Tuesday, October 17, 2017

अथ श्री नरक चौदस कथा !!!

(संजीव परसाई) एक राजा था, वो अपने नागरिकों से तरह तरह के कर वसूल करता था। उसने विकास के नाम पर लोगों का जीना मुहाल कर रखा था। पुल, सड़कें, बाज़ार, आमदनी, बच्चे, कपडे लत्ते, खाना-पीना, चिकित्सा आदि सब कुछ पर कर वसूलता था। 
एक बार वो नगर भ्रमण पर निकला, वो मर्सडीज में बैठा  शहर पर कर थोपने के नए आइडिया सोच रहा था, अचानक उसकी नजर कार के सीसे पर बैठी मक्खी पर पड़ी। वो गुस्से से मक्खी से बोला-मक्खी तेरी ये हिम्मत जो मेरी कार पर बैठे। मैं तुझे सजा ए मौत देता हूँ। और अपने सिपाहियों से बोला- जाओ इस मक्खी को मौत के घाट उतार दो. सिपाही- जी सरकार कहकर, राजा का हुकम बजाने निकल पड़े.
वो दौड़ते भागते रहे,लेकिन बदमाश मक्खी एक मक्खियों के झुण्ड में जाकर मिल गई. अप सिपाही परेशान की किस तरह उस मक्खी को तलाशें.  किसी दूसरी मक्खी को भी नहीं मार सकते.
मंत्री ने राजा को सलाह दी, कि राजन. उस मक्खी को तलाशना असंभव है, लेकिन एक आइडिया मेरे दिमाग में आया है, इजाजत हो तो कहूँ!!!
राजन की हाँ होने पर – मंत्री ने कहा, राजन मैंने पता लगाया है, कि इस मक्खी का पैदा होना प्रजा की जिम्मेदारी है, क्योंकि वो ध्यान नहीं रखती और गंदगी करती है. सो क्यों न उनकर एक टैक्स लगा दिया जाए जो पुरे नगर के नागरिकों से वसूल किया जायेगा.
राजा को आइडिया जमा, उसने अपने सिपाहियों को वापस बुलाया और मंत्री को नगर में नई टैक्सयोजना का ड्राफ्ट करने का आदेश दिया. मंत्री दो- चार कंसल्टेंट के साथ बैठा और एक महीने बाद एक बड़ी योजना लेकर हाजिर हुआ, जिसमें नागरिकों पर 35 तरह के विभिन्न कर थे. राजा हैरत में पड़ गया, उसने कहा – मैंने तो तुम्हें एक कर का बोला था लेकिन तुम तो 35 करों का जुगाड़ कर लाए, तुम्हें  इसका इनाम मिलेगा, कंसल्टेंट का कांट्रेक्ट दो साल के लिए और  बढ़ा दो.
राजा ने प्रस्ताव के अनुसार अपने शहर में एक नगर विभाग बनवाया, जिसका काम सिर्फ कर वसूल करना था, साल भर उसके कर्मचारी शहर में घूम घूमकर लोगों से अड़ीडाल कर कर वसूला करते थे. जो भी कुछ काम करने की कहता वो उसे धमकाते और उसपर दोगुना टैक्स लगा देते.प्रजा को तो इस सब की आदत थी. लेकिन एक बार प्रजा ने आवाज उठाई, कि जब इतने कर लेते हो तो सफाई भी तो करो. प्रजा के इस प्रकार सवाल खड़े करने पर राजा को गुस्सा आया लेकिन थोड़ी लज्जा भी आई, सो उसने मंत्री से कुछ इस प्रकार को जुगाड़ तलाशने को कहा जिसमें यह भी न लगे की हम प्रजा के सामने झुक गए हैं और नगर में सफाई भी हो जाए.  सो  मंत्री फिर कंसल्टेंट के साथ बैठा, और राजा को आइडिया दिया – राजन ऐसा करते हैं कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष  की तिथि चौदस को हमारे शहर में नगर विभाग बना था. सो इस दिन को हमें सेलिब्रेट करना चाहिए. इस दिन को हम शहर में “नगर चौदस” के रूप में मनाएंगे. इस दिन सभी नागरिक मिलकर अपने घरों और शहर की सफाई करेंगे. इसका फायदा यह होगा की हम इस झंझट से बच जायेंगे और दीवाली के दिन पूरा शहर साफ़ हो जाएगा. इसका क्रेडिट हमें मिलेगा और आप अच्छे से दीवाली मना सकेंगे.
राजा ने खुश और गदगदायमान होकर इसके लिए सहमती दे दी और खुश होकर कंसल्टेंट का पेमेंट रिलीज करने पर सहमती दे दी. तभी से नगर चौदस का त्यौहार धीरे धीरे पूरे देश में प्रचलित हो गया. कालान्तर में नागरिकों के गुस्से और कुछ भाषा के धिसाव ने इसको नरक चौदस कर दिया….

Thursday, October 5, 2017

चायना, सोशल मीडिया और चैनल वीर

(संजीव परसाई) सामान्य तौर पर मैं छुट्टी के दिन कहीं निकलता नहीं हूँ. पर इस ऐतवार घर में करने, कहने सुनने को कुछ ख़ास नहीं था सो मैंने सोचा चलूँ कहीं बैठकर निन्दारस का ही आनंद लूँगा. अब इसके लिए मुफीद जगह कॉफी हाउस ही समझ में आई, सो गाडी वहीँ मोड़ दी. पहुंचा ही था कि दरवाजे के गेट पर काले कोट में एक आदमी दुखी या करीब करीब लुटा पिटा सा नजर आया. अपन भोपाल के हैं सो थोड़ी यहां की सभ्यता भी फालो करते हैं, सो पूछ लिया - कोखां क्या हो रिया है? उसने मुझे ऐसे देखा जैसे चिल्लर उठाने वाला हूँ। लेकिन मैंने भी छोड़ा नहीं - भिया कौन हो, ऐसा लगता है कि कभी मिले हैं हम...मुंह बिचकाकर करने लगा, तुम इंडियन का यही प्रॉब्लम है, तुम लोग आदमी को जानते जरुर हो पर पहचानते नहीं हो. थोड़े डिस्टेंस से बात करो, मैं जिनपिंग हूँ, चायना का सदर.

मैं गिरते गिरते बचा, भाई तुम यहाँ क्या घास छील रए हो, वहां चायना में सब ठीक तो चल रहा है न, या वहां भी लत्ते लग गए...दुखी मन से बोले...मेरी जो हालत है उसके जिम्मेदार सोशल मीडिया सेना और यहां के टीवी न्यूज चैनल हैं, बड़ी मुश्किल से मैंने इज्जत और हिम्मत जुटाई थी, वो सब आपकी सरकार और सेना ने मिलकर मिटा दी और कहते हुए फफक-फफककर रोने लगे. भाई कांधे पे मुंडी धर दी।  मैं उनको लपक के कॉफी हाउस में अन्दर ले गया, उनको उनकी मनपसंद कड़वी कॉफी और सिगरेट पेश किया, सो चेहरे पर थोड़ी मुस्कान आई. सिगरेट का गहरा कश लेकर कहने लगे, भारत सरकार, सोशल मीडिया और टीवी के एंकरों से मैं बहुत डरा हुआ हूँ, सबूत के तौर पर उन्होंने अपने खड़े हुए रोंगटे भी प्रस्तुत कर दिए. मैं निरुत्तर ही रहा. मुझे विदेश नीति से, व्यापार नीति से, मीडिया नीति से सब तरफ से घेर रखा है. आए दिन सोशल मीडिया सेना पर लौंडे-लपाड़े मेरी बिजली की लड़ियाँ, और खिलौने खरीदना बंद करने की धमकी देते रहते हैं, सो मेरी कंपकंपी और बढ़ जाती है. मेरे दोस्त को आपकी सरकार ने कड़ी निंदा कर करके इस हालत में ला दिया है की अब वो लहुलुहान होकर घर में ही पड़ा हुआ है. मेरी भी हालत वैसी ही होने जा रही है, अभी पतंजलि कम्पनी की ब्लड प्रेशर की दवाई खाकर बैठा हूँ. मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊं मुझे सूझ नहीं पड़ रहा है. अगर तुम मेरी मदद करोगे तो मैं तुमको इस दीवाली पर दो सीरिज मुफ्त में दूंगा.

वैसे मैं ईमान का पक्का हूँ पर 25 रूपट्टी की सीरिज का नाम आते ही थोडा कमजोर हो गया, हें हें करके बोला...न भिया वो बात नहीं है, हमारी तो संस्कृति ही सबकी मदद करना है, सो करेंगे न. आप दुखी मत हो, तुम अच्छी चीजें बनाते हो, हम जरुर खरीदेंगे चिंता मत करो. हमारे तो घर तुम्हारी बनाई चीजों भरे पड़े हैं, अभी राखी भी खरीदी थी, अब दिवाली का सामान भी खरीदेंगे, सब कुछ खरीदेंगे जो तुम हमें टिकाओगे. मेरे अधिकृत आश्वासन के बाद वो थोडा सामान्य हुए. चहक के बोले – तो मैं पक्का समझूँ कि अब मुझे और चायना को भारत की तरफ से कोई खतरा नहीं है. हाँ हाँ – मैंने भारत की तरफ से हुलसकर कह दिया. तुम चिंता मत करो अभी हमारे यहाँ एक बलात्कारी बाबा पकड़ाया है, सो सब नेता, सरकार, मीडिया सब उसी में व्यस्त हैं. टीवी चैनल उसकी 'मुँहबोली' लड़की के पीछे मनोहर कहानियां बनाने में लगे हैं, उसके बाद कुछ और होगा. ये सब चलता रहेगा, कोई कमीवेशी हो तो बताना मैं अपने क्षेत्र के पार्षद से कह दूंगा वो मोदीजी से भी निवेदन कर लेंगे. उनका खासा रसूख है। दस एक राज्यों के मुख्यमंत्री से उनकी रोज राम-राम होती है, वो बात अलग है कि अभी हमारे यहाँ की सड़कें सालों से अधबनी पड़ी हैं. और सुनो भाई तुम लोग ये धमकी वगैरह से मत डरा करो, हमारे यहाँ  सरकार में स्थाई निंदा विंग हैं, जो अपना काम करते रहते हैं. दूसरे ओर हमारे नेता और सोशल मीडिया सेना पूरे पांच साल, सोते, जागते, उठते, बैठते, खाते, .........चुनावी मोड पर ही रहती है, सो ये सब करना पड़ता है. सुनकर उसकी आँखें चमक गयीं. कहने लगा ये सब चुनाव के लिए होता है तो भाई मैं भी ट्राय करूँगा. पर एक बात तो आपको मुझे और बतानी हैं, जो मुझे और मेरे देश को खाय जा रही है. आपके खबरिया चैनल के एंकर मुझे आए दिन धमकाते हैं, उसका नाम सुनकर मैं और 1 अरब 40 करोड़ चीनी एक साथ कांपने लगते हैं. निशानी के तौर पर उसने फिर बांह उघाड़कर अपने खड़े हुए रोंगटे दिखाए। अब हमसे सही न गई, सो कह दिया - अबे तुम हमारे यहां खरबों का बिजिनेस करते हो, उनको विज्ञापन काहे नहीं देते हो, अब वो निरुत्तर रहा.
हमने कहा -हो गया तुम्हारा, अब हमारी कंसलटेंसी फीस का बात भी कर लिया जाए। हमें चाहिए इंडिया में प्रोजेक्ट पार्टनरशिप, 10 चायनीज सीरीज और एक ठौ चायनीज इन्वर्टर..इन्वर्टर ...इन्वर्टर...इन्वर्टर
तभी पीछे से आवाज आई ये अल सुबह ये इन्वर्टर का क्या नया राग लेकर बैठ गए...हम उठे और चायनीज टूथब्रश पर पतंजलि का टूथपेस्ट लगा के घिसने लगे।

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Thursday, September 21, 2017

फटे जूते और बीड़ी का साहित्य में स्थान

(संजीव परसाई)  डिप्टी डायरेक्टर रामलखन रिटायरमेंट के बाद खुद को साहित्य के दंगल में झोंकने को उद्यत थे. उन्हें नौकरी में लिखी नोटशीट और साहित्य लेखन में कुछ ख़ास अंतर नहीं समझ में आया. किसी की सलाह पर सिगरेट छोड़ कर बीड़ी पीने लगे और पैरों में फटे जूते डाल साहित्य गोष्ठियों में इठलाने लगे. नोटशीटनुमा साहित्य का जोर शोर से सृजन होने लगा. हर रचना मेरे अभिमत से शुरू होकर पाठकों के अवलोकनार्थ और अनुमोदनार्थ पर ख़त्म होती.
फटे जूते और बीड़ी हिंदी साहित्य के यादगार प्रतीक हैं, जो इसकी दशा को व्यक्त करने के लिए काफी है. आधुनिक हिंदी साहित्यकार, प्रेमचंद की फटे जूते पहने वाली और मुक्तिबोध की बीडी पीते हुए तस्वीर अपने ड्राइंग रूम में जरुर सजाते हैं. समझ में नहीं आता कि ये दोनों तस्वीरें लेखन के लिए माहौल बनाती हैं या चेतावनी देती हैं कि अभी भी समय है बच सके तो बच ले.
सरकारें साहित्य और साहित्यकारों को गंभीरता से लेने के लिए बाध्य नहीं हैं. कमी ढूंढने वाले कहते रहते हैं कि सरकार बजट में भी साहित्यकारों के लिए कोई प्रावधान नहीं करती है. पूरा बजट छान मारा लेकिन उसमें साहित्य प्रेम कहीं नहीं मिला. अंग्रेजी के साहित्यकार एलीट क्लास को प्राप्त हो गए हैं वो अपना सामान दूसरे देशों में भी खपा कर खुद को सेलेब्रिटी घोषित करवा लेते हैं. प्रकाशक, लेखकों से एडवांस पेमेंट लेकर किताबें छाप रहे हैं.  हिंदी और क्षेत्रीय भाषा के साहित्यकारों को यह सुविधा प्राप्त नहीं है. वे अपने अछे भले साहित्य को लेकर प्रकाशक के दरवाजे पर बैठे हैं. अब वे सरकार से बीपीएल कार्ड देने की मांग कर सकते हैं. कुछ दिन में साहित्य रचना पार्ट टाइम काम होने वाला है. लोग दफ्तरों, दुकानों में बैठकर या बचे समय में घर के कामों से बचकर साहित्य की रचना करेंगे और बीबी और बॉस के ताने सुनेंगे. लोग इसके भी तरफदार हैं कि साहित्य रचना फुल टाइम काम नहीं होना चाहिए. प्रेमचंद खुद कुल जमा 56 साल का जीवन जिए. जिसमें से 16 साल उनके निकाल दें तो बचे कुल 40 साल उन्होंने अपने जीवन काल में 16 उपन्यास सहित डेढ़ सौ से अधिक छोटी बड़ी रचनाएँ लिखीं. अपने जीवनकाल में हर साल तीन-चार सौ पेज लिखे होंगे और साथ में नौकरी भी की, बीमार भी पड़े और बाकी सब दुसरे काम भी किये होंगे. वो भी तब जब न तो घोस्ट राइटर हुआ करते थे न ही कंप्यूटर, सब कुछ हाथ से. ये बात अलग है कि इस दौरान न तो उन्हें कहीं भाषण देने का मौका मिला, न फीता काटने का और न ही किसी चैनल पर चर्चा की न फेसबुक पर भाड़ झोंकी, बस लिखते ही गए.
आज का साहित्यकार आधुनिकतावादी हो गया है, वो सरकारी किरपा की जुगाड़ में मंत्रालय और महानुभावों के द्वारे टहलता रहता है. ड्राइंग रूम मुक्तिबोध की फोटो टांग कर लिखता है और खुद के घटिया लेखन पर चाँद की तरह मुंह टेढ़ा कर लेता है. खिड़की हरियाली की ओर खुलना चाहिए, लेकिन फिर खिड़की की ओर पीठ करके बैठता है, उसे उजाला चुभता है. अपनी टेबल पर व्हिस्की की चुस्की के साथ सर्वहारा वर्ग की दुर्दशा पर उपन्यास का प्लाट बना रहा है. अब विचार नहीं विचारधारा का साहित्य लिखने का चलन है. सोशल मीडिया इस साहित्य की खुली मंडी हो चला है, अब पढने के पहले तस्दीक करना पड़ता है कि वेज है या नॉनवेज. हालात ये ही रहे तो साहित्य का कूड़ा हटाने के लिए भी एक स्वच्छता अभियान चलाना पड़ेगा. नोटबंदी और जीएसटी पर लोगों को उम्मीद थी कि ये जरुर चें-चें करेंगे. लेकिन वे मुंह में दही जमा के बैठ गए. इनकी चुप्पी से ट्रोल सम्प्रदाय निराश हो गया, वो चिंता में है कि अब गालियां देकर किसे देश से बाहर निकलने का फतवा जारी करेगा, हुआ और बाकियों ने चैन की सांस ली.
रामलखन चौराहे पर पान की दूकान पर रोज जाकर बैठते हैं, और लिखने के लिए नए-नए विषय तलाशते हैं, लिखते तो विचार हैं, पर विचारधारा दिखाई देती है. उनका लक्ष्य है कि उनकी कहानियों या उपन्यास पर एक दो फिल्म बन जाएँ फिर वो भी कामेडी नाइट्स जैसे हल्के ठिकानों पर बैठकर चुटकुले सुनायेंगे, भांड की तरह नाचेंगे, और विदेशी व्हिस्की की आहिस्ता से चुस्कियां लेंगे. मुक्तिबोध की बीड़ी पीते हुए तस्वीर देखकर उनको लगा की उन्होंने पूरी जिन्दगी सिर्फ बीड़ी पी है. आज के कई साहित्यकार इस बीड़ी पीते हुए महान लेखक की फोटो अपने ड्राइंग रूम में सजाकर महान बन रहे हैं. रामलखन ने फेसबुक पर तुरंत अपडेट किया कि सरकार ने बीड़ी पर कोई टैक्स नहीं लगाया है, ये सरकार की साहित्य के प्रति सहृदयता को प्रदर्शित करता है.

Wednesday, August 30, 2017

नेता और बाबा मुस्कुरा दिए, जनता पगला गई


(संजीव परसाई) बाबा अपनी मर्सडीज से निकला और लपककर गादी पर बैठ गया, नीचे भक्त शाष्टांत हो गए. बाबा ने ऊपर वाले का नाम लेकर हुंकारा लगाया, भक्तों ने भी साथ दिया. अब भक्तों की बारी थी, सो भक्तों ने बाबा के नाम का जयकारा लगाया, सो बाबा मुस्कुरा दिया. नीचे हाथ जोड़े बैठे नेता ने बाबा को व्हाट्सएप पर मेसेज किया – छा गए गुरु....लगे रहो. बाबा ने इगनोर कर दिया और देवताओं और असुरों के बीच युद्ध में देवताओं की जीत का किस्सा सुनाने लगा.  भक्त भावनाओं के सागर में हिलोरें लेने लगे. युद्ध में देवताओं की जीत पर भक्तों ने बाबा के नाम का जयकारा लगाया....बाबा मुस्कुरा दिया
बाबा दुनिया के हर धर्म और देश में पाए जाते हैं, लेकिन हमारे बाबा सबसे अनूठे है. दूसरों को माया मोह से दूर रहने की सलाह देता है, और खुद उसी के पास बैठा रहता है. भले ही दुसरे धर्मों और देशों में पढ़ लिखकर बाबागिरी के धंधे में आते हैं. निठल्ले, नकारे और शातिर होना पहला क्वालिफिकेशन है. बाबा होने के लिए न ही ज्ञान न ध्यान की जरुरत है. वेदों और शास्त्रों की सुनी सुनाई बातों को मिर्च मसाला लगाकर भोले भले जनमानस को ठेल दो, वो गदगद और उसकी जेब अपनी. ये एक मात्र धंधा है जिसमें लोग लुटने के लिए न सिर्फ खुद आते हैं बल्कि अपने घर परिवार, खानदान, पुरा-पड़ोस तक को खींच लाते हैं. और आगे चलकर यही वोट में बदल जाते हैं. नेता ने बाबा को फिर मेसेज किया – गुरु हम भी बैठे हैं, नीचे जरा हमें भी ऊपर बुलवा लो, जनता से थोडा हम भी मुखातिब हो लें. बाबा ने प्रवचन झाड़ते हुए सन्देश दिया , कि  कभी भी आपको आपकी किस्मत से अधिक नहीं मिलता, जब तक तुम देवता और संतों के काम नहीं आओगे सो ये परमात्मा तुम्हारे कैसे काम आएगा. नेता समझ गया कि बाबा सरकारी जमीन को कब्जाने की फ़ाइल की बात कर रहा है. सो अगला मेसेज डाला की फ़ाइल हो गई है, बस आदेश निकलने हैं. बाबा ने फिर इग्नोर कर दिया, लेकिन भक्तों को कहा की भगवान् आपके वादे पर कभी संदेह नहीं करता लेकिन जब आपका वादा पूरा करोगे तब ही भगवन आपको प्रसाद देता है. अतः भक्तों भगवान् और संतों के सामने किये गए वादे को हमेशा निभाओ, तभी भक्तों का आशीर्वाद मिलेगा. धर्म का ठेकेदार नेता दो घंटे अपने सामने धर्म की ऐसी-तैसी होते देखता रहा. और जब समझ गया कि बाबा हाथ नहीं आने का. सो हाथ जोड़कर बाहर निकल  गया.
युद्ध का प्रसंग वर्णन करते हुआ बाबा अपने ईगो में मुस्कुरा दिया. शाम को बाबा के खिलाफ एक पुराने केस में चार्जशीट दाखिल हो गई. न्यूज चैनल में बाबा की खाट खड़ी होने लगी. नेता एक सभा को संबोधित कर रहा था, बाबा ने नेता को मेसेज किया – अरे गुरु तुम तो गुस्सा हो गए... नेता ने इग्नोर कर दिया. जनता को संबोधित करके बोले हम धर्म की राजनीति नहीं करते, हमारा धर्म तो आम लोगों की सेवा करना है. इसलिए हम ईगो नहीं पालते. हमारी तो सब कुछ ये जनता ही है. बाबा ने फिर मेसेज डाला – केस तो तुम्हारे भी पेंडिंग हैं, कहो तो तुम्हारे बड़े नेता से बात करूँ. नेता ने इगनोर कर दिया और जनता से कहा – जब तक हमें आप लोगों का साथ है, ऊपर वाला भी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता. जनता ने नेता के नाम का जयकारा लगाया. नेता इगो में मुस्कुरा दिया. बाबा समझ गया कि ये आसानी से मानने वाला नहीं है. बाबा ने अगला मेसेज विरोधी दल के नेता को डाला और उसे अपने प्रवचन में बुलाया. उधर अख़बारों में खबर चली गई की विरोधी नेता बाबा के प्रवचन में जा रहा है, बाबा मुस्कुरा दिया.

सुबह सुबह विरोधी नेता बाबा की गादी के बगल में हाथ जोड़कर खड़ा हुआ और आशीर्वाद लेकर निकल गया. बाबा के भक्त समझ गए कि इस बार झंडा पार्टी को वोट देना है. झंडा पार्टी की सरकार आ गई, बाबा अब खुश है उसका धंधा भी खूब चला रहा है, उधर बाबा के केस खुल गए, बाबा अब जेल जाएगा, बाबा की संपत्ति जब्त होगी. देश के सब छोटे बड़े बाबाओं को सबक मिल गया. पागल भक्त थोड़े दिन पगलायेंगे, नेता अपनी दुकानदारी चमकाने के लिए फिर एक बाबा गढ़ेगा, गोदी मीडिया उसकी ब्रांडिंग करेगा, जनता उसके चक्कर लगाने लगेगी और इसी तरह धर्म की मिटटी पलीत होती रहेगी. 

Monday, August 7, 2017

व्हाट्स एप ग्रुप पर ठेला -ठाली

(संजीव परसाई) रम्मू,फत्तू, गोलू और किसन चारों दोस्त नहीं थे, उनका बस एक नाता था कि वे रोज सुबह मैदान में हलके होने साथ साथ जाते थे. स्वाभाविक है उनके बीच लोटा ज्ञान पर चर्चा भी होती थी. किसन ने देखा कि लोग इस ज्ञान चर्चा पर गंभीरता खोते जा रहे हैं, सो उसने एक बार दिशा मैदान से लौटते समय प्रस्ताव रखा, भाई ऐसा ये रोज रोज लेट आना या आगे पीछे आने से नहीं चलेगा. हम ऐसा करते हैं कि एक व्हाट्स एप ग्रुप बना लेते हैं, जो भी आगे-पीछे होगा या लेट होगा उसपर अपडेट करेगा. और एक फायदा अब गोलू बोला – भैया उसपे तो हम हलके होते होते भी चर्चा कर सकते हैं. और नियम बना लेंगे जो भी फुर्सत हो जायेगा ग्रुप पर बताएगा सो सब लोग एक साथ उठेंगे. आइडिया चल निकला, अब सारे लोटा छाप अपना ग्रुप बना कर ढेर लगा रहे हैं.
व्हाट्स एप ग्रुप आज की हकीकत है, आज पूरी सरकार, यारी दोस्ती, व्यापार, गोलमाल, ठगी सब कुछ व्हाट्सएप ग्रुप पर चल रहा है. अभी सुनने में आया की एक चोरों का गिरोह पकडाया जो व्हाट्स एप ग्रुप बनाकर सूचनाओं का आदान-प्रदान किया करता था. सरकार में हर विभाग के अधिकारीयों से चपरासी तक के ग्रुप बने हुए हैं. अधिकारी अपने ग्रुप पर कम अपडेट करके अपनी जिम्मेदारी अपने मातहतों पर ठेल रहे है. बड़े साहब पूछने लगे – काम हो गया, सो बड़े बाबु कहने लगे सर, ग्रुप पर डाल दिया है. असल में ये परदे के पीछे मातहतों की खुशियाँ खाने का प्रोग्राम बनकर रह गया है. छोटे बाबु ने ऑफिस के ग्रुप पर एक जोक ठेल दिया, बड़े बाबु पहले तो खूब हँसे फिर उसे कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया. नोटिस में लिखा कि ये छोटा बाबु ख़ुशी-ख़ुशी काम करते हुए पाया गया. जो इसका अधिकार नहीं है, सरकार में काम तो हर दम रोते हुए करना चाहिए और इसने प्रोटोकॉल का उल्लंघन किया है, सो क्यों न तुम्हें दो वेतन वृद्धि रोक कर रुलाया जाए. असल में क्योंकि सरकार में जो कर्मचारी रोता नहीं उसे रुलाया जाता है, फिर काम कराया जाता है. छोटे बाबु ने अपनी गलती मान ली, अब वो अपने ऊपर दबाव महसूस करके रोनी सूरत बनाकर काम करता है, बड़ा बाबू खुश है.

अब मोबाइल ग्रुप से ही भरा हुआ है, कभी कभी तो ग्रुप मोबाइल से निकल कर नीचे बिखर जाते हैं सो उन्हें सड़क पर उकडू बैठ कर समेटना पड़ता है. स्कूल के दोस्तों का, कोलेज के दोस्तों का, छः कम्पनियों में काम किया है सो उस सभी का, ससुराल वालों का, बिरादरी वालों सहकर्मियों का, लाइक माइंडेड का हल्कों का, ऑफिस का जूनियर का सीनियर का, सब्जी वालों और बीफ खाने वालों का, अनाज वालों का, भिखारियों का, बीमारियों का, लुटे हुओं का पिटे हुओं का, कद्दू पसंद करने वालों का लौकी के दुश्मनों का, समर्थकों  विरोधियों का, पत्रकारों का सरकार के पिट्ठुओं का...सबने अपने अपने ग्रुप बना रखे हैं. सब अपने ग्रुप पर ज्ञान आधारित समाज बनाने की दिशा में बढ़ चले हैं. चुटकुलों और अफवाहों को प्रसारित करने में इन सबका योगदान इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा जायेगा. अब प्रशासन और प्रबंधन में असफल होने पर काम में टेक्नोलॉजी को शामिल करने के नाम पर व्हाट्स एप ग्रुप बनाने का रिवाज है. जल्दी ही मेनेजमेंट की कक्षाओं में व्हाट्स एप ग्रुप प्रबंधन भी सिखाया जायेगा. दुनिया के टॉप मेनेजमेंट गुरु सी.के. प्रहलाद सर ये जानकर सर पीट लेंगे कि सरकार अब व्हाट्स एप ग्रुप पर चल रही है. लेकिन सरकार खुश है कि उसका काम अब तेजी से होता दिख  रहा है, जल्दी ही व्हाट्स एप ज्ञान को ही असली ज्ञान का दर्जा देने के लिए कानून लाया जायेगा. सब खुश...चलो बजाओ तालियाँ 

Monday, July 17, 2017

बाबूजी हो जाना...

(संजीव परसाई)  बाबूजी होना एक गौरवपूर्ण कृत्य है। जो लोग हिन्दी पत्रकारिता और अखबारों को नजदीक से देखते हैं वे भलीभांति जानते हैं कि बाबूजी होना कितने गौरव की बात है। रमानाथ जी भी अपनी बिगड़ैल औलादों से यह सपना पाल बैठे कि वे उन्हें जीते जी बाबूजी की पदवी से सुशोभित करेंगे। एक दो बार महिलाओं से छेड़छाड़ करने और दो महिलाओं से विवाहेतर संबंध के आरोपों को अगर छोड़ दिया जाए तो रमानाथ जी ठीकठाक आदमी हैं। कृषि विभाग में बाबू रहकर उन्होंने अपने जीवन को हरा-भरा करने में कोई कसर नहीं रखी। रिटायरमेंट के बाद अब वे सत्ताधारी पार्टी के साथ उठते बैठते थे। एक पार्टी ने उन्हें अपनी पार्टी के किसान मोर्चा के अध्यक्ष बनाने का भी वादा कर रखा है।
एक बड़े नेता उनके गिलास फैलो थे, पांच सात भरे गिलासों के साथ वे दोनों आपस में किसानों के बेहतरी के लिए राय मशविरा किया करते। जब भी अकाल पड़ता उन दोनों के खेतों से हर साल औसत से अधिक फसल निकलती। किसान मर मर कर खेती करते लेकिन एक एकड़ में चार बोरे से अधिक गेहूं नहीं पैदा कर पाते, रमानाथ जी के खेतों के नीचे न जाने कौन सा कामधन्य बैठा था, बिना पानी, बिना खाद कभी कभी तो बिना बीज के भी बीस-तीस बोरे अनाज कहीं नहीं जाते। कभी-कभी तो बिना बोनी किए भी उनके खेत सोना उगलते। उनकी कृषि के प्रति लगाव और उत्तरोत्तर सफलता देखकर सरकार उन्हें कृषि रत्न अवार्ड देने का भी विचार कर चुकी थी। पर वे मानते नहीं थे, हमेशा किसी न किसी बहाने मना कर देते। हां ये जरूर जोड़ देते कि हमारे देश में और किसानों में बहुत दम है। बस बिजली, पानी, बीज, खाद मुफ्त में दे दो तो वे पूरी दुनिया को अनाज सप्लाई कर देंगे। उनकी इस मुफ्त थ्यौरी की वजह से कई किसान आंदोलनों ने दम तोड़ दिया।
सो रमानाथ जी कस्बे के एक आयोजन में गए जहां उन्होंने देखा कि एक परिवार के चार लड़कों ने मिलकर अपने मरहूम बाप की याद में एक धर्मशाला बना दी। एक पत्थर लगाया हमारे प्यारे बाबूजी प्यारेलाल जी की याद में...। बस इसके बाद रमानाथ जी ने ठान लिया कि वो ये सुख जीते जी लेंगे।
उन्होंने अपने सलाहकारों को याद किया। एक आध चक्कर भोपाल का भी लगा आए। भोपाल में एक पत्रकारिता के पहरूए ने उन्हें बताया कि बाबूजी होना एक जन्मजात गुण है। बाबूजी होकर व्यक्ति न सिर्फ जीते जी सम्मान पाता है बल्कि मरकर भी हमेशा के लिए अमर हो जाता है। अब हमारे पत्रकारिता फील्ड में देख लो, हमारे सारे हिंदी अखबारों में कमोवेश सभी के पास अपने अपने बाबूजी हैं। जिनका इस लाइन में खासा दबदबा है। वे साल भी जो नहीं कर पाते हैं वे साल में एक दिन बाबूजी के नाम पर कर देते हैं। बाबूजी के नाम पर भाषण श्रृंखला, बाबूजी का जन्मदिवस से निर्वाण दिवस तक सब एक ही छत्र के नीचे समा जाता है। सो अखबारी दुनिया में बाबूजी के दबदबे से प्रभावित होकर उन्होंने अखबार शुरू कर स्थायी बाबूजी बनने की ठान ली। तय रहा कि कृषि विभाग से रिटायर होकर वे किसान नेता बनेंगे और अपना खेती का अखबार ही प्रारंभ करेंगे और बनेंगे खेती की दुनिया के बाबूजी।
आए दिन किसानों के आंदोलनों से जूझती सरकार ने उनको आगे कर दिया सोचा तो दुविधा में पड़ गए कि क्या करें। पत्रकार जो अब तक बाबूजी के साथ गिलास शेयर करते थे अब सवाल पूछने लगे सो वे बिफर गए विलाप करने लगे इन अखबारों और टीवी चैनल वालों ने तमाशा बना रखा है। एक किसान मरा नहीं कि ये सब विधवा विलाप करने लगते हैं। हम भी तो किसान हैं, लेकिन हमने  तो कभी आत्महत्या नहीं करी। हमें तो बहुत फायदा होता है। मंच पर चढ़कर रमानाथ किसानी के बारे में बताने लगे। जैसे कि मानो आपने गेहूं का एक दाना बोया तो कम से कम 15 दाने तो उगेंगे ही। अब जे बताओ कि अगर 10 दाने खर्चा में निकल गए तो भी कम से कम 5 गुना लाभ तो हो ही गया, भूसे का फायदा अलग से। उधर उनका भाषण समाचार चैनल ने लाइव कर दिया तो नीति आयोग के मुखिया को चक्कर आने लगे।
रिटायर होने के बाद न तो वे खेती में रिकार्ड मुनाफा कमा सकेंगे न ही उनकी औलाद उन्हें बाबूजी का सम्मान देगी, वो तो बाबूजी भी नहीं बोलते पप्पा बोलते हैं। तो फिलहाल तय रहा कि वे सोशल मीडिया कंपनी की सेवाएं लेकर सोशल मीडिया के बाबूजी बनेंगे। एक सलाहकार ने कहा कि सोशल मीडिया पर बाबूजी थोड़ा अजीब सा लगेगा, सो अब वे बनेंगे सोशल मीडिया के पप्पा। सोशल मीडिया के हरकारों को हायर किया गया और अब वे अपनी चिरपरिचित छबि को दफनाकर नया अवतार लेने की तैयारी में हैं।

जल्दी ही पप्पा की याद में कई नए कार्यक्रम घोषित किए जाएंगे। पप्पा की याद में स्वच्छता अभियान, पप्पा की याद में धर्मशाला, चौराहे आदि रंगे जाएंगे और लोग पता पूछने वालों को कहेंगे वो पप्पा चौराहे से दाएं ले लो।

Sunday, June 18, 2017

पाकिस्तान से हार और म्यूट टीवी

(संजीव परसाई) देश की चिंता करना इतना आसान नहीं है. हमेशा एक आशंका बनी रहती है कहीं कोई हमपर कब्ज़ा न कर ले कोई देश पर हमला न कर दे. हफ्ते भर से ये चिंता और बढ़ी हुई थी. भारत चैम्पियंस ट्राफ़ी के फाइनल में क्या पहुंचा ब्लड प्रेशर बढ़ने लगा. इलेक्ट्रानिक मीडिया के बाहुबलियों, देवसेनाओं और सोशल मीडिया के कटप्पाओं ने हलकान कर रखा था. फाइनली हम हार गए और एक पूरी रात और अगला दिन शान्ति से गुजर गया, तब जाकर संतोष हुआ की कहीं कुछ नहीं होने वाला, हम सुरक्षित है. वरना हालात तो यहाँ तक हो चले थे कि हम हारे तो नवाज शरीफ मोदी जी से कहेगा कि बंगला खाली करो, हम रहेंगे अब दिल्ली में या जीत गए तो नवाज शरीफ का बेघर होना तो तय था. लेकिन कुछ नहीं हुआ अब जाकर चैन की सांस ली.
मैं कल डरा हुआ सा मैच देखने की तैयारी में था. टॉस हुआ ही था, कि मोहल्ले का रामस्वरूप आ धमका कहने लगा भैया मैच नहीं देख रहे हो क्या...मैंने इशारे से उसे टीवी की ओर दिखाया जिसपर मैच लगाया था. वो कहने लगा - आवाज खोलो न भैया – मैंने फुसफुसा कर कहा म्यूट करके ही देखेंगे भैया. भड़क गया,  अरे भैया, हम आजाद देश में रह रहे हैं और आप इतने डरे हुए हो कि मैच भी म्यूट करके देखोगे तो हम कैसे जीतेंगे. मैंने कहा ऐसी बात नहीं है रामस्वरुप, बात भारत और पाकिस्तान के संबंधों की है. अगर सम्बन्ध सुलझे होते तो हम इसे मैच मानते. लेकिन दुनिया जानती है कि यह सिर्फ मैच नहीं है ये महायुद्ध है. महायुद्ध में जोर से बोलना और अपनी रणनीति का खुलासा करने या होने देने से बचना चाहिए. क्रिकेट हमारे यहाँ धर्म कहा जाता है, और धर्म के लिए लड़ना धर्मयुद्ध ही होगा. ये वो धर्मयुद्ध है जिसमें लड़ाने वाले और लड़ने वाले मोटी रकम लेकर युद्ध तय करते हैं. इसे और आसान बनाने के लिए मीडिया भगवानों की रचना करता है. मजे के बात यह है कि भगवान् भी पैसे लिए बिना न तो मैदान में कूदते हैं न ही आशीर्वाद देते हैं. भगवान पर बात जाते देखकर रामस्वरूप बिफर गया. कहने लगा आप जैसे लोगों ने ही देश का विकास नहीं होने दिया. जहाँ देश के सम्मान की बात होती है आप जैसे लोग न जाने कहाँ से आकर मजा खराब करने में लग जाते हैं. बात बिफरने की हो चली थी सो मैंने उसके सामने पॉपकार्न का कटोरा सरका दिया और कहा लो चाय भी आ रही है. उसने मुट्ठी भर पॉपकार्न उठाते हुए टीवी की आवाज खोल दी. पाकिस्तानी योद्धाओं को माँ-बहन की गालियों और भारतीय योद्धाओं को कोसते हुए रामस्वरूप ने पूरे घर को युद्ध का मैदान बना दिया. हमें अपने घर में टैंकों, मोर्टार और फाइटर प्लेन की गर्जना सुनाई देने लगी. हम अपना मुंह बंद किए सहमति देते रहे. उधर विरोधी टीम के रन बनते जा रहे थे, यहाँ हम रामस्वरूप के सामने से कांच और स्टील के बर्तन उठाते जा रहे थे, चालीस ओवरों तक आते आते उसके सामने सब प्लास्टिक-प्लास्टिक हो गया था. पचास ओवर होते ही रामस्वरूप का दिल बैठ गया, कहने लगा भैया इस देश का कुछ नहीं हो सकता, हमारे देश पर कुछ लोगों की बुरी नजरें लगी हुई हैं. ऐसा करते हुए उसने मुझे घूर कर देखा. उसकी प्रतिक्रिया से पाकिस्तान के रनों के लिए मैं खुद को जिम्मेदार मानने लगा. फिर सोचा कि अब इसके जाने का टाइम आ गया है सो चुप रहना ही बेहतर है.
टीवी पर विज्ञापन शुरू हुए तो कहने लगा, भैया ये विज्ञापन क्यों दिखाते हैं, यहाँ रोने को जी कर रहा है और ये लड़की हंस रही है. हमने कहा - हंसने के उस लड़की को लाखों मिले हैं, हंसती लडकी दिखाने के चैनल को करोड़ों मिले हैं. वो फिर बैठ गया बोला – भैया अभी कुछ नहीं बिगड़ा है हमारे हिन्दुस्तानी शेरों के आगे ये स्कोर कुछ भी नहीं है कहकर वो फिर जम गया. अब हमें चिंता अपने घर से ज्यादा रामस्वरूप की थी, जिसका ब्लडप्रेशर हद से बाहर जा रहा था, लेकिन हमारी चिंता निर्मूल साबित हुई, उसे जल्दी ही समझ आ गया बोला भैया चलता हूँ अब, कुछ नहीं रखा इस सब में, काम धंधा देखूं, मैंने भी सेटमैक्स पर सुर्यवंशम लगा ली.
दूसरी पारी का मैच अभी तीस ओवर का ही हुआ होगा कि ज्ञानियों के खुले चक्षु मेसेज के रूप में बरसने लगे...क्या लाये थे, क्या ले जाओगे, क्रिकेट में क्या धरा है, जिन्दगी देखो, खुश रहो, वो तो अपना बेटा है आदि आदि ..उधर इलेक्ट्रोनिक मीडिया भी देश में किसान आन्दोलन और जीएसटी पर अपनी दूकान खोल ली, अब लाइव स्कोर पट्टी पर चलने लगा था.
बहरहाल अब सब कुछ शांत है, मीडिया अब नए मुद्दे तलाश रहा है, सोशल मीडिया पर ज्ञान की बाढ़ आ गयी है, विज्ञापन एजेंसियां नोट गिन कर रहीं हैं, बीसीसीआई नए सीजन की तैयारी में है, खिलाडी लम्बी छुट्टी के लिए विदेश जा रहे हैं, बेरोजगार नौकरी तलाश रहा है, किसान पेड़ के नीचे बैठ आसमान की ओर देख रहा है, मजदुर अपने काम पर चला गया है, बाकी सब म्यूट हैं और आप ये व्यंग्य पढ़ रहे हैं....जय जय