसकी शुरुआत इलेक्र्टानिक मीडिया से मानी जा सकती है जब दूरदर्शन के दौर को भुलाने में लगे टीवी चैनलों ने प्रतिस्पर्धा के चलते भूत, पिशाच, सेक्स, अपराध, जादू आदि को बढ़ा चढ़ा कर दर्शकों के सामने पेश किया और खूब टीआरपी बटोरी. उसी दौर में नेट का प्रादुर्भाव हुआ और जाने अनजाने में वो भी उसी राह पर निकल पड़ा.

अब दुनिया, देश और समाज बदल रहे है, शारीरिक आवश्यकताओं के साथ बौद्धिक आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त जगह बन रही है. यह दौर नेट पत्रकारिता में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण साबित होने वाला है, क्योंकि इस दौर में इस माध्यम को एक ऐसा दर्शक वर्ग मिल रहा है जो टेक्नोलोजी को बेहतर समझता है और उसके पास विश्लेषण करने की क्षमता कई गुना अधिक है. आज का युवा जिस गति से चीजों पर अपनी पकड़ बना रहा है शायद वो ही नेट पत्रकारिता को भविष्य में स्थापित करेंगी. इस दिशा में सभी को मिलकर प्रयास करना होगा, इस हेतु एक ऐसी रणनीति बनाई जा सकती है जो न सिर्फ उपयोगकर्ता की जरूरतों को ध्यान में रखे वरन सामग्री पर भी पकड़ बनाये रखे. जो वेबसाइट्स इस तथ्य को समझ चुकी हैं वे स्वयं अपने लिए मानदंड तय कर चुकी है और सम्मान प्राप्त कर रही है. बाकी को भी समझना चाहिए.

संजीव परसाई