Thursday, March 16, 2017

घुइयाँ छीलने का काम...

(संजीव परसाई) हमारा लोकतंत्र कितना समृद्ध है यह इस बात से पता चलता है की हम हर नेता को कम से कम 5 साल का समय देते हैं। सत्ता की मौज लूटने वाले चुनाव हारने के बाद स्वयं को लोकतंत्र की रक्षा में खपाने के बजाए घर बैठकर घुइयाँ छीलना पसंद करते हैं। हालाँकि लोकतंत्र एक सक्षम विपक्ष की अपेक्षा से इनके सिर्फ एक बार जीतने पर आजीवन  उनका बोझा ढोने की गारंटी देता है, पर उन्हें सिर्फ सत्ता का सुर ही सुहाता है। जो विचारधारा सत्ता काल में पींगें भर रही होती है वह चुनाव हारने के बाद बेसहारा हो जाती है.
चुनाव में नकारे जाने पर अपनी विचारधारा को दोषी ठहराकर घुइयाँ छीलने का बहाना बनाते हैं।

एक - वो चुनाव हारता है तो वो अपने घुइयाँ मंदिरों के आगे या अपनी गद्दी पर बैठकर छीलता है. मातृ परिवार सत्ताकाल में उसे अड़चन महसूस होता है, सत्ता न होने पर वह उसके नजदीक दिखाई देने की कोशिश करता है। इस दौरान अपेक्षाकृत नरम स्वर व सौहाद्रपूर्ण रवैये से पेश आता है। भगवान् की बात करता है, गली नुक्कड़ चौराहों धार्मिक आयोजन कराता है. इस दौरान उसे हिन्दू धर्म कुछ अधिक मुश्किल में लगता है। वो अपनी घुइयाँ लेकर अन्य छोटे दलों के दरवाजे पर भी जाता है. अगर उन्होंने इजाजत दे दी तो वे कुछ समय वहीँ बैठकर छीलते हैं. घुइयाँ छीलते वह अपने बंधू बांधवों को भी साथ ले जाते हैं. सब मिलकर घुइयाँ छीलते समय जोर जोर से चिल्लाते हैं, जिससे भय का वातावरण निर्मित होता है।  इससे तंग आकर अन्य राजनीतिक दल इनको अपने साथ घुइयाँ छीलने की इजाजत नहीं देते हैं.

दो- इनका घुइयाँ छीलने का काम बड़ी तेजी से चल रहा है, अगर ऐसा ही रहा तो अगले कुछ सालों में उनके पास इसके अलावा और कोई काम नहीं बचेगा. ये इस दौर में भी लोगों से मालिक की तरह ही व्यवहार करते हैं. उनकी ठसक कभी कम नहीं होती यही इनका अंदाज है. ये अपने काम में इतने प्रवीण हैं की सत्ताकाल में भी घुइयाँ छील सकते हैं. सत्ता जाने के बाद भी इनके ठाठ कम नहीं होते है, वे हमेशा अपने एसी चेंबर में बैठकर ही घुइयाँ छीलना पसंद करते हैं. इस दौरान वे अपनी कथित प्रजा को पर्ची भेजने के आधा घंटा बाद ही छीलन कक्ष में प्रवेश देते हैं. इनका हमेशा प्रयास यह होता है कि अन्य छोटे दल अपनी घुइयाँ लेकर इनके पास बैठकर ही छीलें, इक्का दुक्का दल एसी और चायपानी के लालच में इनके पास गए भी लेकिन बाद में पता चला की उन्होंने इस बहाने अपनी घुइयाँ छीलने के काम में ही लगा दिया, उनकी घुइयाँ तो पड़ी रह गई, सो वे खीझकर भाग निकले. वे प्रायः अपने साथियों से भी खीझे खीझे रहते हैं, उन्हें हमेशा यह लगता रहता है कि सत्ता काल के मजे उनके साथियों ने अधिक लिए हैं, सो वे मौके बे मौके उनसे रूठकर घुइयाँ छीलने का बहाना ढूंढते हैं. 

तीन- सबसे अनूठी दुनिया इन्ही की है, उन्होंने यह मान लिया है की उन्हें अधिकांश समय घुइयाँ ही छीलना है, सो वे अपने खर्चे सीमित रखते है, उन्हें चिंता तो उस समय की होती है जब वे सत्ता में होते हैं. इन्होने घुइयाँ छीलने के लिए मुफीद जगहों की स्थाई जुगाड़ कर रखी है . सामान्यतौर पर वे पार्टी दफ्तर  में ही इस काम को अंजाम देते है, या फिर देर सबेर वे शहरों के मजदूर संघों के दफ्तरों में, विश्वविद्यालयों के केन्टीन या कॉफ़ी हॉउस में घुइयाँ छीलते पाए जाते है. इनको काम में तल्लीनता  के लिए कॉफी के साथ तम्बाखू के धुंए की दरकार होती है, खाने की कोई खास चिंता नहीं. घुइयाँ छीलने के दौर में ये अपने सगे भाइयों की विचारधारा से सहमत हो जाते हैं, बाकी वे दुनिया में हर एक को दुश्मन मानने के लिए बाध्य हैं.

चार- ये सबसे उलट हैं, वे घुइयाँ छीलते जरुर हैं लेकिन किसी को महसूस नहीं होने देते, वे छिपकर घुइयाँ छिलते हैं. सत्ता से बाहर रहने का समय इनके लिए विपत्ति काल होता है,  इस दौरान उनको अपने समर्थकों को संभालना खासा मुश्किल होता है. अतः वे इस दौरान घुइयाँ छीलने के छोटे छोटे ठेके अपने समर्थकों को दे देते हैं, ताकि वे व्यस्त रहें और किसी तरह से विपदा काल कट जाए। इन दलों में आज भी सुप्रीमो परंपरा जारी है। इसके अनुसार सुप्रीमो खुद बीच में बैठकर अपने चारों ओर बचे-खुचे समर्थकों को बिठाकर उनसे घुइयाँ छिलवाता है और वे यहाँ वहाँ भागते हैं। हालाँकि राष्ट्रीय दल इनको घुइयाँ छीलने का काम स्थाई तौर पर आवंटित करना चाहते हैं।

लोकतंत्र में सत्ता के साथ विपक्ष को भी जिम्मेदार भूमिका दी गई है, लेकिन विपक्ष के पहले चार साल घुइयाँ छीलने में और बाकी का एक साल अगले चुनाव की तैयारी में निकल जाता है. इस दौरान उन्हें अपने धंधे ठेके भी सही करने होते हैं। विचारधाराओं के लिए घुइयाँ छीलना एक अनिवार्य परिघटना है, इससे उसे आत्मबल मिलता है. कभी कभी परिपक्वता के अभाव में भी विचारधाराएँ घुइयाँ छीलने को मजबूर होती है। बेंजामिन फ्रेंकलिन ने कहा था की घटिया सरकार और नदी दोनों में हल्की चीजें ऊपर होती हैं. राजनीतिज्ञ अपनी हार के दिनों को अवसर के रूप में लेकर अधिक से अधिक हल्का होने की कोशिश करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं की भार उन्हें और नीचे ही ले जायेगा. हर दल अपने इन दिनों की तैयारी हमेशा रखते हैं, जैसे हम साल भर का किराना बारिश के पहले भर लेते हैं, ठीक वैसे ही।

Monday, March 6, 2017

राजनीति में थूकने का महत्त्व..

(संजीव परसाई) नेता चुनाव के दौरानअपने ऊपर लगे आरोपों से व्यथित था। असल में वो आरोपों से ज्यादा इस बात से व्यथित था कि टेंडर का पेमेंट भी पूरा नहीं हुआ था और चुनाव की अधिसूचना लग गयी थी। मिला तो कुछ नहीं , हल्ला ज़माने भर का हो गया। वो दिनभर प्रचार करता, शाम को पार्टी कार्यालय आकर हल्का होता और बिफर बिफर के कुल्ला करता फिर घर जाता। चमचे निहाल होकर कहते- भैया का हिसाब बढ़िया है, पेट और मुँह हल्का करके ही घर जाते हैं। आज तो भैया ने सारे विपक्ष की लंगोट ही खेंच ली। भैया ने आज सबके मुंह पर चार लिवर का ताला टांग दिया।  ऐसा का कह दिया बे, सबने पूछा तो दूसरा बोला - भैया ने सारे विरोधियों की माँ-बहन को याद करते हुए कहा कि - तुम सब साला हमारी बढ़ती इमेज से बौखलाया हुआ है, हम तुम सब पर थूकते भी नहीं हैं। अबे देखा नहीं का बे, टीवी पर तीन बजे से पट्टा चल रहा है, आज तो थूकने के बयान से भैया छाए हुए हैं। टीवी की मैडम तो भैया का इतने बार नाम जप लिए हैं कि भौजी को जलन ही होने लगे।
दूसरी ओर विपक्षी कौन से कम थे, शाम होते होते उन्होंने ये कहकर सनसनी फैला दी कि - हम और जनता दोनों इनके ऊपर ही थूकेंगे। जब सोशल मीडिया नहीं था तब कस्बों की लड़कियां , छेड़ने वाले छिछोरों का विरोध थूककर करतीं थीं, अब तो सीधे पुलिस हेल्प लाइन को टैग कर देती हैं। सो हर हथकंडे अपना चुके नेता ने भी ठान ली कि विपक्षी पर थूकुंगा भी और मानूँगा नहीं, दूसरी ओर जनता नेताओं की हरकतें और ओछे बोल देख-सुनकर अपने मुँह में ढेर सारा थूक भरे घूम रही है। कहाँ थूके, बस जगह और मौके की तलाश में है। नेता बिरादरी यह जानकर सकते में थी, भैयाजी के सूत्रों ने उनतक भी यह खबर पहुंचा दी। उनका एक जड़खरीद समर्थक बाजार से बड़ी साइज़ का पीकदान ले आया। बोला कोई चिंता नहीं भैया जी, इसे साथ में लेकर चलेंगे। जिसको थूकना हो इसमें थूके। साइडवाले ने कहा भैया वैसे आजकल तो खुले में थूकना अच्छा नहीं मन जाता, देश को स्वच्छ जो बनाना है। भैया जी ने माथे पर बल लाकर मुस्कुराते हुए नगरनिगम को पीकदान खरीदकर पुरे शहर में रखने का फोन कर दिया। दो दिन में उनके भतीजे ने सप्लाई भी कर दिए।
चिंता अब भी बनी हुई थी, नेताजी ने ओएसडी से जानकारी ली कि आखिर पब्लिक को समस्या क्या है। वे बोले सर, 5 साल पहले के शिलान्यास यूँ ही पड़े हैं, मोहल्लों में सड़कें चार साल से बन रहीं है, लोगों का चलना दूभर है, आपके कार्यकर्ताओं ने बीच शहर में कब्ज़ा कर लोगों का जीवन दूभर कर रखा है, शहर में गंदगी का अंबार लगा हुआ है लोगों का सांस लेना दूभर है, आपकी पार्टी के उचक्कों की वजह से महिलाओं का घर से निकलना दूभर, तिसपर आपने थूककर विरोध जताने का आइडिया दे दिया.....
नेताजी चिल्ला पड़े..अरे बंद करो ये दूभर-दूभर। ओएसडी डर गया, सर आपने ही बोला था, सो मैं....
अरे, वो बात नहीं है तुम दूभर की जगह कोई दूसरा शब्द यूज नहीं कर सकते क्या, इस शब्द में साला थूक उड़ता है, जो हमारे ऊपर गिर रहा है। सॉरी सर कहकर ..वो निकल गया।
जड़खरीद समर्थक कहने लगा भैया, देखिए हम आपके सामने बोलते हैं, दूभर....दूभर एक बार फिर बोलते है दूभर। हमारे मुंह से तो थूक नहीं उड़ा। वो दूभर की जगह मुश्किल, परेशानी आदि भी कह सकता था, भैया मुझे तो लगता है ये भी मुँह में थूक भरे घूम रहे हैं। दोनों एक दूसरे की ओर देखते रहे...किसी नए आइडिया के बारे में सोचने लगे। उधर जनता थूकने के लिए बैचेन है।

Sunday, March 5, 2017

फूले पेट - फूले दिमाग

(संजीव परसाई) समाज विज्ञानी कहते रहे हैं कि अगर देश को आगे ले जाना है तो बच्चों के पोषण और शिक्षा पर पूरा ध्यान देना होगा।  गूढ़ार्थ यह है कि फूले पेट और फूले दिमागों से न देश बनता है न समाज। जिनको कहना था, वो तो कहकर चले गए, पर देश तो सरकार को चलाना है। आज देश में अगर कोई सबसे ज्यादा व्यस्त सरकारी महकमा है तो वे ये शिक्षा और पोषण ही हैं। इससे ये अंदाजा मत लगाना कि देश में शिक्षा और पोषण का स्तर सुधार पर है। शिक्षा के लिए जिम्मेदार शिक्षक और पोषण के लिए जिम्मेदार आंगनवाड़ी कार्यकर्ता सबसे अधिक व्यस्त हैं। मजे की बात तो ये है कि ये अपने मूल काम के अलावा सारे काम करते हैं।
दूसरे विभागों की योजनाओं का क्रियान्वयन करवाने, अजीबोगरीब सर्वे से लेकर जनधन खाते खुलवाने तक का काम आंगनवाड़ी कार्यकर्ता से करवाए जाने की परंपरा है। उसपर विभाग कुपोषण के लिए इनको ही डांटता है। राज्यों में कुपोषण की सांप सीढ़ी चल रही है, कभी कोई ऊपर तो कभी कोई नीचे। कुछ सरकारों ने अपने लिए कुपोषण के स्थाई प्रमाणपत्र बनवा के रखे हैं। नवजात बच्चों का मरना अब सरकार और समाज के लिए आम घटना हो गयी है। अगर हफ्ते भर कुपोषित बच्चों के मरने की खबर न आए तो महकमा और सरकार जश्न मनाने लगता है। बड़े बड़े ठेकेदार पोषण आहार की चिंता में घुले जा रहे हैं। चवन्नी भर पोषण से कुपोषण की जंग लड़ी जा रही है, दूसरी ओर एक वर्ग अतिपोषण का शिकार होकर चिंतित हैं।

सरकारी शिक्षकों को दूसरे ढेरों काम में लगाना सरकार के शौक में शुमार है। कहते हैं अच्छा छात्र वो है जो शिक्षक होकर सोचे और अच्छा शिक्षक वो है को जीवनभर छात्र बना रहे। यहाँ शिक्षक के पास पढ़ने-पढ़ाने के अलावा क्लर्की से लेकर घर घर घूमने के कई काम थोप दिए गए हैं। अब जो समय बचता है, उसमें वो बस गहरी सांस ही लेता है। शिक्षा का जितना कबाड़ा मैकाले ने नहीं किया होगा, उससे अधिक शिक्षा तंत्र को चलाने वालों ने कर दिया। अब हमारा लक्ष्य प्लास्टिक के नागरिक सृजित करना होना चाहिए। शिक्षकों ने इस देश में गुरुदेव से लेकर शिक्षा कर्मी तक का सफर तय किया है। आज वे आदरणीय गुरूजी से सुन बे मास्टर तक खींचकर पटक दिए गए हैं, अब आगे कुछ बचा नहीं है सो इससे नीचे जाने की संभावनाएं नगण्य हैं। अब सरकार स्कूलों में सड़क पर घूम रहे स्वयंभू ज्ञानियों को ठेल रही है। सरकार समझती है कि शिक्षक तो कोई भी हो सकता है। शिक्षकों की जरुरत ख़त्म हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। अगर ऐसा होता है तो सरकार कई झंझटों से मुक्त हो जायेगी। जब शिक्षा ही न होगी तो सिर्फ कर्मी से काम चल जायेगा। फिर ये नाम के शिक्षक, नेताओं अफसरों की गालियाँ भी ख़ुशी से सुन लेंगे। सरकार चाहे तो इस पद पर हम्मालों और तुलावटियों की नियुक्ति कर सकती है। आला अधिकारी गाहे-बेगाहे मान लेते हैं कि शिक्षक स्तरीय नहीं हैं, दरअसल शिक्षकों के गुरुत्व को जड़त्व में लाने वाले भी वे ही हैं। तभी वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाते हैं। सरकारी स्कूल तो गरीबों और भिखमंगों के लिए हैं मंत्रियों और आला अफसरों के बच्चे तो सुरम्य वादियों में बने अंग्रेजी स्पीकिंग स्कूलों में पढ़ते हैं। सही भी है देश के हर बच्चे को अफसर और नेता थोड़ी बनना है, कुछ प्रजा होने के लिए भी तो होना चाहिए।
अब आप पोषण और शिक्षा में गुणवत्ता की उम्मीद करते हैं। असल में ये दोनों प्रतियोगिता में हैं कि कौन अधिक फूले पेट तैयार करता है और कौन फुले हुए दिमाग। जो तंदरुस्त रहकर अच्छी शिक्षा लेंगे वो विकास की बुलेट ट्रेन में बैठेंगे, जिनसे न हो पाया उनके लिए बस और ट्रेन का सामान्य दर्जा तो है ही।

Wednesday, March 1, 2017

अभी भी समय है, संभल जाइए...

(संजीव परसाई) एक लड़की, जो हमारी बहन, बेटी भी हो सकती है। वो किसी एक विचार से सहमत नहीं है सो उसके दो साल पुराने वीडियो में से सिर्फ एक स्लाइड निकालकर उसे देशद्रोही बता बतात्कार की धमकी देना कितना जायज है।
यह किसी के पक्ष-विपक्ष में नहीं है, यह मेरे देश के बारे में है। हम सामान्य तौर पर सोशल मीडिया को एक पूरा संसार समझ लेते हैं, तब ये भूल जाते हैं कि इसका आजकल व्यापारिक और राजनीतिक उपयोग भी हो रहा है। निठल्ले नेता जो जमीन पर जनता के लिए कुछ नहीं कर पाते वे अपनी छबि को चमकाने और विरोधी को बर्बाद करने के लिए भी इसका उपयोग करते हैं, और हम भावनाओं में बह जाते हैं।

सेलिब्रिटी आजकल पैसे लेकर बयान देने का धंधा करते हैं। राजनीतिक दल, सोशल मीडिया कंपनियां इसके लिए खासा पैसा देते हैं इनको। कोई बुराई नहीं है, पैसे लेकर बयान दो, लेकिन जब आपके विचारों से आग लगना तय है तब आपसे थोड़ी समझदारी की अपेक्षा की जाती है। बिना जाने समझे या सिर्फ किसी के इशारे पर किसी भी बात पर बोल पड़ना ही ज़हालत है। अब दो दिन बाद आपने अपनी गलती मान ली, सोचिये अगर इन दो दिनों में उस लड़की (हमारी बहन या बेटी) या दूसरे युवाओं के साथ कुछ गलत हो जाता तो, उसका जिम्मेदार कौन होता। किसी को वोट मिल गए किसी को नोट मिल गए, हमें क्या मिला। हाँ इतना जरूर हुआ कि हमने दो दिनों में आधे देश को देशद्रोही ठहरा दिया। आठ-दस दिन में सब विवाद खत्म हो जायेगा, तब न कोई आरोपी होगा, न आरोप लगाने वाले।

अभी भी संभल जाइए कि सोशल मीडिया पर जो चल रहा है, वो पूरा सच नहीं है, इसमें नेताओं और धंधेबाजों के स्वार्थ शामिल हैं, जो किसी दिन आपको, किसी अपने को खोने को मजबूर कर सकते हैं। आपको बैचेन करके उन विषयों से ध्यान  हटाया जा रहा है, जिनके बारे में आपको सवाल करना चाहिए। इस गोरखधंधे में पक्ष विपक्ष सब शामिल हैं। ध्यान रखें कि सोशल मीडिया पर अफवाहों से देश को बरबाद किया जा सकता है, लेकिन बनाने के लिए आपको हमको इससे बाहर निकलना होगा।

सोशल मीडिया पर मजे लो, अच्छा पढ़ो, अच्छा सोचो, अच्छा लिखो, लेकिन इन विचारों के कालाबाजारियों  और अफवाहों से बचें। इस देश और देशवासियों में भरोसा रखिए इस देश को किसी से खतरा नहीं है, हमारी बुनियाद चट्टान की तरह मजबूत है, और चट्टान दो चार साल में नहीं हजारों सालों में बनती है। 

Sunday, February 26, 2017

ये जो देश है मेरा

(संजीव परसाई) आजकल देश के प्रति चिंता दिखाने का रिवाज है, सो मैं नियमित चिंतन करता हूँ। असल में इस देश में अब तक देश की समस्याओं पर चिंता करने का रिवाज था। हम सब समय रहते समझ गए की इन समस्याओं का तो कुछ होना नहीं है, सो चिन्ता देश की करो। सब देश के पीछे पड़ गए, अब जो समस्याओं की बात करेगा उसे बाहर का रास्ता दिखाओ।
चलो.. आगे चलो भाई...समर्थन में या डर में देश की चिंता चहुँ ओर की जाने लगी।

नेताओं के भाषणों में देश चिंता को बढ़ा-चढ़ा कर उठाया जाने लगा। वे अब अपेक्षाकृत सुरक्षित महसूस करने लगे। उनके आत्मविश्वास का आलम ये कि एक बार हल्कू किसान अपनी बर्बाद फसल का रोना रोने आया तो, नेताजी ने उसे उल्टा ठाँस  दिया। अरे मूढ़मति एक तो तूने देश का नुस्कान कर दिया और यहाँ छाती पीट रहा है। देश को देख और लग जा दुबारा, देश के निर्माण में।
चल अपना काम कर......हल्कू नेताजी की बात को दिल पर लेकर अगली फसल के लिए कर्ज लेने साहूकार के दरवाजे पर जा पहुंचा।

अब वो समय आ गया है जब बेरोजगार, महिलाएं, दलित, पिछड़े, आदिवासियों को अपनी समस्याएं भूलकर से देश के बारे में सोचना चाहिए। उन्हें खुद के पेट में रोटी ठूसने के बारे में सोचने के बजाय देश की जीडीपी बढ़ाने के उपायों के बारे में सोचना चाहिए। खाते खाते तो सालों हो गए, अब सरकार द्वारा खुलवाये खातों में पैसे डालने के बारे में भी सोचना चाहिए।
क्यों, तुम्हारी समझ में नहीं आया क्या अब तक कि देश वो है जिसका विकास करना है, बाकी सब जिम्मेदारियां हैं।

असल में अब सबको समझना चाहिए कि हम वोट देकर अपने लिए एक नया बॉस चुनते हैं, जो पांच साल तक हमको समझाता है कि जो चल रहा है, वही श्रेष्ठ है। खुशहाली और मुस्कुराते चेहरे बने रहें उसके लिए वह विरोधियों पर चुटकुले सुनाता है, कोई रोता है तो उसे  गुदगुदाता है। जब लोग रोते-रोते हँसते हैं, तब बॉस उछल जाते हैं।
क्यों बे तू अभी तक यहीं खड़ा है, तब आकाशवाणी होती है कि बाकी तो सब ठीक है, पर कुछ ऋणात्मक सोच के लोगों को ही समस्या है।

मध्यम वर्ग अपनी समस्याएं किसी से नहीं दिखाता, और ऊपर से सुखी दिखने का ढोंग करता है। रंग-रोगन से वो अपनी परेशानियों को ढांक लेता है। आजकल मुस्कराहट ऑनलाइन मिल रही है, वो अपने परिवार में सारे सदस्यों के लिए खरीद लेता है, और वे घर से निकलने पर वो मुस्कराहट अपने चेहरे पर लगा लेते हैं। ऑनलाइन मिली इस मुस्कराहट लगाकर सेल्फी अच्छी आती है, वो गदगद हो जाता है। सब ताली बजाते हैं , देश आनंद में है। वो खुद को देश समझता है, सब्जी वाले से झगड़ कर दस-बीस रुपए कम करवा लेता है, किराने वाले से उसके फायदे में से डिस्काउंट की मांग करता है, घर में आने वाले प्लम्बर, इलेक्ट्रिशियन, माली, झाड़ू-पोंछा, भोजन वाले सब से पैसे को लेकर झिक-झिक करता है । इस प्रकार महीने में हजार-आठ सौ रुपए का योगदान देश के लिए देता है। चुप...बिलकुल चुप..अब आवाज नहीं आना चाहिए।

रात टीवी पर प्रधानमंत्री गरज रहे थे। भ्रष्टाचारियों को नहीं छोडूंगा, सो खुद को भ्रष्टाचारी मानने लगा। अपने किए भ्रष्टाचार की लिस्ट बनाने बैठ गया। जब लिस्ट लंबी होने लगी तो घबरा कर उसे फाड़ कर फेंक दिया। सोया तो सपने में देश आया। पूछने लगा - कैसा है बे? आजकल देश ऐसे ही बात करता है।  मैंने कहा- रीढ़ की हड्डी टूटी है, बहुत दर्द है कहकर रोने लगा। कहने लगा- देख रीढ़ तेरी और मेरी दोनों की टूटी है। लेकिन अंतर देख तू बिस्तर पर पड़ा रो रहा है और लेकिन मैं न तो रो सकता हूँ न बिस्तर पर पड़ा रह सकता हूँ सो अब भी लगातार दौड़ रहा हूँ। मेरा दर्द जाता रहा अब पहले से बेहतर महसूस कर रहा हूँ।

Friday, February 3, 2017

चिंता मिट्टी मिलाने वालों की भी.....

(संजीव परसाई) एक गाली है, माटी मिला, सामान्यतौर पर इसका प्रयोग महिलाएं तब करती हैं, जब वे किसी पुरुष से बुरी तरह गुस्सा जो जाती हैं। इसका भावार्थ भी बताते चलूँ, ताकि सनद रहे। इसका मतलब होता है किसी के मिट्टी में मिलने की कामना करना।
ये याद यूँ आया की हमारे प्रदेश के किसानों ने सोसायटी के माध्यम से सरकार को गेहूँ बेचा, लेकिन ऊपरी स्तर पर पता चला कि उस गेहूँ के बारदानों में वजन बढ़ाने के लिए मिट्टी मिलाई गई थी। विभाग ने जाँच में पाया कि इसके लिए कोई जिम्मेदार नहीं है।
आजकल ये बहुत हो रहा है, एक नसेड़ी ने सड़क पर सोते लोगों पर गाड़ी चढ़ाकर मार डाला, उसी ने अवैध हथियार से संरक्षित काले हिरण को मार-खाया, 2जी-3जी घोटाले करके लोगों ने अपने घर भर लिए, कोयला का भण्डार चार पैसे में खरीदकर डकार गए, काबिल लोगों के हिस्से की नौकरी अधिकारियों और नेताओं ने बेच खाई, सरकार के एक निर्णय ने पूरा देश लाइन में लगा दिया, लोगों ने अपनी खरी कमाई के पैसे पाने के लिए डंडे खाए और सैकड़ा से ऊपर मर गए आदि आदि, सुकून की बात ये है कि ये सभी और किसानों के गेहूँ में मिट्टी मिलाने वाले तक कोई भी जिम्मेदार नहीं है।
असल में देश के तंत्र में मिट्टी मिलाने वालों का एक देश व्यापी संगठन है। जो न सिर्फ एक दूसरे से संसाधन बांटते है बल्कि वे सरकारी तंत्र के दुरूपयोग करने की विधियां भी एक-दूसरे को सिखाते हैं। ये देश का इतना काबिल तंत्र है जो गरीब बच्चों के पोषण आहार, गरीबों की दवाइयां, राशन का अन्न, मजदूरी, नमक, गरीबों की योजनाओं तक में मिट्टी मिला देता है। देश में इसके लिए कोई भी जिम्मेदार नहीं होता, भले ही देश का बच्चा बच्चा जानता हो कि इस सब के लिए कौन जिम्मेदार है।

मैं भी नेताओं की तरह दूरदर्शी हूँ और देश के विकास के लिए सुझाव दे सकता हूँ। मुझे लगता है कि आने वाली पीढ़ी को इसके लिए बाकायदा प्रशिक्षण दिए जाने की आवश्यकता है। क्योंकि बाप के पैसे से खरीदी हर्ले डेविडसन पर फर्राटे भरने वाली पीढ़ी ने तो गांव, किसान, राशन की दुकानें, सरकारी अस्पताल और ऑफिस देखे ही नहीं हैं, जो कमाई के बड़े स्रोत हैं। आखिर ये भोले नौनिहाल अपने बापों का कमाया हुआ कब तक खाएंगे। बेहतर होगा कि सरकार देश के छटे हुए लोगों के बच्चों को मिट्टी मिलाने की कला सिखाने के लिए एक प्रबंधन कोर्स प्रारम्भ करे, ताकि इनका भी जीवन सुखमय रहे। क्योंकि जीडीपी में योगदान तो इनको ही देना है, बाकी तो देश पर बोझ हैं।

Wednesday, February 1, 2017

जबर्दस्ती का विकास ...


(संजीव परसाई) नेताजी का नगरागमन लोकतंत्र में एक अनोखी घटना है। ये प्रायः सुविधा, लाभ-हानि या चुनाव की तिथियों पर निर्भर करती है। नेताजी के प्रथम नगरागमन की चहुँ ओर चर्चा थी। नेताजी के उपकृत हुए और उपकृत होने की लालसा पाले लोग दौड़ दौड़ कर तैयारियां कर रहे थे। हरकोई दूसरे से अव्वल आना चाह रहा था। पार्टी कार्यकर्ता नाक भौं सिकोड़े खड़े थे, वे बस अपनी मौजूदगी देकर ही इस स्वागत समारोह को सफल बनाने के पक्षधर थे। चारों तरफ जयकारे के पोस्टर, आदमकद कटआउट, होर्डिंग, बैनर लगे होने से नेताजी के कद का अहसास हो रहा था। इस कद के सामने नगर का आम आदमी खुद को बोना और कमजोर समझ रहा था।

अचानक ही कारों के सायरन बज उठे, जिनसे दुंदभी का सा अहसास हुआ। रास्ते जाम हो गए, निर्दयता से ढोल पीटे जाने लगे, आम आदमी डरकर अपने घर में दुबक गया। चमचे स्वागत स्थल की ओर दौड़े , लोगों से सार्वजनिक अपील की जाने लगी कि वे शीघ्र सभा स्थल पर पहुंचें। नेताजी अपनी पोर्शे गाड़ी में नगर भ्रमण पर थे, उन्हें देखकर भगवान बुद्ध की सिद्धार्थ के रूप में नगर भ्रमण की याद ताजा हो गई। वे गरीबों से उनकी समस्याओं के बारे में पूछते लोग उन्हें अपना हाल बताते, वे चकित होते, अनभिज्ञता दिखाते, नाक पर रुमाल रखते, लोगों को लगता वे दुखी हो रहे हैं।
एक कार्यकर्त्ता ने नेताजी के काफिले को झुग्गी बस्ती की ओर मोड़ दिया। समर्थकों ने अपनी नाक ढंकी, नेताजी ने नाक पर रखा रुमाल जोर से दबा लिया। लोगों ने कहा पानी नहीं आता, सड़क नहीं है, स्कूल नहीं है, अस्पताल नहीं है, राशन नहीं मिलता आदि। नेताजी ने काफिले का रास्ता बदलने वाले को घूर के देखा।

बजबजाती नालियाँ, गंदे चौराहे, जगह जगह कूड़े के ढेर, उनमें खेलते बच्चे, बन्द स्कूल, संवेदनहींन तंत्र देखकर नेताज़ी चिंता में पड़ गए। उनके साले आए और नेताजी के कान में कुछ कहा। उनकी आँखों में चमक आ गई, उन्होंने घोषणा की - अब विकास होकर ही रहेगा। विकास का नाम सुनकर शिकायत करने वालों के चेहरों पर हवाइयां उड़ने लगीं। वे काँपने लगे। जो नेताजी को गंदगी दिखाकर प्रभावित करने वालों की बाँछें खिल गई। लोग नेताजी के सामने साष्टांग हो गए, उनसे विकास न करने की गुहार लगाने और गिड़गिड़ाने लगे। हमें विकास नहीं चाहिए, आप ही रख लो, अपने भाई-भतीजों का कर दो, साले साब का कर दो, किसी रिश्तेदार का कर दो...लेकिन वे टस से मस न हुए। सब समझ रहे थे कि उन्हें जबर्दस्ती बिल्डिंगों, मल्टीप्लेक्स, मॉल, मेट्रो ट्रेन, फ्री वाई-फाई, हाई स्पीड ट्रेन, भरपूर रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाएं आदि के सपने दिखाए जाएंगे। क्योंकि नेताजी के लिए यही विकास का खाका है।

आनन -फानन में विकास योजना बनाई गई, जिसमें झुग्गियाँ हटाकर शहर को सुन्दर बनाने, पेड़ और हरियाली हटाकर शॉपिंग मॉल बनाने, खेती की जमीन पर आवासीय प्रोजेक्ट आदि बनाना प्रस्तावित किया गया। प्रोजेक्ट की लागत  निकालने के लिए लोगों पर दोगुना टैक्स थोपा गया। विकास का ठेका नेताजी के परिवारजनों ने लिया। तोड़-फोड़ शुरू हो गई अब अगले आठ-दस सालों तक पूरा शहर अस्तव्यस्त रहेगा, क्योंकि विकास जो हो रहा है।