Wednesday, November 14, 2018

भिया तो गे हैं....

(संजीव परसाई) पत्रकार तो पत्रकार होता है, क्या छोटा क्या बड़ा। लेकिन कैलकुलेशन इतना आसान भी नहीं है। बड़ा पत्रकार अपने लिए बड़ी और महत्त्वपूर्ण बीट मांगता है। बड़े आयोजनों के आमंत्रण दबा लेता है। बड़े लोगो से मिलने के मौके पर जूनियर को सिगरेट लेने भेज देता है। वो अपने लिए हर बड़े और महत्त्वपूर्ण मौके रिजर्व रखता है, जूनियर को अपनी कलम में दम लाने का स्थायी रोजगार देकर बहलाता है।
वो जी भिया, सुनने का इस कदर आदि हो जाता है, कि घर में भी और बीबी के श्रीमुख से जी भिया का उच्चारण होने की राह तकता है। भीड़ में अकेला ही होता है, सामान्य चर्चाओं से बहुत जल्दी ऊब जाता है वो गर्म विषयों पर अपनी आग उगलती और बैडरूम तक से तथ्यों को विस्तार से कहने को आतुर होता है।
वो जानता है कि मुख्यमंत्री किसे डराता है और किससे डरता है। किसे बचाता है किसे छोड़ता है, किसका खाता है किसका गाता है। ऐसे किस्से उसके लिए स्कॉच के पैग होते हैं, जिसमें दूसरा लेने के लिए पहले का खत्म होना जरूरी नहीं होता।
जूनियर, भिया की बातें सुन सुन खांटी पत्रकार बन रहा है। उसके लिए भिया मर्द हैं, जो अपने सवालों और कलम से किसी भी भ्रष्टाचारी को लघुशंका ला सकते हैं। उसे भिया का बिना परमीशन प्रमुख सचिव के कमरे में घुस जाना, एक फोन पर जनसंपर्क से गाड़ी बुला लेना, अपनी वेबसाइट और अखबारों के लिए विज्ञापन लिखवा लेना बहुत आकर्षित करता है। भिया पार्टियों में बड़े लोगों के साथ फोटो खिंचवा उसे फेसबुक पर ठेलते है। इससे भिया का आभामंडल दिखता है।  भिया भरी प्रेस वार्ता में नेता को असहज करने वाले सवाल पूछते हैं तो उसका दिल भिया के लिए अगाध श्रद्धा से भर जाता है। भिया पार्टी से बाहर निकलकर मंत्री से चिपक लिए - कहने लगे भाई साब आपका कुर्ता तो बड़ा गजब है, कहाँ से लिए, बिल्कुल ऐसा ही में भी ढूंढ रहा हूँ। मंत्री जी ने तिरछी नजर से देखा और आगे बढ़ लिए।
भैया भी आगे निकल लिए, जूनियर से बोले - साला चोर है, मैं तो ऐसे लोगों के मुंह भी नहीं लगता। बाहर निकलकर वो भिया के लिए गाड़ी का दरवाजा खोलता है। साथ बैठकर उनको बधाई भी दे देता है। भिया अब अपनी तारीफ खुद कैसे करें सो मुस्कुरा देते हैं। भिया जूनियरों को कलम और कैमरा थमाकर स्टिंगर रिपोर्टर बनाते हैं और उनके सामने अपनी मर्दानगी का प्रदर्शन करते हैं। जूनियर जयजयकार करते हैं और गर्व से बोलते हैं भैया तो असली मर्द हैं।
भैया दीवाली पर गिफ्ट मांगते हैं, न मिले तो फैल जाते हैं, उनकी नजर इस पर भी होती है कि दूसरे पत्रकारों को क्या मिल रहा है, जूनियर इसको प्रक्रिया का हिस्सा मानकर चलता है। अचानक अंदरखाने में ख़बर चल पड़ी कि किसी पार्टी चुनावी फायदे के लिए पत्रकारों को लक्ज़री कार गिफ्ट की है। भिया का नाम आते आते रह गया, भिया का अस्तित्व आफत में आ गया। भिया ने पुरी दम लगाकर कार गिफ्ट में वसूल कर ही ली। देने वाला भी सयाना था, उसने ये खबर चारों ओर फैला दी। अब सब ये बताने में जुट गए कि हमें तो ससुरजी ने गिफ्ट की है। उधर लोग लंबी नाक लेकर घूमने वाले पत्रकारों को नकटा कहने लगे। जूनियर ने डंके की चोट पर ऐलान कर दिया अरे हमारे भिया ऐसे नहीं हैं। वो तो असली मर्द हैं कोई इनकी कलम को खरीद नहीं सकता। सुनने वाला रामसिंग भी कम नहीं था उसने भिया और भिया जैसे पच्चीसों की सारी करतूतें लिखकर थमा दीं कि कैसे प्लाट, लैपटॉप, सरकारी सुविधाएं, कमीशन, ट्रांसफर, पोस्टिंग जैसे कारनामों में भिया अपनी रेहड़ी लगा कर बैठे हैं और उनके शरीर और आत्मा में अब बेचने को कुछ बचा नहीं है। उसने लगे हाथ भिया का रेट भी बता दिया। जूनियर सन्न रह गया, जिस रास्ते चलने वो अपने आप को गला रहा था, असल में वह राह तो दलाली की थी। और उसके लिए पत्रकारिता करने या उसका चोला ओढ़ने की जरूरत ही नहीं थी। रामसिंग ने एक कागज पर कुछ लिखा और जूनियर को थमा दिया। उसपर लिखा था - भिया मर्द हैं। जूनियर ने लिखा - भिया गे हैं, और ये कानूनन गलत नहीं है।

Monday, October 1, 2018

बताने वाली बात ये है कि.....

(संजीव परसाई) रामसिंग आज कहने लगा, भैया अगले महीने में 15 दिन के लिए अमेरिका दौरे पर जा रहा हूँ, कोई काम हो तो उसके पहले ही बता देना। हमने उसको ऊपर से नीचे तक दो बार देखा और फिर काम में लग गए। लेकिन उसे ठीक नहीं लगा, क्योंकि उसने बड़े दिल से कहा था। आप मुझे जलकुकड़ा कह सकते हैं। जिसके पास पासपोर्ट तक न हो उसे कोई विदेश दौरे की खबर सुनाएगा तो वो सटक ही जायेगा। लेकिन रामसिंग को छोड़ो उसकी बात को पकड़ो, असल में बताने वाली बात ये थी कि वो विदेश जा रहा है। जिसे उसने मेरे काम की चिंता की फॉयल में लपेट कर प्रस्तुत कर दिया था।
आजकल ये हवा में है, कहने वाली बात कुछ और होती है, बताने वाली कुछ और। एक पार्टी बताती है कि दूसरी पार्टी मुसलमानों की पार्टी है, असल में वो ये दिखाना चाहती है कि हम हिंदुओं की पार्टी हैं। ये कहना कुछ और बताना कुछ की परंपरा आदि काल से चली आ रही है। इसी चक्कर में राम को वनवास जाना पड़ा। माता कैकेयी तो बस इतना चाहती थीं, कि उनका बेटा भरत अयोध्या पर राज करे, लेकिन राम के वनवास में लपेटकर अपनी बात रखी सो मामला गंभीर और यादगार हो गया। अगर सीधे सीधे कहा होता तो बात वहीं खत्म हो जाती और हम आज राम को न भज रहे होते न उनके नाम पर सरकारें बन रहीं होतीं।
अम्मा कहती थीं, बेटा पढ़ ले भविष्य बन जायेगा। असल में वो कहना चाह रही है कि कुछ खाने कमाने लायक बन जा नालायक, कब तक हमारी छाती पर मूंग दलेगा। पर वो संकोच में कह नहीं पा रही है। पति अपनी पत्नी से कहता है जानू आज तुम बहुत सुंदर लग रही हो। तो वो असल में ये बताना चाह रहा है कि बाकी दिनों में तुम चुड़ैल लगती हो। लेकिन जान के डर से सही बात को घुमा रहा है।
हमारे देश और प्रदेश दोनों में एक ही सरकार है, लेकिन सारी समस्याओं के लिए वे उस पार्टी को जिम्मेदार ठहराते हैं, जो न अभी सरकार में है न उनके आने की कोई खास संभावना है। असल में वो हमें ये बताना चाह रहे हैं कि हमसे भी कुछ खास उम्मीद मत रखना।
सरकार ने कहा है हम काशी को क्योटो बनाएंगे। दिल्ली को वाशिंगटन, लखनऊ को लंदन, भोपाल को बीजिंग, कोलकाता को न जाने क्या बनाएंगे। असल में बताने वाली बात ये है कि हम कभी भी कुछ भी नहीं बनाने वाले काशी को क्योटो बाने के पहले हमें देश को जापान और देशवासियों को जापानी बनाना पड़ेगा। इसी तरह देश को अमेरिका, इंग्लैंड, चीन, सब बनाएंगे लेकिन भारत को भारत कभी नहीं बनाएंगे। हम ऐसी हालत कर देंगे की आपको भविष्य के सपने आने ही बंद हो जाएंगे। बुद्धिजीवी देश पर चिंता जताता है उसे सबमें खोट नजर आता है, वो कहता है गरीबों का जीना मुहाल हो गया है। असल में वो देश में सिगरेट, कॉफी और व्हिस्की पर छाई महंगाई की मार से व्यथित है। जो उसके बुद्धि पर पत्थर मारने जैसा है।
बात सिर्फ इतनी है कि बात दो तरह की होती है एक कहने वाली दूसरी बताने वाली। जरूरी नहीं कि कहने वाली बात ही बताने वाली हो। वैसे भी बातों के निहितार्थ निकालने में हम अव्वल नंबर हैं। कभी कभी जो कहीं न गई हो हम उस बात के भी गूढार्थ निकाल ही लेते हैं। एक संभावित राजा ने अपनी प्रजा से कहा मैं जब गद्दी पर बैठूंगा में आपकी सेवा करूँगा, किसी को गलत काम नहीं करने दूंगा, कोई दुश्मन हमारे राज्य पर तिरछी नजर भी न डाल सकेगा, हर एक के पास उसका घर होगा, हर बच्चे को शिक्षा मिलेगी, हर हाथ को काम मिलेगा, हर घर खुशहाली होगी आदि आदि। लेकिन बताने वाली बात सिर्फ इतनी थी कि मैं गद्दी पर बैठूंगा। जनता ने जयजयकार की, उसे आदत है, अब वो बुरा भी नहीं मानती।

Tuesday, September 25, 2018

तुम्हें पितरों का वास्ता....

(संजीव परसाई) बिहार के मुख्यमंत्री हत्यारों और अपराधियों से हाथ जोड़कर विनती कर रहे हैं कि -भैया कम से कम पितृपक्ष में  तो अपने धंधे को विराम दो और लोगों को मत मारो। सुनकर दिल भर आया, पितरों के लिए इतना संवेदनशील और समर्पित आदमी पहली बार दिखाई और सुनाई दिया।
औरंगजेब ने अपने बाप को जेल में डाल दिया और उसे पानी तक के लिए तरसाया तो, उसने कहा तू हिंदुओं से कुछ सीख जो अपने मरे हुए पूर्वजों को भी पानी देते हैं, एक तू है जो मुझे जिन्दे में पानी के लिए तरसा रहा है। अगर शाहजहाँ को ये अंदाज होता कि 21 वीं सदी में एक अथक पितृ भक्त और हिन्दू हृदय सम्राट का अवतार बिहार के उपमुख्यमंत्री के रूप में होंने वाला है तो उसका जिक्र भी वो तभी कर डालता।
सचमुच बिहार की मूर्ख जनता के लिए आज का दिन हमेशा याद रखने वाला है। जनता को मूर्ख इसीलिए कहना चाहिए कि वो अब तक अपने मसीहा और पितृ भक्त को समझ नहीं पा रही है और उनके बयान के लिए उन्हें ट्रोल कर रही है।
ये देश में अपराध, भ्रष्टाचार को खत्म करने का एक रेवोल्यूशनरी आइडिया साबित हो सकता है।
सरकार को भी इस प्रकार की सार्वजनिक अपील जारी करना चाहिए कि सभी भ्रष्टाचारियों से करबद्ध अपील है कि वे पितृपक्ष में भ्रष्टाचार न करें। बैंकों को भी अपने डिफॉल्टर्स से कहना चाहिये कि वे बैंकों का पैसा लेकर पितृपक्ष में न भागें, हमारे पूर्वजों को तकलीफ होती है। हालांकि रमजान के समय कश्मीर में सीज फायर लागू करके सरकार ये फार्मूला टेस्ट कर चुकी है। कश्मीर में गृहमंत्री हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा रहे थे, कि भाईजान इस पाक महीने में तो कम से कम लोगों को मत मारो, उन्होंने अल्लाह के वास्ते इस अपील को मान लिया और सिर्फ 10-20 को ही मारा, जबकि उनके प्लान 40-50 को मारने का था।
वैसे हमारे धर्म में हमें ऐसे बहुत से मौके दिए हैं कि हम साल में कम से कम 150 दिन देश को अपराध मुक्त रख सकते हैं। सरकार को दीवाली, दशहरा, नवदुर्गा, गणपति, रक्षाबंधन, पोला, पोंगल, गुरूपरब, ईद, ईस्टर आदि विभिन्न अवसरों पर ऐसी अपील जारी करना चाहिए। ताकि कम से कम इस देश की जनता तो चैन से जी सके। सरकार एक कानून भी इस बाबत बना सकती है कि इस दौरान जो भी अपराध होंगे उसके लिए सरकार जवाबदार नहीं होगी। उनपर न पुलिस कार्यवाही करेगी, न अदालत केस सुनेगी। बस पीड़ित और अपराधी को खुद को ही इस मामले को निपटाना होगा। हो सकता है इसी बहाने अपराध काम हो जाएं और पुलिस महकमा राहत की सांस ले।
काश कि रोज रोज बढ़ते जा रहे पेट्रोल के रेट और निरंतर गिरते रुपए के लिए भी कोई अपील जारी कर दे कि कम से कम पितृपक्ष में तो थम जाओ। वैसे प्रधानमंत्री को तो ये अपील विपक्ष के लिए तुरंत जारी कर देना चाहिए कि कम से कम पितृपक्ष में तो राफाल से हमले मत करो। सारे मंत्री रोज सुबह अपने पितरों को पानी देते हैं और तुरंत पानी पीकर कांग्रेस के आरोपों का जवाब देने भागते हैं। सबसे ज्यादा सोशल मीडिया टीम परेशान है उनको व्हाट्सएप पर एक मैसेज मिला है कि अगर पितृपक्ष में किसी को गालियां लिखो तो वो गालियां सीधे उनके पूर्वजों को लगती हैं, सो बेचारे इस दौरान धार्मिक बातें कर रहे हैं, मसलन भगवान पर भरोसा रखिए सब ठीक होगा, प्रभु अब तो तेरा ही सहारा है आदि आदि। बहरहाल इस रेवोल्यूशनरी आइडिया के लिए बिहार के उपमुख्यमंत्री को शाल श्रीफल से सम्मानित करना चाहिए, लेकिन पितृपक्ष के बाद।

Friday, September 21, 2018

सरकारी जमीन का टुकड़ा

(संजीव परसाई) वो चौराहे से लगा हुआ यूं ही पड़ा था। एकदम उपेक्षित सा, उसे अपने जीवन से कोई अपेक्षा नहीं थी। एक बार वहां से गुजरा तो फफक पड़ा- कहने लगा भैया जिस दौर में जमीनों और कमीनों के भाव आसमान छू रहे जॉन, उस दौर में मेरी ऐसी दुर्दशा होगी सोचा न था।
दस एक साल पहले पी.डब्लू.डी. से दो लोग आए थे, एक बोर्ड ठोंक कर चले गए। तब से आज तक पलटकर नहीं देखा। अब तो वो बोर्ड भी सड़ गया, उसके एंगल से कुछ दिन मोहल्ले के आवारा बच्चों ने झूला झूला और कुछ दिन बाद पाउडर के शौकीनों ने उसे काटकर बेच दिया। अब तो मेरा नाम भी खत्म हो गया। पहले उस सरकारी बोर्ड के सहारे ही इतरा लेता था। अब वो नहीं रहा, लेकिन उसके ऊपर बचे नुकीले एंगल अपने हिंसक स्वभाव से आते जाते वाहनों को मिटाने की फिराक में रहते हैं। कहते हैं टायर फटने की आवाज में उनको मजा आता है। लोग उनसे कानून व्यवस्था की तरह बचकर निकलते हैं, लेकिन उपेक्षा का शिकार में हो रहा हूँ। मैं उसे समझाता 'आदमी हो या प्लॉट, अगर कमर्शियल वेल्यू है तो सब पूछते हैं, कभी न कभी तुम्हारा भी कोई तारणहार जरूर आएगा।'
बस यूं ही दिन महीने साल गुजरने लगे, मैं उसे यूं ही पड़े देखता रहा, उसके दुख और मेरी जिंदगी दोनों में नीरसता स्थाई निवास करने का प्रयास करती रही , और हम दोनों उससे बचने का नाटक करते रहे। इस उपक्रम में हम भूल जाते हैं कि विधाता सब के लिए कोई न कोई भूमिका लिख रहा होता है। उसके पीछे वाले हिस्से में नुकीले एंगल के पास एक दिन एक भिखारी सा दिखाई देने वाले परिवार ने अपना डेरा डाल लिया, वो सुबह निकलते और शाम को भिक्षाटन करके लौटते। कभी आसपास के पर्यटन स्थलों पर निकल जाते, कभी मंदिरों के सामने जाकर भीख मांगते। शहर के मिजाज के हिसाब से मस्जिदों और गिरजों के सामने भी भीख मांगते। कुल मिलाकर उनकी ऊपरवाले की कृपा से कट रही थी। उसका एक 14-15 साल का लड़का एक बार कहीं से एक पुराना सा स्टोव उठा लाया और वहीं चाय बेचने लगा। स्टोव की भरभराहट प्लॉट पर संगीत की तरह गूंजने लगी। पार्षद के दरवाजे पर पहुंच गया, सो बीपीएल कोटे के राशनकार्ड पा गया। अब तो शकर, मिट्टी का तेल अनाज सब साथ बहने लगा।
धीरे धीरे उसने वहाँ दूसरे आवारा लड़कों को सब्जी, पानीपुरी, पान बीड़ी सिगरेट के  ठेले लगवा दिए और उनसे कमीशन लेने लगा। अब चौराहे ने आकार ले लिया था, वो दिन में गुलजार होने लगा था। मैं देखता वो अब पहले से खुश था
 लेकिन एक दिन वहाँ किसी की बुरी नजर पड़ गई। नगरनिगम का अतिक्रमण विरोधी दस्ता किसी मुगल हमलावर की तरह आया और सबकुछ उजाड़कर चला गया। लड़के अपने टूटे फूटे सपनों पर बैठकर बीड़ी पीने लगे। दोपहर के बाद वहां अक्सर साठ पार के रंगीले सियार टहलने आते थे, वैसे तो वो रोज निकलते थे, लेकिन रुकते नहीं थे। क्योंकि उनके वहां रुकने की कोई वजह नहीं थी। लेकिन मलबे के ढेर पर बैठे लड़के उनको अवसर की तरह चमकदार लगे। उनके घाव कुरेदने के बाद कहने लगे चिंता मत करो इस जगह पर इस साल अपन गणेशजी बिठाते हैं, भगवान गणेश की कृपा से सब ठीक जो जाएगा। तुम लोग इन बांस बल्लियों से मंडप बना लो, मोहल्ले के बीस पच्चीस घरों से चंदा ले लो। ये लो सबसे पहले मेरे इक्कावन। लड़के देखते रहे, उनको समझ में नहीं आ रहा था। लड़कों ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा, और उससे चंदा झेल लिया। थोड़ी देर बाद पास की कलारी में जाकर उस पैसे से दारू पी ली और सबकुछ भूल गए।
लेकिन वो नहीं भुला था, वो सुबह फिर आ गया। आज घर से सब्बल फावड़ा लेकर आया था। उसने आते ही सबको काम पर लगा दिया। थोड़ी ही देर में मंडप ने आकार ले लिया, और शामतक छोटे से गणपति भी बिराज गए। स्थापना पूजा में पार्षद आया, अगले दिन एक प्रोजेक्ट स्वरूप में हटाई गई सारी गुमठियां लगने लगीं और उनकी संख्या दोगुनी होकर पूरे प्लाट पर फैल गयीं।
चंद दिनों में वहां सबकुछ गुलजार हो गया। पीछे के किसी निजी प्लॉट पर कब्जा करके सुबह देश और हिन्दू धर्म को दुश्मनों से बचाने पर चर्चा की क्लास लगने लगी। अब दुर्गा उत्सव, दशहरा, दीवाली, होली सब वहीं से संचालित होते हैं। चौराहे के नाम हिन्दू उत्सव चौराहा हो गया। वहाँ एक स्थायी मढिया है, उसके सामने गुमठियों की कतार है। रोज सुबह - शाम पूजा आरती होती है। साल भर भाँति भाँति के बहानों से चंदा इकट्ठा करने का उपक्रम चलता है। बड़े बड़े लोग आते-जाते हैं। अब वो बहुत खुश है, वो क्या अब तो सब खुश हैं। सारे लड़के चुनाव में भी काम करते हैं, और रैलियों के लिए भीड़ भी जुटाते हैं। अब चर्चा गणेश पूजा की सार्थकता पर है, जो कभी व्यर्थ नहीं जाती।

Saturday, September 8, 2018

साहित्य रत्न और मैं अधम

(संजीव परसाई) यार मेरी तड़प का कोई अंदाजा लगाओ, मैं मरा जा रहा हूँ,साहित्य के एक अदद पुरुस्कार के लिए। मैने पुरुस्कार सभा में देने के लिए एक संक्षिप्त सा बड़ा भाषण भी तैयार कर के पहले से ही रख लिया है। अब पुरुस्कार न जाने कब मिलेगा, कहीं मेरे भाषण को दीमक ही न चाट जाए सो आपके सामने ही पेल रहा हूँ -

सम्माननीय मुख्य अतिथि, चयनकर्ताओं और सभा में बैठे अपना समय जाया कर रहे दर्शकों । आज मेरे बचपन की कई आस एक झटके में पूरी हो गईं। मैं सोचता था कि ऊंचे मंच पर चढ़कर दुनिया कैसे दिखती होगी। मेरे एक दोस्त ने जिसे चौथी में डिस्टिंक्शन आई थी, तब वो स्टेज पर चढ़ा था, उसने बताया था कि मंच से सब कुछ काला काला नजर आता है। इंसान कम बालों की दुकान ज्यादा दिखाई देतीं हैं। दूसरे ओर फुरसतियों का हुजूम फुरसत में देखना हो तो ये सबसे सुनहरा मौका है। आज यहां खड़े होकर मुझे मेरा वो दोस्त याद आ रहा है, मुझे पक्का भरोसा है कि वो जरूर कहीं भाड़ झोंक रहा होगा। क्योंकि वो आजतक फेसबुक पर भी नहीं है, बताओ वो कितना पीछे हो गया होगा।
आठ-दस साल पहले में आयोजनकर्ता श्रीमान बंटवारे लाल जी के पास गया था, कि मैं लिखता हूँ मुझे भी व्यंग्य श्रेणी में नामांकित करो तो बंटवारे लाल कहने लगे, व्यंग्य तुम जो लिखते हो उसे व्यंग्य नहीं भड़ास कहते है। व्यंग्य तो मेरा भतीजा लिखता है। तुम चाहो तो तुम्हें जनसंपर्क श्रेणी का पुरुस्कार दे देते हैं, उस श्रेणी में कोई ढंग का चमचा मिल नहीं रहा है। तब मैंने उनके पैर छूते हुए कहा था कि तुम्हारा सत्यानाश हो। उसने सुन लिया और मुझे धमकी दी कि तुम्हारा छपना बंद करवा दूँगा। फिर में साहित्य अकादमी के मुखिया के पास भी गया, उनसे कहा अखबारों में विज्ञापनों के लिये मारे मारे फिरने वालों तक को आपने पुरुस्कार बांट दिए, वाकई लिखने वालों से क्या दुश्मनी है आपकी। कहने लगे आप आवेदन कर दो देखेंगे।  आज उन दोनों को कोढ़ हो गया है जिसे वे खाज कहते हैं। साहित्य जगत से उनकी स्मृतियां तक खत्म करवा चुके हैं और में पुरुस्कार ले रहा हूँ।

कुछ मेरे स्थाई विरोधी हैं, वो मेरे मरने के अलावा हर तरह के नुकसान होने की कामना करते हैं। उनको मेरे लिखने पढ़ने पर आपत्ति है, उनकी नजरों में में ढपोरशंख हूं, उनकी राय है कि मैं अंग्रेजी के व्यंग्यों को ट्रांसलेट करके ठेलता रहता हूँ। वो मुझे सत्ता पक्ष का विरोधी कहते हैं, वो मुझे वामपंथी कभी समाजवादी कहते हैं। कभी कांग्रेसी कभी भाजपाई कहते हैं। लेकिन अंततः इस मंच पर आकर मैं उनकी गढ़ी छवियों से निजात पा लूंगा, और उनको भी निजात मिलेगी। क्योंकि अब आप, बसपा और दलित चिंतक के रास्ते पाकिस्तानी होना ही रह गया है।

अपनी किताब छपवाने के लिए कई प्रकाशकों के पास गया। कइयों ने आश्वासन दिया। लेकिन उनकी बुद्धि का प्रकाश मुझतक पहुंच नहीं पाया। वो समझते थे मै थोड़ा कड़वा लिखता, हो सकता है कोई उनकी क़िताबों की फैक्टरी पर कोई घात लगाकर हमला कर दे। उनकी किताबों का बायकाट ही न कर दे। कोई सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ जहर न थूंकने लगे। या उनके यहां इनकम टैक्स का छापा ही पड़ जाए। वो मुझसे टमाटर की सब्जी और उसके देशी उपचार पर टीकाएँ लिखने की अपेक्षा कर रहे थे। वो मुझसे आउट ऑफ बॉक्स आइडिया चाहते थे, जैसे में कद्दू की सफल खेती पर व्यंग्य लिखूं। ऐसा नहीं कि मैंने कोशिश नहीं कि मैं टमाटर के बारे में लिखता तो उसमें टमाटर किसानों की बर्बादी दिखाई देने लगती और उपचार पर लिखता तो स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल व्यवस्थाएं सामने आ जाती । उससे टमाटर का खूबसूरत चटख लाल रंग जख्मों से रिसते लहुँ जैसा हो जाता। युवाओं पर लिखता तो उनकी बेरोजगारी और बेचारगी सामने आ जाती। लेकिन अब मैं खुश हूँ, की उनकी परेशानी टल गयी और मुझे मान्यता मिल गयी।
इस पुरुस्कार के लिए मैं  ज्यूरी को साधुवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने साहित्य के अथाह सागर में गोते लगाकर मुझ जैसे हीरे को खोज निकाला। मैं बचपन से ही प्रतिभाशाली था, कभी कभी तो मेरे गुरु मेरे बारे में सोचते कि इस महान बालक को क्या पढ़ाना, सो वे मुझे दूसरे फालतू कामों में लगा देते, वहां मैं उन कामों में उलझा, यहाँ तीस-चालीस बच्चों का भविष्य संभल गया। वैसे उन्होंने आजतक कोई तीर नहीं मारा, पर उनके ऊपर मेरा अहसान तो हो ही गया। आज मुझे इस मंच से पुरुस्कार लेते हुए देख वे ये जरूर ये सोच रहे होंगे, कि इस भोंदू का जीवन संवर गया। अब आज से साहित्यिक जगत में व्यंग्य के एक धूमकेतु का उदय हुआ है। जो कई दशकों तक चमकता रहेगा। अब मैं पेड़, पत्थर, आकाश, पानी, दानी, नेतागिरी, चमचागिरी सब पर व्यंग्य ठेलूँगा। इस दौर में लिखना एक बड़ी चुनोती है, लेकिन मैं पुरुस्कारों के लिए लिखूंगा। मेरे व्यंग्य पढ़ने के लिए कभी भी आधार पंजीयन की जरूरत नहीं पड़ेगी। बस आपको बुराई करने या कमी निकालने का कोई अधिकार नहीं होगा। अगर आप ऐसा करते पाए गए तो मेरी सोशल मीडिया टीम के लौंडे आपको तरह तरह से नवाजेंगे।
और हाँ, अगले किसी पुरुस्कार के लिए अगर मुझे नामांकित करने का अगर कोई सोच रहे हों, तो मुझसे फिर से शॉल श्रीफल लेकर आने की अपेक्षा न रखें। भारत माता की जय

आगे आप सोचिये, मैं तो चला सब्जी लेने....जय जय

Wednesday, August 15, 2018

प्रिय पाकिस्तान !!!

(संजीव परसाई) रामसिंग धड़धड़ाते हुए कमरे में घुसा। इतना बलबला रहा था कि जोश उसके थूथन से लार बनकर टपक रहा था। गमछे से अपने सवा हाथ के मुंह को साफ करते हुए बोला - सुना भैया आपने, आज तो इंडिया ने खुश कर दिया। मैने उसे करेक्ट करते हुए कहा - पगलैट ये हमारा देश है, ये हमें हर हाल में खुश रखता है। बाकी सरकार है जो हमसे हमारी खुशी का हिसाब तरह तरह के टैक्स वसूल करके लेती है। तुझे क्या लड्डू मिल गए सो अलग से खुश हो रहा है।

अरे नहीं भैया, आप ने गलत ट्रेक पकड़ ली, मेरा वो मतलब नहीं था, मैं तो आज के मैच की बात कर रहा था। आज इंडिया ने पाकिस्तान को नेस्तनाबूद कर दिया। ऐसा हाहाकार मचाया है, कि पाकिस्तानियों को तो हगना लग गया होगा। भैया आज तो लड्डू बांटना बनता है 

असल में रामसिंग फालतू जज्बाती आदमी है, उसके लिए देशभक्ति पाकिस्तान को मटियामेट करने तक सीमित है। देश में ऐसे लाखों रामसिंग बिखरे पड़े हैं जो पाकिस्तान को कोसकर अपनी देशभक्ति साबित करने को आतुर हैं। जब उनसे देश के लोगों की हालत, किसानों, सैनिकों, मजदूरों, बेरोजगारों की हालत पर चर्चा करो तो बिखर जाते हैं। 

राजनीति ने पाकिस्तान को चूर्ण की पुड़िया बना कर रखा है, जिसे फांक कर देशभक्ति के नशे में डूबा जा सकता है। 

हम बैल गति को प्राप्त हो चुके हैं, हमें जहां हांका जाता है हम वहीं अपनी गर्दन मटकाते, पूंछ हिलाते हुए चल देते है। बैल स्वरूप में गो वंश के प्रतिनिधि होकर हम खुश भी हो जाते हैं।

पहले हम प्रायः साल में दो बार देशभक्ति से सराबोर होते थे, अब हम प्रतिदिन प्रतिक्षण होते हैं, देशभक्ति न हुई टैक्स हो गया, जो आपका गुसलखाने में भी पीछा नहीं छोड़ेगा। हमारे सिर्फ दो राष्ट्रीय पर्व हैं, इनके अलावा हमें देशभक्ति बघारने के अवसर समझ में नहीं आते हैं। ये बढ़िया हो कि हर हफ्ते एक दिन ऐसा तय किया जाए जो सिर्फ सुबह से शाम तक देशभक्ति दिखाने के ही काम आए। देश के कुछ छोटे मोटे लोग रोजमर्रा के काम में देशभक्ति दिखाते हैं, वे सारे काम सही प्रकार से करते हैं। वो कोई देशभक्ति कि किसी नौटंकी में शामिल नहीं होते, वे अपना योगदान ईमानदारी और समर्पण के रूप में देते हैं । बाकी इन सब से बहुत ऊपर हैं, हम पाकिस्तान की मट्टी पलीत होने की खबर से ही खुश हो जाते हैं। आजकल पाकिस्तानी कम पड़ रहे हैं तो हम देश में ही पाकिस्तानी और देशद्रोही तलाश रहे हैं पहले किसी को देशद्रोही कह दो तो उसके तन-बदन में आग लग जाती थी, अब लोग हँसते हैं। अगर हमें पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था चौपट होने की कोई झूठी खबर ही सुना दे तो हम अपनी दिनों दिन पतली होती माली हालत का गम भूलकर, दुश्मन की खात्मे के जश्न में डूब ही जाते हैं। वहां बेरोजगारों और भिखमंगों की फौज देखकर अपने देश के बेरोजगारों को सांत्वना देने लगते हैं। पाकिस्तान में हो रहे बलात्कारों के व्हाट्सअप मैसेज शेयर करके देश में महिलाओं और बच्चियों के नरक होते जीवन पर पर्दा दाल देते हैं। एक राष्ट्रभक्त मिल गया कहने लगा भैया, पाकिस्तान में धर्म के खिलाफ बोलने वाले को जेल में डाल देते हैं और मुंडी काट देते हैं। अपने यहां तो लोग हिन्दू धर्म को मजाक बना कर रख दिये है। मैंने कहा - चल तू और मैं दोनों मिलकर इस देश को पाकिस्तान बनाते है, तो कहने लगा - नहीं मैं तो यूँ ही कह रहा था 
पार्ट टाइम और भाड़े के देशभक्त पगडण्डी से पाकिस्तान या दूसरे खाड़ी देशों की रवायतें भारत में लाना चाहते हैं, क्योंकि ये लोकतंत्र की मलाई चाट चाट के अपना हाजमा खराब कर बैठे हैं। अब ये उस जहर को दवा के रूप में परोसना चाह रहे हैं । इनको उम्मीद है कि ये जहर उनके मनमुताबिक या तो मार देगा या मानसिक विकलांग कर देगा  
साल के दो दिन देशभक्ति का ढोंग करने वाले देश के किसानों, मजदूरों, गरीबों, मजलूमों के नाम पर सोशल मीडिया पर अपना मल-मूत्र विसर्जित कर रहे हैं, और भाड़े के फ़ॉलोवर उसको लाइक और शेयर करके देश के विकास में अपना योगदान दे रहे हैं जिस देश में मजलूमों के साथ थोक में बर्बरता हो रही हो, उस देश के सभ्य समाज के लिए जरुरी है कि वे अपना समय गोबर, कंडे, नेताओं की बकवास, जात-पांत, हिन्दू-मुसलमान और अपने नेताओं की चमचागिरी में ही लगायें नहीं तो शर्म से गड़ने के सिवा उनके पास कोई चारा नहीं होगा इस लिहाज से मुझे पाकिस्तान प्रिय है क्योंकि वो हमें साल में पांच-दस बार शर्म से डूब मरने से बचा लेता है। 
रामसिंग अब तक अपने चेहरे से लार साफ कर चुका था, उसकी मनोदशा को पढ़कर मैंने कहा – बोल रामसिंग, भारत माता की जय, वंदेमातरम्, स्वतंत्रता दिवस अमर रहे....उसने गमछा उठाया और चल दिया। मैंने पीछे से कहा - अबे लड्डू तो खाता जा, उसने पलट के भी नहीं देखा

Thursday, August 9, 2018

अभूतपूर्व,अभिनव, क्रांतिकारी...


(संजीव परसाई) प्रशासनिक भवन की लिफ्ट में घुसते हुए मंत्री जी सोच रहे थे कि आखिर ये चुनाव की वैतरणी कैसे पर होगी। इतने काम किये लेकिन लोगों की भिखमंगाई में कुछ खास बदलाव नहीं आया। जब देखो कुछ न कुछ मांगते रहते हैं। रोजगार तो मिला नहीं उल्टे लोग निकम्मे हों गये और सरकार को गालियां देने लगे। न सड़कें बनीं न गड्ढे भरे गए, एन चुनावी सीजन में सड़कों में बने क्यूट से छोटे बड़े गड्ढे मुंह चिढा रहे हैं। लाला कमान अलग दबाव बना रहा है।
चिन्ता में मगन होकर लिफ्ट से सीधे धड़धड़ाते हुए अपने 5 स्टार ऑफिस में समा गए। पीए को निर्देश दिया कि किसी को अंदर न आने दिया जाए, उसने बिना कॉमा फुलस्टॉप विस्मयादि बोधक के जी सर कहकर निर्देश को अंगीकृत कर लिया।
लेकिन समस्या अब भी वही थी, बैचेन जनता, सिर पे सवार लाला कमान, अहसान फरामोश पार्टी कार्यकर्ता, अविश्वसनीय अधिकारी कर्मचारी, और धैर्य विहीन मीडिया से कैसे निपटा जाए। उनका मंथन खत्म ही नहीं हो रहा था। चुनावी साल में उनको अपनी कुर्सी हिलती दिख रही थी। सहारे के नाम पर दूर दूर तक कोई नहीं दिख रहा था। जिन अधिकारियों के इशारे पर वे फाइलों पर दस्तखत किया करते थे, वे अब उनसे कन्नी काटने लगे। चुपचाप निर्देशों का पालन करने वाले अब कायदों और नियमों का हवाला देकर फाइलें अटका रहे थे। कायदों के जाल में फंसे मंत्री अपने आप को हताश पा रहे। भारत के राजनीतिज्ञों को दुनिया में सबसे अनोखा माना जाता है। क्योंकि वे एक तो सफेद झूठ बोलने में माहिर हैं वहीं दूसरी ओर पूरी तरह से कीचड़ में सराबोर होने पर भी सफेद झक्क होने का ढोंग कर सकते हैं। अब जब लत्ते लगे पड़े हों तो बेफिक्र दिखाई देना भी एक चुनोती है। सो मंत्री जी ने घंटी बजाके पीए को बुलाया और उसे किसी अनकहे काम के लिए जोरदार डाँट लगाई। टुकड़ों पर पल रहे चाकर को हड़काने से उनका आत्मविश्वास वापस लौटा। एक गिलास पानी, एक चाय और चार इंच लंबी सिगरेट के साथ वे मैदान में वापसी के तरीके सोचने लगे। अब जैसे ही उनका खुद पर विश्वास स्थापित हुआ, सो फिर घंटी दबा दी। ओएसडी  साहब को बुलाओ, और दरवाजा जी सर की आवाज से बंद हो गया।
हाथ में एक दस पन्ने का राइटिंग पेड दबाए, मुंह से हैं हैं करते ओएसडी ने प्रवेश किया। आते ही रिंगटोन की तरह बजने लगे। सर वो उनको फोन करके सब कुछ समझा दिया है, आदमी निकल चुका है, आता ही होगा। पर सर वो दूसरा वाला थोड़ा मुश्किल कर रहा है, लेकिन मैं उसे मैनेज कर लूंगा। सर आपने बुलाया था, कोई आदेश।
मंत्री जी हाथों की उंगलियों को एक दूसरे में फंसा के बोले - चुनाव सिर पर हैं, क्या उपलब्धियां है, जो इस बावली जनता को दिखानी हैं। सर वो ही है सब आप तो जानते हैं, सड़क बनाई थी सो टूट गयी, पुल पुलिया बनाये थे, वो बर्बाद हो रहे हैं, बिजली कभी आती है कभी जाती है। लोगों की नॉकरियाँ छूट रही हैं, सो नए रोजगार की बात किसी काम की नहीं है। सर, ऐसा करते हैं अब जनता को आईटी दिखा देंगे सर। किसी को कुछ पल्ले ही न पड़ेगा। फिर जैसा आप कहें। आप कहें तो खेती किसानी में विकास के आंकड़े दिख दें । ओएसडी को घूरते हुए मंत्री जी ने कुर्सी पर शरीर को हल्का सा तिरछा किया, सो एक अजीब सी दुर्गंध पूरे कमरे में फैल गई।
हालांकि इस दुर्गंध की ओएसडी को आदत पड़ चुकी थी, पर ये पहले से अधिक भयानक थी, उसे बेहोशी छाने लगी। असहज स्थिति को भांपकर मंत्री ने बात बदल दी। कुछ अनोखा, अभिनव और क्रांतिकारी होना चाहिए, लोगों और मीडिया को अपील करता है।
सर ऐसा करते हैं, कि जो भी भला बुरा किया है, उन सभी कामों में अभूतपूर्व, अविस्मरणीय और ऐतिहासिक शब्द जोड़े देते है। अब कुछ नया तो हो नहीं सकता है, आप भी जानते है। एक यात्रा निकालकर ये बात जनता को बताएंगे, कि को भी हुआ था वो असल में अभूतपूर्व और क्रांतिकारी था। हल्की सी मुस्कान के साथ मंत्री जी फिर तिरछे होने लगे। ओएसडी मौका देखकर निकल गया। अब चुनाव तक हर काम ऐतिहासिक होगा, हर निर्णय क्रांतिकारी, अभूतपूर्व और सरकार अविस्मरणीय होगी।