Wednesday, March 20, 2019

रंगों का लोकतंत्र


(संजीव परसाई) भारत के लोकतंत्र को अनेकता में एकता का लोकतंत्र कहा जाता है। यहां अनेकता का अर्थ अनेक रंगों से है। सभी राजनीतिक दलों ने लोकतंत्र को अपने अपने रंग में रंग दिया है। दृश्य यह है कि देश का लोकतंत्र उघाडे़ बदन बीच सड़क में उकडू बैठा हुआ है और सारे दल अपने रंगों की बाल्टी लेकर उसपर हमला करने को तैयार हैं।
केसरिया, हरा, लाल, पीला, सफेद सबने अपनी अपनी सुविधा से इन रंगों को अपने लिए चुन लिया है। बाजार भी इन रंगों से अटा पड़ा है, होली हो या न हो ये रंग हमारे जीवन और लोकतांत्रिक संस्कृति में रमते जा रहे हैं। चुनावों में रंगों का प्रयोग भर भर कर होगा, जिससे वोटर अपने अपने पसंदीदा रंग को चुन सकें और अपने पसंद के रंग को अपने जीवन का हिस्सा बना लें। इस प्रकार मूलतः न तो यह सिद्धांतों का चुनाव है, न वादों के पूरा होने का, न कारगुजारियों पर चर्चा का। यह तो बस रंगों की मार्केटिंग का चुनाव है। नेता वोटर्स को अपने अपने रंग में रंगने को बेताब हैं। जो अपने रंग में ज्यादा लोगों को रंग सका वो जीता हुआ मान लिया जाएगा। उसे अगले पांच साल देश को अपने पसंदीदा रंग में रंगने का अधिकार संविधान से मिल जाएगा।
सारे नेता चिंतित हैं, कि इस होली कौन अपने रंग से वोटर्स को रंग सकेगा। सोशल मीडिया पर अपने रंग की बाल्टी लेकर प्यादों को खड़ा कर दिया गया है। ये प्यादे हर आने जाने वाले पर अपना रंग गुब्बारों में भर भर कर फेंक रहे हैं। जो विरोध दर्ज करे उसपर मल फेंक कर भाग रहे हैं। उसे हुरियारों की तर्ज पर गालियों की बौछार कर रहे हैं। बेचारा वोटर क्या करे, सो वो सोशल मीडिया की सड़क पर निस्पृह भाव से खड़ा होकर सभी दलों को अपने पर सारे रंगों को डालने की मौन व असहज सहमति दे देता है। वे निदृयता से उसके साथ होली खेल रहे हैं, उसे नोंच रहे हैं। अपने घर जाकर उन रंगों को घिस घिस कर निकाल रहा है। कुछ चालू वोटर भी हैं जो अपने घर से ही वैसलीन, क्रीम या तेल लगाकर निकल रहे हैं, कोई भी कोई रंग डाले उनपर चढ़ता ही नहीं है। वो सिर्फ रंगों की शिक्षा, रंगों के रोजगार, रंगों से स्वास्थ्य और गरीबी के रंगों के बारे में सोचते हैं। वे फालतू और घटिया रंगों को अपने पर चढ़ने देते हैं न ही किसी खास रंग की होली में शामिल होते हैं। हालांकि कुछ फुरसतिए जरूर हैं जो न सिर्फ रंगों की इस भचाभच में शामिल होते हैं बल्कि वे रंग में डूबकर नाचते हैं और इतराते हैं। कुछ समाचार चैनलों ने भी रंगों के लोकतंत्र की स्थापना में अपना योगदान देने का प्रण लिया है। हालांकि उनका योगदान उनको मिलने वाले गुलाबी रंग के नोटों तक ही सीमित है। वे अपनी सफलता को मिलने वाले नोट की ढेरी की उंचाई से आंकते हैं। उनका बिल्कुल सीधा फंडा है, जिसके पास गुलाबी रंग की ढे़री जितनी बड़ी होगी उसका चैनल उतना ही कलरफुल होगा, और उसकी होली उतनी ही शानदार। रंगों के प्रचार में घिसे-पिटे, हारे-थके अभिनेताओं की भी खासी भूमिका है। इन्हें भी सबसे अधिक गुलाबी रंग ही प्रभावित करता है। ये गुलाबी रंग लेकर किसी भी रंग का टवीट कर रहे हैं। जिनके आज नामलेवा नहीं बचे हैं उनके फैन क्लब सोशल मीडिया की वैतरणी में उतरा रहे हैं, और हल्के और घटिया रंग लेकर वे अपने तथाकथित फैन को रंगने के लिए बैठे हुए हैं। सारे दल इस होली पर अपने रंग को सबसे बढ़िया दिखा रहे हैं। नेताजी फागुनलाल कहते हैं कि हमारा रंग सबसे अच्छा और पक्का है, पिछले 60 सालों से आपने जो रंग लगा रखा था वो घटिया था। इसके जवाब में दूसरे कहते हैं कि हमारा रंग आसान है, जल्दी से चढ़ता है उतरने में कष्ट नहीं देता। फागुनलाल का रंग एक बार चढ़ गया तो चमड़ी लेकर ही निकलेगा। वोटर कह रहा है कि रंग भी डाल लेना कर्मजलो पहले एकाध गुझिया तो पेट में जाने दो। सारे उसपर चीख रहे हैं, अबे भुखमरे तुझे खाने की पड़ी है। अभी तो रंगों का ही मामला नहीं सुलझा है।
लोकतंत्र के इस बाजार में घटिया रंगों की भरमार है। जिनका एक बार शरीर पर लगना नासूर पालने जैसा है। नेताओं ने अपने रंगों को अच्छा दिखाने और वोटरों के अंग अंग रंगने के लिए वादों की पिचकारी भी साथ में ही देने का चलन बना लिया है। भूख और बेरोजगारी से हताश वोटर वादों की पिचकारी में रंग भरकर खुदपर ही डाले चला जा रहा है। इन रंगों में सराबोर होने से टीस कम होती है। उधर लोकतंत्र खुद के तीन रंग तलाश कर रहा है जिसमें रंगकर वो इस देश को एकाकार कर सकता था। पेड़ पर छिपकर बैठा संविधान काला रंग लेकर इन बदमाश हुरियारों को सबक सिखाने के लिए मौका देख रहा है।

(cartoon - Sabhaar Oneindia)

Sunday, March 10, 2019

स्वच्छ भोपाल - शर्मिंदगी की सर्जिकल स्ट्राइक

( संजीव परसाई) दृश्य 1 - लो जी, अपना भोपाल दो से उन्नीस नंबर पर आ गया। नगर निगम इसका जिम्मेदार है, कर्मचारी काम नहीं करते हैं, सरकार ने सुविधाएं नहीं दी, बजट कम पड़ गया था, अधिकारियों ने न तो मेहनत की न ही अपने पूरे प्रयास किये आदि आदि इत्यादि। अखबारों की हेडलाइनस उन्नीस नंबर पर फिसला भोपाल, नगर निगम की नाकामी आई सामने, बरसों से जमे अधिकारियों ने दिखाया भोपाल शहर को नीचा, करोड़ों खर्च करके भी हाथ से निकला नंबर 2 का ताज।
दृश्य 2 - सिटी में केबल स्टे ब्रिज के उद्घाटन के चार दिन बाद उस ब्रिज को पान की पीक से रंग दिया गया, दुःखी होकर महापौर ने खुद वो पान की पीके साफ कीं। शहर में सूखे और गीले कचरे के लिए जगह जगह अंदर ग्राउंड डस्ट बिन लगे हुए है, प्रयास है कि कचरा उनके अंदर ही रहे लेकिन हालत यह है कि लोग कचरा उसके बाहर ही फेंकते हैं, मजे की बात यह है कि ये उन इलाकों की बात है जहाँ तथाकथित पढ़ी लिखी आबादी रहती है।
दृश्य 3- शहर की कालोनियों में सभ्रान्त लोग रहते हैं, लेकिन अधिकांश टाउन शिप के आसपास कूड़े के ढेर लगे हुए है, अब आप सोच रहे होंगे कि ये कचरा कहाँ  से आया, इसका जवाब है उन्हीं पढ़े लिखे धनाढ्य लोगों के घरों से, जो अपने फ्लैट की बालकनी से कचरे की थैली सीधे निशाना लगाकर उछालते हैं, वाह क्या निशाना है। दूसरी बात ये मूर्ख धन्नासेठ अपने घरों में जानवर पालने के शौकीन हैं, स्टेटस सिंबल का सवाल भी तो है। सुबह शहर की सड़कों को खुली आवोहवा को कुत्तों का संडास बनाने में इनका बहुत बड़ा योगदान है। अब इनको कौन समझायेगा।
दृश्य 4 - क्या आप जानते हैं कि प्रदेश में अमानक प्लास्टिक पूरी तरह से बेन है, लेकिन जरा बाजारों में घूमकर आइए। शायद ही कोई ऐसी दुकान हो जहाँ पॉलिथीन न मिले। शायद ही कोई ऐसा ग्राहक हो जो अपने घरों से थैला लेकर चलता हो, और पॉलीथिन न मांगे। इसके साथ प्रदेश में खुले में शौच करने, कचरा फेंकने, नालियों में कचरा डालने, कचरा जलाने, जल स्रोतों को प्रदूषित करने आदि पर पाबंदी है। लेकिन कितना लोगों की समझ में आ रहा है, यह भी देखने की बात है।
दृश्य 5 - अब आप ये भी सोच रहे होंगे कि जब शहर में ये सब चल रहा है तो नगर सरकार क्या कर रही है। क्या ये सब उनकी जिम्मेदारी नहीं है। बिल्कुल है, उन्होंने विशेष अभियान चलाए, इंफ़्रा की व्यवस्था की, नियम कायदे बनाए, उनको लागू किया, अवहेलना करने वालों पर जुर्माना भी किया। नहीं किया तो बस इतना कि अपनी जिम्मेदारी न समझने वालों को डंडे नहीं मारे, उनपर आपराधिक केस न दर्ज करवाये, अमानक प्लास्टिक का उपयोग करने वालों को जेल न भिजवाया। अगर आप ये भी उम्मीद कर रहे थे तो वाकई नगर निगम जिम्मेदार है।
जिस शहर के नागरिक जिम्मेदार न हों, शहर की आत्मा से न जुड़े हों, अपने कर्तव्य को भूलकर सिर्फ अधिकारों और टीका टिप्पड़ी पर फोकस करते हों, उस शहर का 19 नंबर पर आना भी कोई चमत्कार से कम नहीं है। हालांकि भोपाल अब भी देश की स्वच्छ राजधानी है लेकिन नंबर 2 का ताज छिन जाने के लिए इस शहर के सभ्य, पढ़े लिखे शहरी भी उतने ही जिम्मेदार हैं, जिनके ऊपर शर्मिंदगी की सर्जिकल स्ट्राइक होना चाहिए।

Sunday, February 17, 2019

बधाई हो पाकिस्तान...

(संजीव परसाई) बधाई हो पाकिस्तान, तूने हमारी धरती आसमान लाल कर दी । तूने वही किया जो अबतक तू करता आया है। हम जार जार रो रहे हैं, और तू दुबककर हमें दहाड़ें मार रोते देख रहा है, ये  तेरी फितरत है । आज शहीदों के साथ सवा सौ करोड़ लोग खड़े है, जो तेरे वजूद से छः गुना हैं। तेरे आर्मी स्कूल के  बच्चों पर हमला हुआ था, देश भर में उनकी आत्मा की शांति के लिए दुआ मांगी गई थी। तब शायद ऐसा लग रहा था कि वे बच्चे हमारे अपने भी हैं। तेरी सियासी फितरत से अब तक तेरी और हमारी अवाम दोनों वाकिफ हो चुके हैं। असल में तेरी सियासत की जीत इसी में है, कि मेरा विरोध चलता रहे।

बधाई हो तुझे तेरी आधी अवाम भूखी नंगी है, तू मुझसे मुकाबला करने में जितना पैसा लगाता है, उतना अगर अपनी अवाम के रोटी रोजगार पर लगाया होता तो आज वे भी कबीलाई मानसिकता से उबरकर दुनिया भर में तेरा नाम बढ़ रहे होते। तेरी सोच ने तुझे ये दिन दिखाए हैं, यही  तो तुझे भुखमरी तक पहुँचने में ज्यादा समय नहीं लगेगा ।

बधाई हो तुझे कि तूने पहले अमेरिका और अब चीन की आर्थिक गुलामी स्वीकार की, तूने अपने देश की स्वायत्तता और अस्मिता को पहले अमेरिकियों के हाथों गिरवी रखा अब वो चाइना के पास है। तू ऐसे ही अपनी इज्जत एक से दूसरे हाथों में रखता रह, आगे भी और देश हैं जो तुझे भीख डालते रहेंगे और तेरा वजूद बना रहेगा।

बधाई हो तुझे कि तेरे सिर से बांग्लादेश के बोझ उतर गया, वर्ना आज जो हालात सिंध और बलूचिस्तान में हो रहे हैं, वे तुझे उधर भी संभालने पड़ते। है। हम सब मिलकर कोशिश करते हैं कि जल्दी ही तेरे सिर से सिंध और बलूचिस्तान का बोझ भी उतर जाए। छोटा सा कॉम्पैक्ट पाकिस्तान देखने और संभालकर रखने में आसान होगा।

बधाई हो तुझे तेरी आईएसआई के चिरकुट हमारे कश्मीर को नरक बना रहे हैं, वो हमारे पाले हुए दलालों को नोट देकर उनसे फायदे की उम्मीद पाले हुए हैं। तुझे खुश होना चाहिए कि तेरे पाले हुए संपोले एक दिन तुझे ही डसेंगे। कश्मीरी जानते हैं कि तेरी और तेरे इन सपोलों की औकात क्या है। तुझे कश्मीर चाहिए, लेकिन ये हाथी है जो जिगर वाला ही पाल सकता है । अपनी औलादों को भीख मांगकर पालना और पड़ोस के बच्चे पर नजर अच्छी बात नहीं है।

बधाई हो तुझे कि तेरे मिशन-ए-नफरत में हमारे भी लोग अनजाने में शामिल हैं। तूने सोचा यहाँ हिन्दू-मुसलमान लड़ें तो हम लड़ते हैं, तूने सोचा कि हम कश्मीरी से नफरत करें हमने तेरा काम आसान कर दिया, हम अपने ही भाइयों से नफरत करने लगे, तूने चाहा कि मेरे बीस करोड़ मुसलमान शंका की नजर से देखे जाएं तो हमने ऐसा माहौल बना दिया कि तेरा काम आसान हो जाये, खुश हो न।

बधाई हो तुझे कि तेरे पड़ोस में हम हैं और तुझे बधाई इस बात की भी कि यहां लोकतांत्रिक व्यवस्था है, जो जज्बात में निर्णय नहीं लेती। बधाई हो तुझे कि अब तक मेरी तुझपर घृणा नेस्तनाबूद करने की हद तक नहीं जा रही है। बधाई तुझे कि हम हिन्दुस्तान हैं, और सुन बधाई तुझे कि तू अब तक है...

Monday, February 4, 2019

डॉक साब और सोशल मीडिया

(संजीव परसाई)  डॉक्टर साहब सोशल मीडिया के सहारे देश में समाजवाद लाने का जज्जा रखते थे। सो चले आए कि अब बदलाव की दिशा हम तय करेंगे। इरादा नेक था लेकिन डगर कठिन थी। दो-पाँच-दस से होते हुए उनके हजारों फॉलोअर हो चले। सरकार की कमियाँ निकालकर उन्हें अपने फॉलोअर तक पहुंचाना उनका एक मात्र लक्ष्य बन गया। अखबारों से उड़ाई खबरों को वे इस तरह से प्रस्तुत किया करते जैसे कि यह खबर खुद उन्होंने ही ब्रेक की है। कुछ भी हो लेकिन उनके फॉलोअरों  ने उन्हें कभी निराश नहीं होने दिया। टुच्चे से अपडेट पर भी डॉक साब के तीन-चार सौ लाइक, सवा-डेढ़ सौ कमेंट और अस्सी-नब्बे शेयर कहीं नहीं गए। ये लाइक, शेयर और कमेंट ने डॉक साब के अकादमिक जीवन में नई जान फूंकते रहे। उनका उत्साह बढ़ता गया। वे सरकार से लेकर आम आदमी, नेताओं से लेकर अभिनेताओं, नीतियों से लेकर निर्माताओं तक सोशल मीडिया पर तलवारें भाँजते रहे। डॉक साहब खुद को पत्रकार के बराबर, न्यायाधीश से कुछ कम, बुद्धिजीवी से बहुत बड़ा आंकने लगे.

डॉक साहब को सोशल मीडिया ने बौद्धिक पहचान दी। जिसके लिए वे ताजिंदगी तरसते रहे। उन्होंने सरकार के घोटालों पर एक से एक टिप्पणियाँ कीं, नेताओं की टिप्पणियों पर भी टिप्पणियाँ कीं उन्हें शेयर किया। टिप्पणियों पर आयी टिप्पणियों पर भी खासी टिप्पणियाँ कीं। सोशल मीडिया को हिलाकर रख दिया। लोग कहने लगे कि डॉक साब, अगर इन चुनावों में सरकार हारती है, तो उसका एक बड़ा कारण आप भी होगे। आपने इस भ्रष्टाचारी सरकार की जड़ें हिलाकर रख दीं हैं। डॉक साहब मन ही मन अपने बढ़ते आतंक से  खुश भी होते रहे। साथ ही उन्हें इस बात की भी खुशी थी कि उनकी बौद्धिकता को अब एक पहचान मिल रही है।

असल में हम और राजनीति दोनों ही बुरे हैं। न हमारे बिना राजनीति होगी, न ही राजनीति के बिना हम। अतः हम दोनों एक दूसरे की बुराई सहने के लिए विवश हैं। अति उत्साह में वे कब राजनैतिक विरोध में शामिल हो गए, उन्हें पता ही नहीं चला। सोशल मीडिया पर अतिउत्साह में किया गया समर्थन या विरोध असल में काँटे से काँटा निकालना था। यह डॉक साब को देर से समझ आया। वे समस्या के निदान में बदलाव को इलाज मान रहे थे। लेकिन यह उनकी सोच से भी आगे था।

लोगों ने बदलाव को स्वीकार किया। सभी खुश थे कि चलो कुछ ठीक हुआ। डॉक साब भी प्रसन्न थे। उनकी बौद्धिकता साबित हुई, उनके विचारों की जीत हुई। बुद्धिजीवी बिरादरी के लिए जश्न का वातावरण था। वे अपनी जीत से अधिक सिद्धांतों की जीत का जश्न मना रहे थे। सभी लोग फूले फूले घूम रहे थे, कि उन्होंने अँधेरे की सरकार हटा कर उजाले को जिताया है सोशल मीडिया पर चहुँ ओर जय जयकार हो रही थी। जिन्होंने बदलाव में भूमिका निभाई, उन सभी को जमकर सराहा जा रहा था। डॉक साब के फॅालोअर उन्हें नेता या कहें स्टार की तरह प्रस्तुत कर रहे थे।  यूँ डॉक साब का सपना पूरा हुआ, वे अगड़ों की जमात में शामिल हो गए। विभिन्न विश्वविद्यालय उन्हें भाषण देने के लिए आमंत्रित करने लगे। आयोजनकर्ताओं ने उन्हें एसी-3 से सीधे विमान यात्रा का व्यय देना स्वीकार कर लिया। अब वे मीडिया के अधिकारिक बुद्धिजीवी जो थे, चैनलों से प्राइम टाइम में ज्ञान बाँटने के बुलावे आने लगे। अब वे सोशल मीडिया के वेरीफाईड एकाउंट में भी अपनी बात कहने लगे। अपने एकाउंट पर ब्लू टिक लगा देखकर फुले नहीं समाते.

इस तरह डॉक साब ने समाज के विकास में अपना योगदान जारी रखा। वे गाहे बेगाहे नई सरकार को भी गलतियाँ न दोहराने के लिए चेताते रहे। एक दिन डॉक साब मिले, चेहरे से दुखी प्रतीत हो रहे थे। उनके मुँडेर जैसे मुख पर रखा दुख, थर्माकोल का गिलास दिखाई दे रहा था। जो हल्के से हवा के झोंके के इंतजार में था। कहने लगे-जो हो रहा है उसकी उम्मीद तो नहीं की थी। संवेदनाविहीन भाव से नमस्ते करके मैं चलता बना। मैंने संवेदनहीनता को आदत न बनाकर उसे ताकत के रूप में इस्तेमाल करना भी सीख लिया है, यहाँ मैंने उसका इस्तेमाल किया ।

अगले हफ्ते डॉक साब का सोशल मीडिया पर नया अवतार आया। डॉक साब ने नई सरकार को भी कठघरे में खड़ा करना शुरू  कर दिया। दो तीन लाइक, कमेंट व शेयर नहीं। डॉक साब दुखी मन से सोशल साइट पेज को देखते रहे। उन्हें साफ़ नजर आने लगा कि लोग उनसे कन्नी काट रहे हैं. उन्होंने उम्मीद का दामन थामे रखा, काश कि कोई कमेंट करे, लाइक ही कर ले, पर निराशा हाथ लगी। वे निराश होकर उन लोगों को तलाश कर रहे थे, जो उनके फॉलोअर व प्रशंसक थे। कहाँ गए होंगे वे सब।

कुछ दिन डॉक साब सदमे में रहे। उधर मीडिया में भी एक उनके बागी होने की खबरें आने लगीं। मौका पाकर मीडिया भी सरकार के खिलाफ खबरें पकाने लगा। उनके विरोध के असमंजस को मीडिया ने पुख्ता कर दिया। दो दिन उन्होंने इंतजार किया, कि कुछ खबर बदल कर आए लेकिन उस पर भी नई नई खबरें आने लगीं। सोशल मीडिया भी पक्ष-विपक्ष दोनों तरह से सक्रिय होने लगा। डॉक साहब भी उतर गए रणक्षेत्र में।

एक अपडेट, दो अपडेट, तीन, चार, पांच........लगातार अपडेट ही अपडेट। वहीं दो लाइक, एक लाइक, चार लाइक, दो, छः, सात  लाइक बस। अब उनकी निराशा चरम पर थी। वे अपने हर हथियार को इस्तेमाल करने के विचार से लगे रहे।

खाना खाकर उठे ही थे कि उनके अपडेट पर एक कमेंट प्राप्त हुआ। हाथ धोना छोड़ तत्काल अपडेट बांचने लगे। उनके एक प्रशंसक का ही था। अपडेट पढ़कर उनकी आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा....

अबे पागल हो गया है क्या?

उन्हें संसार की असारता पर विचार पुख्ता हो उसके पहले दूसरा भी आ गया।

@##%^&^%%## जूते खाएगा क्या?

विपक्ष के दलाल कहीं के........

सत्ता के लोभी, जुगाडू........

गंजे तेरी@^^$^##^@^@%^#

सुधर जा नहीं तो, चौराहे पर लाकर मारेंगे......

तुम्हें अकल नहीं है, तो हमसे मांग लो....

दो कौड़ी के बुद्धिजीवी.......

ये देशद्रोही है, ऐसे लोगों को सबक सिखाना जरूरी है.

अबे इसकी बीबी का अफेयर किसी और से चल रहा है, सो ये पागल हो गया है..इसे पागलखाने भेजो यार.........हा हा हा 

अपने चाहने वालों से ये सब सुनकर उनका दिल बैठा जा रहा था। अंदर तक हिलने के बाद उन्होंने सोशल मीडिया से रवानगी को ही उपाय समझा। 

अब डॉक साब सोशल मीडिया पर कद्दू, लौकी, गिलकी, टिंडे की खेती किचन गार्डन में कैसे करें, इस विषय पर अपने विचार रखते हैं, आज भी उनकी राय निष्पक्ष और तटस्थ हैं। कहते हैं जल्द ही शाकाहार को प्रमोट करने के लिए सोशल मीडिया पर अभियान चलाएंगे।

Monday, December 24, 2018

एक था टाइगर..

(संजीव परसाई) वो धार्मिक प्रवृत्ति का था, लेकिन था तो टाइगर। जंगल में पांव-पांव घूमा करता। सतपुड़ा के जंगलों में दूसरे शेरों, टाइगरों, भेड़ियों, शिकारियों से मुलाकात होती, उनको नमस्कार करते, पर कभी किसी से पंगा न लेता। शिकारियों से यारी टाइगर की यूएसपी थी।
जंगल में प्राणियों से घुलमिल कर उनके हाल चाल लेता और बिना भनक के शिकार चलता रहता। सब उसकी सौम्यता पर फिदा थे, वन में हिरण, खरगोश, वानर आदि जानवर चिरौरी करते- भैया राजा तो तुमई बनियो, टाइगर मुस्कुरा देता, कहता जब नर्मदा मैया चाहेंगी, तो बन जाऊंगा। दिन गुजरे, रातें गुजरीं, नर्मदा मैया बहती रहीं, उनकी रेत और वन कटते, बढ़ते रहे।
एक दिन टाइगर राजा बना, वन जानवर संपर्क विभाग के खर्चे से उसकी सौम्यता की ब्रांडिंग की गई। लेकिन सलाहकार भेड़ियों ने उसका टाइगर का ड्रेस खूंटी पर टंगवा कर गाय का ड्रेस पहना दिया।
उसने जंगल का खजाना खोल दिया सब कुछ मुफ्त में बांटने लगा, भूखे जानवरों को खिलाने के वाद करता, उनको इलाज का पेंशन का वादा करता। सब खुश थे। उसने अपने आसपास तैनात भेड़िये उसे बताते कि शिकार कहाँ है, कभी कोई पकड़ लाता, कभी कोई। कुछ भेड़िये ठेके पर शिकार लेने देने लगे। जंगल में इंफ्रास्ट्रक्चर, आईटी का काम निकाले जाने लगे। पंछियों के घोंसले, बाघों की गुफाएं, साँपों की वामियाँ, चमगादड़ों को लटकने के लिए डैने बांटे जाने लगे। धड़ाधड़ टेंडर होते भेड़िये मलाई खाते और दूर बैठे शिकारी उनसे शिकार न करने की कीमत वसूलते। बीच बीच में उन शिकारियों की नजर टाइगर पर भी तिरछी होती, लेकिन अब तक टाइगर ने मैनेज करने सीख लिया था। टाइगर के बंधु बांधवों की जंगलों के पेड़, खनिज और नदियों की रेत और पानी पर नजर रहती। वे इनका व्यापार करते और अपने लिए मांस जमा करते। मांस सड़ता तो कृषि विभाग की योजनाओं का लाभ लेकर कोल्ड स्टोरेज बनाते नए दड़बे बनाते। नर्मदा किनारे के जंगल काटकर पौधे लगाते मैया से माफी मांगते। जानवर अब भी टाइगर की बातों को गंभीरता से लेते। लेकिन शिकारियों और साथी भेड़ियों की चालों के साथ धीरे धीरे टाइगर का मायाजाल फीका हुआ, अब टाइगर भेड़ियों और शिकारियों के साथ खड़ा दिखाई देने लगा। शिकारियों के बढ़ते प्रभाव ने जानवरों में असंतुष्टि का भाव जगा दिया। सो टाइगर को राजा पद से हटना पड़ा। टाइगर ने बहुत हाथ पैर मारे लेकिन मामला जमा नहीं। टाइगर ने खूंटी पर 13 साल से टंगा टाइगर का ड्रेस उतारा, भेड़ियों, शिकारियों को घूरकर देखा और अपने परिवार सहित घने जंगल में विचरण करने चला गया।
घने जंगल के शांत वातावरण में बस गहरी गहरी साँसों की आवाजें ही गूंज रहीं थीं। सर्दी का मौसम था सो टाइगर और उसकी धर्मपत्नी आग जला कर हवाओं के थपेड़ों को कमजोर करने की कोशिश कर रहे थे। धीरे से धर्मपत्नी बोली - सुनिए जी, अब तो इस जंगल पर हमारा राज भी नहीं रहा, अब क्या होगा? टाइगर उसाँस लेकर बोला - अभी तो इस जलती आग का आनंद लो प्रिये, देखना कुछ देर बाद हमें इसकी दोगुनी जरूरत महसूस होगी। जब यह नहीं रहेगी, तब हमें इसकी कमी खलेगी।  टाइगर धर्मपत्नी से कहने लगा -तुमने ब्लड प्रेशर की गोली खा ली?
धर्मपत्नी ने मुँह बिचकाकर पूछा - पूछ तो ऐसे रहे हो जैसे कि तुमने डायबिटीज की गोली खा ली हो। चलो कुछ खा लेते हैं, फिर दवाइयाँ लेंगे। और दोनों जंगल में शिकार की खोज में चले गए।
उधर जंगल का माहौल बदल गया था, लोग नए वनराज के नजदीकी होने के लिए कुछ भी करने को तैयार थे। जो भेड़िये  टाइगर के खास थे उन्होंने दो चार नरम भेड़ें नए वनराज को पेश कर दीं, नए वनराज ने दुत्कार दिया सो दुबक गए। दूसरे गायें, बैल, हाथी, खरगोश, हिरण, बारहसिंघा, चीतल, भैसे लाइन में खड़े होकर हुकुम का इंतजार कर रहे थे। अचानक दो बिल्ली दौड़ते हुए आईं और चिचियाते हुए कहने लगीं - टाइगर फिर से शिकार पर निकला है। भेड़िये कहने लगे - सर क्या करें आप आदेश कीजिए।
वनराज शांत रहे कहा - इसमें कैसी चिंता। उसे भी पेट भरने का हक है। छोड़ो तुम काम में मन लगाओ, भेड़िये दुखी हो गए कि वनराज ने सेवा का अवसर ही नहीं दिया।
उधर टाइगर गायों, हिरणों, बैलों, हिरणों आदि की सभा करता और उनसे अनदेखी की माफी मांगता, कहता अब कोई माई का लाल तुम्हें परेशान नहीं करेगा, तुम्हारा टाइगर अभी जिंदा है। गायें, उसे देखतीं, फिर नीचे मुंह करके घास का पूला लपक लेतीं, जुगाली करतीं। टाइगर अपनी एक ही बात को कई बार दोहराता। गाय दूसरे जानवरों को बतातीं वो टाइगर आया था, जो 13 साल गाय का ड्रेस पहनकर घूमता था।

Wednesday, November 14, 2018

भिया तो गे हैं....

(संजीव परसाई) पत्रकार तो पत्रकार होता है, क्या छोटा क्या बड़ा। लेकिन कैलकुलेशन इतना आसान भी नहीं है। बड़ा पत्रकार अपने लिए बड़ी और महत्त्वपूर्ण बीट मांगता है। बड़े आयोजनों के आमंत्रण दबा लेता है। बड़े लोगो से मिलने के मौके पर जूनियर को सिगरेट लेने भेज देता है। वो अपने लिए हर बड़े और महत्त्वपूर्ण मौके रिजर्व रखता है, जूनियर को अपनी कलम में दम लाने का स्थायी रोजगार देकर बहलाता है।
वो जी भिया, सुनने का इस कदर आदि हो जाता है, कि घर में भी और बीबी के श्रीमुख से जी भिया का उच्चारण होने की राह तकता है। भीड़ में अकेला ही होता है, सामान्य चर्चाओं से बहुत जल्दी ऊब जाता है वो गर्म विषयों पर अपनी आग उगलती और बैडरूम तक से तथ्यों को विस्तार से कहने को आतुर होता है।
वो जानता है कि मुख्यमंत्री किसे डराता है और किससे डरता है। किसे बचाता है किसे छोड़ता है, किसका खाता है किसका गाता है। ऐसे किस्से उसके लिए स्कॉच के पैग होते हैं, जिसमें दूसरा लेने के लिए पहले का खत्म होना जरूरी नहीं होता।
जूनियर, भिया की बातें सुन सुन खांटी पत्रकार बन रहा है। उसके लिए भिया मर्द हैं, जो अपने सवालों और कलम से किसी भी भ्रष्टाचारी को लघुशंका ला सकते हैं। उसे भिया का बिना परमीशन प्रमुख सचिव के कमरे में घुस जाना, एक फोन पर जनसंपर्क से गाड़ी बुला लेना, अपनी वेबसाइट और अखबारों के लिए विज्ञापन लिखवा लेना बहुत आकर्षित करता है। भिया पार्टियों में बड़े लोगों के साथ फोटो खिंचवा उसे फेसबुक पर ठेलते है। इससे भिया का आभामंडल दिखता है।  भिया भरी प्रेस वार्ता में नेता को असहज करने वाले सवाल पूछते हैं तो उसका दिल भिया के लिए अगाध श्रद्धा से भर जाता है। भिया पार्टी से बाहर निकलकर मंत्री से चिपक लिए - कहने लगे भाई साब आपका कुर्ता तो बड़ा गजब है, कहाँ से लिए, बिल्कुल ऐसा ही में भी ढूंढ रहा हूँ। मंत्री जी ने तिरछी नजर से देखा और आगे बढ़ लिए।
भैया भी आगे निकल लिए, जूनियर से बोले - साला चोर है, मैं तो ऐसे लोगों के मुंह भी नहीं लगता। बाहर निकलकर वो भिया के लिए गाड़ी का दरवाजा खोलता है। साथ बैठकर उनको बधाई भी दे देता है। भिया अब अपनी तारीफ खुद कैसे करें सो मुस्कुरा देते हैं। भिया जूनियरों को कलम और कैमरा थमाकर स्टिंगर रिपोर्टर बनाते हैं और उनके सामने अपनी मर्दानगी का प्रदर्शन करते हैं। जूनियर जयजयकार करते हैं और गर्व से बोलते हैं भैया तो असली मर्द हैं।
भैया दीवाली पर गिफ्ट मांगते हैं, न मिले तो फैल जाते हैं, उनकी नजर इस पर भी होती है कि दूसरे पत्रकारों को क्या मिल रहा है, जूनियर इसको प्रक्रिया का हिस्सा मानकर चलता है। अचानक अंदरखाने में ख़बर चल पड़ी कि किसी पार्टी चुनावी फायदे के लिए पत्रकारों को लक्ज़री कार गिफ्ट की है। भिया का नाम आते आते रह गया, भिया का अस्तित्व आफत में आ गया। भिया ने पुरी दम लगाकर कार गिफ्ट में वसूल कर ही ली। देने वाला भी सयाना था, उसने ये खबर चारों ओर फैला दी। अब सब ये बताने में जुट गए कि हमें तो ससुरजी ने गिफ्ट की है। उधर लोग लंबी नाक लेकर घूमने वाले पत्रकारों को नकटा कहने लगे। जूनियर ने डंके की चोट पर ऐलान कर दिया अरे हमारे भिया ऐसे नहीं हैं। वो तो असली मर्द हैं कोई इनकी कलम को खरीद नहीं सकता। सुनने वाला रामसिंग भी कम नहीं था उसने भिया और भिया जैसे पच्चीसों की सारी करतूतें लिखकर थमा दीं कि कैसे प्लाट, लैपटॉप, सरकारी सुविधाएं, कमीशन, ट्रांसफर, पोस्टिंग जैसे कारनामों में भिया अपनी रेहड़ी लगा कर बैठे हैं और उनके शरीर और आत्मा में अब बेचने को कुछ बचा नहीं है। उसने लगे हाथ भिया का रेट भी बता दिया। जूनियर सन्न रह गया, जिस रास्ते चलने वो अपने आप को गला रहा था, असल में वह राह तो दलाली की थी। और उसके लिए पत्रकारिता करने या उसका चोला ओढ़ने की जरूरत ही नहीं थी। रामसिंग ने एक कागज पर कुछ लिखा और जूनियर को थमा दिया। उसपर लिखा था - भिया मर्द हैं। जूनियर ने लिखा - भिया गे हैं, और ये कानूनन गलत नहीं है।

Monday, October 1, 2018

बताने वाली बात ये है कि.....

(संजीव परसाई) रामसिंग आज कहने लगा, भैया अगले महीने में 15 दिन के लिए अमेरिका दौरे पर जा रहा हूँ, कोई काम हो तो उसके पहले ही बता देना। हमने उसको ऊपर से नीचे तक दो बार देखा और फिर काम में लग गए। लेकिन उसे ठीक नहीं लगा, क्योंकि उसने बड़े दिल से कहा था। आप मुझे जलकुकड़ा कह सकते हैं। जिसके पास पासपोर्ट तक न हो उसे कोई विदेश दौरे की खबर सुनाएगा तो वो सटक ही जायेगा। लेकिन रामसिंग को छोड़ो उसकी बात को पकड़ो, असल में बताने वाली बात ये थी कि वो विदेश जा रहा है। जिसे उसने मेरे काम की चिंता की फॉयल में लपेट कर प्रस्तुत कर दिया था।
आजकल ये हवा में है, कहने वाली बात कुछ और होती है, बताने वाली कुछ और। एक पार्टी बताती है कि दूसरी पार्टी मुसलमानों की पार्टी है, असल में वो ये दिखाना चाहती है कि हम हिंदुओं की पार्टी हैं। ये कहना कुछ और बताना कुछ की परंपरा आदि काल से चली आ रही है। इसी चक्कर में राम को वनवास जाना पड़ा। माता कैकेयी तो बस इतना चाहती थीं, कि उनका बेटा भरत अयोध्या पर राज करे, लेकिन राम के वनवास में लपेटकर अपनी बात रखी सो मामला गंभीर और यादगार हो गया। अगर सीधे सीधे कहा होता तो बात वहीं खत्म हो जाती और हम आज राम को न भज रहे होते न उनके नाम पर सरकारें बन रहीं होतीं।
अम्मा कहती थीं, बेटा पढ़ ले भविष्य बन जायेगा। असल में वो कहना चाह रही है कि कुछ खाने कमाने लायक बन जा नालायक, कब तक हमारी छाती पर मूंग दलेगा। पर वो संकोच में कह नहीं पा रही है। पति अपनी पत्नी से कहता है जानू आज तुम बहुत सुंदर लग रही हो। तो वो असल में ये बताना चाह रहा है कि बाकी दिनों में तुम चुड़ैल लगती हो। लेकिन जान के डर से सही बात को घुमा रहा है।
हमारे देश और प्रदेश दोनों में एक ही सरकार है, लेकिन सारी समस्याओं के लिए वे उस पार्टी को जिम्मेदार ठहराते हैं, जो न अभी सरकार में है न उनके आने की कोई खास संभावना है। असल में वो हमें ये बताना चाह रहे हैं कि हमसे भी कुछ खास उम्मीद मत रखना।
सरकार ने कहा है हम काशी को क्योटो बनाएंगे। दिल्ली को वाशिंगटन, लखनऊ को लंदन, भोपाल को बीजिंग, कोलकाता को न जाने क्या बनाएंगे। असल में बताने वाली बात ये है कि हम कभी भी कुछ भी नहीं बनाने वाले काशी को क्योटो बाने के पहले हमें देश को जापान और देशवासियों को जापानी बनाना पड़ेगा। इसी तरह देश को अमेरिका, इंग्लैंड, चीन, सब बनाएंगे लेकिन भारत को भारत कभी नहीं बनाएंगे। हम ऐसी हालत कर देंगे की आपको भविष्य के सपने आने ही बंद हो जाएंगे। बुद्धिजीवी देश पर चिंता जताता है उसे सबमें खोट नजर आता है, वो कहता है गरीबों का जीना मुहाल हो गया है। असल में वो देश में सिगरेट, कॉफी और व्हिस्की पर छाई महंगाई की मार से व्यथित है। जो उसके बुद्धि पर पत्थर मारने जैसा है।
बात सिर्फ इतनी है कि बात दो तरह की होती है एक कहने वाली दूसरी बताने वाली। जरूरी नहीं कि कहने वाली बात ही बताने वाली हो। वैसे भी बातों के निहितार्थ निकालने में हम अव्वल नंबर हैं। कभी कभी जो कहीं न गई हो हम उस बात के भी गूढार्थ निकाल ही लेते हैं। एक संभावित राजा ने अपनी प्रजा से कहा मैं जब गद्दी पर बैठूंगा में आपकी सेवा करूँगा, किसी को गलत काम नहीं करने दूंगा, कोई दुश्मन हमारे राज्य पर तिरछी नजर भी न डाल सकेगा, हर एक के पास उसका घर होगा, हर बच्चे को शिक्षा मिलेगी, हर हाथ को काम मिलेगा, हर घर खुशहाली होगी आदि आदि। लेकिन बताने वाली बात सिर्फ इतनी थी कि मैं गद्दी पर बैठूंगा। जनता ने जयजयकार की, उसे आदत है, अब वो बुरा भी नहीं मानती।