Monday, June 11, 2018

पूंजीवादी जगमग और राग दरबारी

(संजीव परसाई) व्यंग्यकार वैसे तो कहीं ज्यादा आता जाता नहीं है, लेकिन प्रयासरत रहता है कि कम से कम लोग उसे बुलाएं तो। इस प्रकार उसका ईगो बना रहेगा और लोगों का भ्रम भी। भोपाल में राग-दरबारी के पचास साल पूरे होने पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा एक गरिमामय कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें मशहूर व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी को बतौर मुख्य वक्ता बुलाया गया। मंच पर उन्हें दो हजार वॉट का लाईट के ठीक सामने बिठा दिया गया, ताकि उनका व्यक्तित्व जगमगाता रहे। ये मंच को  समाजवादी से पूंजीवादी में बदलने का सामाजिक प्रयास था। उनकी आँखें चौंधियाने लगीं, लगा कि शायद कोई शरारती उनके सरोकारी होने की परीक्षा ले रहा है। हालांकि मंच पर ही उनके आजू-बाजू में बैठे दूसरे साहित्यकार मजे से इस पूंजीवादी जगमग का आनंद ले रहे थे, शायद इसिलिए कि वो व्यंग्यकार नहीं थे। मेरे बगल में बैठा रामसिंग कहने लगा – भैया, देखो तो दाल-रोटी खाने वाले पंडत का चेहरा कैसे दमक रहा है। मैंने जोड़ा – न रे..ये उन मुस्कुराहटों और कहकहों की चमक है जो इन्होने लूटे है, रामसिंग भंवें सिकोड़ कर मेरा चेहरा देखने लगा। हेलोजन लाईट में चमचमाता ज्ञान जी का व्यक्तित्व इस आरोप को काट रहा था कि इण्डिया में बड़ा व्यंग्यकार होने के लिए धूप में बाल सफ़ेद करने पड़ते हैं।
ज्ञान जी के चेहरे पर आ-जा रहे भाव उनकी मनोदशा को व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने मंच पर अपना पूरा समय ये सोचने में गुजारा कि श्रीलाल शुक्ल जी ने ये किताब आखिर लिखी ही क्यों होगी, उनका गुस्सा राजकमल प्रकाशन पर भी होगा, जिन्होंने इस किताब को छापा। वे सोच रहे थे क्या शिवपाल गंज के किस्से में इस हैलोजन का जिक्र भी कहीं किया है या नहीं। जैसे की सत्य के अनेक पहलु होते हैं, उसी तरह वे हेलोजेन लाईट के भी अनेक पहलुओं के बारे में सोचने लगे। वे आयोजक को वैध जी और खुद को रुप्पन बाबु मानकर अपने आसपास बद्री अग्रवाल, रंगनाथ, प्रिंसिपल, खन्ना, जोगनाथ और सनीचर को महसूस कर रहे थे। सामने बैठा जन समुदाय उनको लंगड़ दिखाई दे रहा था। आने जाने वाले वक्ता उनके गंभीर चेहरे को देखकर और ज्यादा समय लेने के लिए बेताब थे, पर वे अन्दर ही अन्दर उनसे रहम की भीख मांग रहे थे। हिन्दी का लेखक न तो तेज रोशनी का आदी है न ही व अपनी रोशनी दिखा पाता है सो जल्दी असहज हो जाता है। वैसे तो व्यंग्यकार व्यवस्था से चुहल करने के लिए जाना जाता है, लेकिन यहां मसला आयोजन की व्यवस्था का था। टेंट वाले की बुद्धिमत्ता से एक समाजवादी व्यंग्यकार पूंजीवाद का स्वाद चख पाया, वरना ये सुख उनको कहां नसीब होना था। समय इन बड़े लाइटों का है, लाईट विहीन या कम लाईट के लोगों की कोई औकात ही नहीं रही।
ज्ञान जी ने मंच पर पासंग बिराजे पड़ौसी से इस बारे में जिक्र किया, लेकिन उनको लगा कि कहीं उनको ही स्टूल पर चढ़कर बदलना न पड़े, सो उन्होंने ज्ञान जी की आगामी किताब पर चर्चा शुरू कर दी। इस मुददे पर कितना ही बड़ा लेखक क्यों न हो लरज जाता है। सो उन्होंने इस समस्या को चूल्हे में डाल, चूल्हे जैसी गर्मी में बैठना स्वीकार कर लिया। उन्होंने अपने सामने रखा एक कागज उठाकर चेहरे पर लगा लिया, सो फोटोग्राफर चेहरा दिखाने की मनुहार करने लगा। अब व्यंग्यकार का जो फोटो खिचना शुरू हुआ तो बंद होने का नाम  ही नहीं ले रहा, फ्लैश की लाइटों ने उन्हें रूसी  क्रांति पर लिखे गए नाटकों और रूजवेल्ट द्वारा अदालतों का मटियामैट करने की कोशिशों पर लिखे आलेखों का मिक्स तैयार कर दिया। सामान्यतौर पर इस प्रकार के सीमित बजट के आयोजनों में एक आध बार लाइट चली जाती है या लाइट ही खराब हो जाता है, चूंकि व्यंग्यकार का मामला  था, सो लाइट भी नहीं गई। इस दौरान उन्हें सरकार पर किए कटाक्ष याद आए, शायद बिजली विभाग ने अपना  बदला  लिया है। उन्होंने अपने चेहरे को घुमाकर बैठने की कोशिश भी की लेकिन लाईट देश की हुकूमत की तरह था, जो हर तरफ से आपको दबोचने के लिए बेताब है। जब लेखक मुंह घुमाकर बैठने लगे तो तय समझो की उसकी राज्यसभा में भेजे जाने की बात हो गई है । सो वे सतर्क होकर सीधे बैठ गए। कालांतर में अपने हाथ को ही जगन्नाथ मानकर कभी दाएं कभी बाएं करते रहे। वे मन में सोचने लगे कि शायद व्यंग्यकार को भी इसी गर्मी में तपकर शीर्ष व्यंग्यकार का दर्जा प्राप्त होता हो, सो मन मारकर पॉजिटिव सोचने लगे। उधर सारे लंगड़ सोच रहे थे की इस प्रकार के आयोजन में चाय समोसे की बजाय पेस्ट्री, पेटिस और केक मिलना चाहिए। उधर ज्ञान जी के दमकते चेहरे से ये साफ नहीं हो पा रहा था कि ये उनके दिव्य व्यक्तित्व का प्रभाव था या उनके अंदर घुमड़ते बारामासी के संवादों का। आयोजक भले मानस थे, सो बस झेलना ही है। जैसे ही प्रोग्राम ख़तम हुआ सबसे पहले ज्ञान जी हॉल से निकलकर बाहर खड़े हो गए। उनके पीछे निकले सारे लंगड़ उन्हें घेरकर भीड़ की शक्ल में ऐसे खड़े हो गए जैसे चौराहे पर कोई एक्सीडेंट हो गया हो, वे अपने सफ़ेद रुमाल से पसीना पोंछते रहे।

Friday, June 8, 2018

pungibaaj: व्हाट्स एप ग्रुप पर ठेला -ठाली

pungibaaj: व्हाट्स एप ग्रुप पर ठेला -ठाली: (संजीव परसाई) रम्मू,फत्तू, गोलू और किसन चारों दोस्त नहीं थे, उनका बस एक नाता था कि वे रोज सुबह मैदान में हलके होने साथ साथ जाते थे. स्वाभा...

Thursday, June 7, 2018

ये चाटने वाले....

(संजीव परसाई) पुलिया पर बैठकर बड़े और छोटे, सस्ती आइसक्रीम चाट रहे थे। छोटे ने कहा भाईसाब, आपने तो सबसे पहले चाट के बराबर कर दी, हमारी तो देखो अभी आधी से ज्यादा धरी है। बड़ा कहने लगा – यार वो तो मैंने लिहाज में धीरे धीरे चाटी है वरना मैं तो सेकंडों में चाट लेता हूँ। छोटा कहने लगा वाह भाईसाब ये ही तो आपकी अदा है, जिसपर दुनिया मरती है। अपनी चाटने की कला का गुणगान सुनकर बड़ा फूल कर कुप्पा हो गया। आत्ममुग्ध होकर बोला – अरे, न न... हम भी पहले तुम्हारी तरह हौले हौले ही चाटते थे, पर हमने देखा कि हमारे सामने के लिए चिरकुट तेजी से चाट के आगे निकल गए तब हमने अपनी चाटने की स्पीड बढ़ाई। भैया आपकी तो बलिहारी है, कहकर छोटा, बड़े के लिए पान लेने निकल गया।
बड़ा सोचने लगा – वो भी क्या दिन थे जब हमारे पास भी स्वाभिमान हुआ करता था, तब हम चाटने वालों से नफरत करते थे। और तो और चाटने वालों की मैयत में भी नहीं जाते थे। लेकिन समय ने पल्टा खाया और हम सबसे बड़े चाटू करार दिए गए। स्वाभिमान से चाटू तक की इस यात्रा में जो खोया वो अभिमान था और जो पाया उसकी लिस्ट बहुत लम्बी है। सब कुछ तो मिला घर-बार, गाड़ी, रुपया। इज्जत-विज्जत से होता क्या है।
तभी  छोटा पान लेकर आ गया, उन्होंने पान दबा, ऊपर से रवाल के घिस्से की पुरनी करके गाडी को गियर में डाल दिया और पुलिया से चल पड़े। उन्हें गंभीर देख छोटा बोला – भैया, किस सोच में पड़ गए। कोई पांसा आड़ा-तिरछा पड़ गया क्या? बड़ा खिड़की के बाहर पिचकारी छोड़ते हुए बोला – न रे, हम तो ये सोच रहे हैं, आजकल चाटने के धंधे में भी बड़ा काम्पटिशन हो गया है। अभी पिछले हफ्ते की ही बात ले लो, मैं नेता जी के तलवे चाटने के लिए तैयार खड़ा था, अचानक मुझे पेशाब आ गया। जब मैं लौटा तब तक एक जूनियर नेता चाट चुका था, और उसे नेता जी ने मंडल अध्यक्ष घोषित भी कर दिया। आजकल चाटने की इतनी कलाएं विकसित हो गयी हैं कि रोज अपना तरीका बदलना पड़ता है। ओहदे पर जमकर बैठा हर कोई चटवाने के लिए अपने जूते खोल कर बैठा है। नेताजी, या उनके परिवार में किसी बर्थडे, शादी की सालगिरह ऐसे अवसर हैं जब चाटने के लिए कोई भूमिका नहीं बनाना पड़ती, कहते हुए बड़े ने गाडी अपने घर की ओर मोड़ दी। छोटा कोने में उतर कर ओझल हो लिया।

बड़ा चाय की दूकान पर बैठकर सोचने लगा - वल्लभ भवन में जो भीड़ है, उसमें से बाद एक दो प्रतिशत ही काम के लिए आते हैं, बाकी तो सिर्फ चाटने का ही मनोरथ लेकर चलते हैं। यूँ तो सरकार के पास काम करने के लिए समय नहीं है, पर चाटने-चटवाने के लिए इफरात भरा पड़ा है।  सिद्धहस्त नेता, भली-भांति जानता है, कि किस्में कितनी काबिलियत है। अधिकारी के चेहरे पर ही लिखा होता है कि ये आला दर्जे का चाटुकार है। जिसके चेहरे से साफ़ नहीं होता उसे अपनी काबिलियत सिद्ध करना होती है। कुछ समय समय पर चाटते है, असल में ये आत्मसंतोषी होते हैं, इनका कोटा फिक्स होता है, एक बार कोटा भर जाने पर ये कुछ दिनों के लिए शांत हो जाते हैं और अगले अवसर की प्रतीक्षा करते हैं। लेकिन कुछ का भण्डार कुबेर की तरह, पर बिलकुल उल्टा, उसमें आशाओं के अनंत दीप जलते रहते हैं, उनका कोटा हमेशा खाली रहता है, हमेशा कुछ नए की जुगाड़ में अपना जीवन झोंक देते हैं। आजकल लोग सोशल मीडिया पर चाटने वाले भी रखते हैं, क्षणिक ख़ुशी के प्रसाद के रूप में वो भी उनकी फोटो को लाइक कर देते हैं। चमचे अपने-तलवे के लिए डिजिटल वाल बनाते हैं, दूसरों को चाटने के लिए प्रेरित करते हैं। तलवे के कुत्ते को घुमाते हुए फोटो डालकर लिखते हैं दोनों भाई साथ साथ। उनके लिए परम पूज्य, प्रतापी, विनोदी, गरीबों के मसीहा जैसे उपमान गढ़के चाटुकारिता के आसमान में छेद करने की कोशिश की जाती है। चाटने में कोई कम नहीं है। नेता आश्वासन देकर, पत्रकार लिखकर, ठेकेदार ले-दे कर, अधिकारी मन मुताबिक काम करके, दलाल साष्टांग होकर, आम आदमी जयजयकार करके, चमचा वक्त के हिसाब से रंग बदलकर चाटता है। भाई साब की बुश्शट, भाई साब का कुर्ता, कुर्ते का रंग, कुर्ते का वर्ल्ड क्लास दर्जी, कुर्ते की प्रेस, उनके बाप का उजड्ड स्वभाव, रे-बन का चश्मा, भाई साब का डील-डौल, भाई साहब की पहुँच कितनी चीजें हैं जिनपर चाटू प्रवृत्ति उड़ेली जा सकती है। सड़क का नया ठेका आ रहा है – कोई नई तरकीब भिड़ानी पड़ेगी, इस बार भाई साहब के हाथों में सलमान जैसा ब्रेसलेट तो जरुर डलवा दूंगा, न मानेंगे तो उनके सामने ही धरने पर बैठ जाऊंगा, उनके पैर पकड़ लूँगा, आखिर सलमान खान से कोई कम थोड़े हैं, मेरे भाइसाब।

Thursday, May 10, 2018

ये परियाँ भी न ...

(संजीव परसाई) रामसिंग शक्ल और अकल से भले ही बदमाश हो, पर आजकल उसका धंधा ठीक ठाक चल रहा है। जिस दौर में लोगों के धंधे पर ताले लग रहे हैं रामसिंग उन्हीं धंधों में नोट छाप रहा है। उसकी ख्वाहिशें और वो दोनों आसमान में उड़ रही हैं।
जब भी कुछ बड़ा करता या हो जाता तो जताने जरूर आता। उसे लगता है, कि इतने मोटे आसामी की हमारी नजरों में दो कौड़ी की इज्जत है। कल उसी प्रक्रिया के तहत आकर जम गया। बिना पूछे ही बताने लगा, भैया अभी सिंगापुर से लौटा हूँ, वहां से आपके लिए ये सिंगापुरी घंटी लाया हूँ। आपके काम आएगी। अब घंटी देने तक तो ठीक था, उसके काम आएगी वाले तंज को झेलते हुए कहा - पुंगी ले आता।
अगली बार लाकर देने के आस्वासन के साथ बोला - भैया
जे बताओ ये हवाई जहाज में सुंदर सुंदर लड़कियां ही क्यों नॉकरी करती हैं । मैने कहा कभी कभी इंडियन एयर लाइंस से भी सफर करो। गलत फहमी दूर हो जाएगी। कमीना खी-खी करके हंसने लगा। न भैया, असल में इतनी फूल सी कोमल और सुंदर लड़कियां फ्लाइट में चाय पानी बांटती और जूठी प्लेटें समेटती हैं, तो दिल भर आता है। ऐसी परी जैसी सुंदर लड़कियों से तो कोई काम ही नहीं करना चाहिए। पर ये लड़कियां पैसे के चक्कर में करती होंगी, वरना ऐसी क्या बन पड़ी है। मेरा तो मन भी न होता भैया, इनसे अपनी जूठी प्लेटें उठवाने का, मैंने कहा मैडम में ही रख देता हूँ, सो गुस्सा हो गई।
रामसिंग उनके बारे में बात करने को खासा उत्साहित था। उसके चेहरे की चमक बढ़ती जा रही थी। असल में वो ये भांप गया था कि ये परियाँ भी निम्न मध्यम वर्ग से ही आती हैं, वर्ना कोई बड़ा सेठ अपनी औलादों से ये काम करवायेगा क्या। ये इसी वर्ग के बस का है कि इस पेशे पर गर्व करे।
पर भैया, एक बार का हुआ फ्लाइट में एक मैडम आई और अंग्रेजी में गिटर पिटर करने लगी, हम भी सुनते रहे। ओके थैंक्यू करते रहे जब न रहा गया तो कह दिया मैडम इंग्लैंड से हो का, हिंदी न आती। सो शर्मा गई फिर हिंदी में बताया कि हम आपातकालीन द्वार पे बैठे थे, सो जरूरत पड़ने पर मदद करना होगा, हम ने कहा जरूर करेंगे भाई।हम तो बचपन से समाजसेवी हैं, क्यों भैया आप तो देख ही रहे हैं। इस विषय पर उसे हमारे विचार मालूम थे सो उसने जवाब या प्रतिक्रिया का इंतजार किए बिना आगे बढ़ना उचित समझा...पर भैया ये अंग्रेजी ही क्यों बोलती है। ऐसा क्या सरकार ने कोई नियम बनाया है। हमने कहा न रामसिंग, सरकार इन सब पचड़ों में नहीं पड़ती। असल में ये हमारी टुच्ची सोच का प्रतीक है कि अंग्रेजी बोलने वाले को अपने आप श्रेष्ठ मान लिया जाता है और हिंदी वाले को कमजोर। ये जूठी प्लेटें उठाने वाली परियाँ भी उसी सिंड्रोम की शिकार हैं। अब जूठी प्लेट समेटते समय हिंदी में बातें करेंगी तो राम भरोसे होटल के छोटू और उनमें क्या अंतर रह जायेगा। सोचना है तो ये सोचो कि स्वतंत्रता के इतने साल बाद और नारी उत्थान के तमाम प्रपंचों के बाद भी इस पेशे में आने की आवश्यकता सिर्फ  सुंदर और सुडौल लड़कियां ही हैं। सोचना है तो ये सोचो कि सुंदर और सजीधजी लड़कियां एयर लाइंस में सफर करने वालों को आकर्षित करने के लिए क्यों जरूरी हैं। सोचना है तो ये सोचो कि क्या जरूरी है कि एयरलाईंस व्यवसाय करने वाले और सफर करने वाले इन परियों के बारे में क्या सोचते है....
मैं कुछ और बोलता उसके पहले रामसिंग नमस्कार करके निकल लिया। हम भी मोबाइल के स्क्रीन पर हाथ फिराने लगे

Monday, May 7, 2018

कच्चा राष्ट्रभक्त

(संजीव परसाई) वो कभी खुश होता है, कभी घबराता है। कभी चिल्लाता है, लेकिन कभी खामोश हो जाता है। वो जगजीत सिंह और गुलाम अली की प्रेम की गजलें सुनता है, गंभीर हो जाता है गोविंदा के गानों पर ठुमकता है, हनी सिंह को अपना प्रोफाइल बनाता है। वो नौकरी ढूंढता है, उचक्कों के साथ बाइक रैली और मारा-मारी में भी शामिल होता है। वो अपने प्यार को जताने में डरता है, लेकिन वैलेंटाइन डे पर प्रेमी जोड़ों पर पत्थर फेंकता है। 

वैसे तो देश उसके लिए सबसे बड़ा है, लेकिन वो पार्टी और उसकी विचारधारा को चुन लेता है। कल दौड़ा दौड़ा आया और कहने लगा, भैया मुझे आजकल ये क्यों  लगता है कि इस देश में गृहयुद्ध शुरू हो सकता है। ये उसका आजकल रोज का काम है, उसे कभी धर्म खतरे में लगता है, कभी मानव जात। वो मोहल्ला, शहर, प्रदेश, देश और दुनिया के खात्मे की सम्भावना पर भी चिंतित हो चुका है। उसे आठ सौ साल पुराने आक्रान्ताओं से अब भी डर है इतिहास का यह दौर वो हर रोज पढता है, खुद भी डरता है, दूसरों को भी डराता है
जब मैंने उसे घूरकर देखा तो कहने लगा - आजकल वो हमारे ऊपर बहुत हमले कर रहे है वो हमसे हमारा मंदिर, स्कूल, संसाधन, नेता, सरकार, सब छीन लेना चाहते हैं भाईसाहब कल ही बता रहे थे कि आजकल उनके साथ वो भी आ गए हैं। मैने कहा उससे कुछ भी नहीं होने जा रहा, तुम चिंता मत करो। हमारा एक मजबूत राष्ट्र हैं, तुम चाय पियोगे। चाय और मजबूत राष्ट्र के मेल से उसे भरोसा हो गया, ये चाय उसे प्रभावित करती है। चाय को चरणामृत और कॉफ़ी को विदेशी संस्कृति की घुसपैठ मानता है।
कच्चे राष्ट्रभक्त की ये सबसे बड़ी खासियत होती है, कि वो प्रभाव में आकर सहमत हो जाता है, कभी कभी बिदकता भी है। अपने नेता और विचारधारा को तर्क से परे रखता है। वो विपक्ष के कुकर्मो  की लिस्ट अपने मोबाइल में रखकर चलता है, व्हाट्सएप्प पर प्राप्त हो रही सामग्री से उसे अपडेट भी करता रहता है। वो सब उसके मिसाइल हैं जो विरोधी पर हमला करने के लिए काम आती हैं। वो दिल, जिगर और जान से लड़ता है मारता है और मरता भी है । कच्चा राष्ट्रभक्त कई बार गच्चा खा जाता है, वो दूसरी पार्टी के छुटभैया से कहता है, बताइये भाई साहब अब हम कर भी क्या सकते हैं। वाम पंथी से कहता है अब आप तो सब कुछ जानते ही हैं, कोई हल निकालो। इस प्रकार से वह इन विपरीत विचारधाराओं से आंशिक रूप से सहमत हो ही जाता है। समाजवादी को गालियाँ देता है, दूसरों से हर काम में सुचिता की अपेक्षा रखता है।
उससे प्रायः लोगों का दर्द नहीं देखा जाता, किसान के पास उकडू बैठकर कहता है काका चिंता न करो सब ठीक हो जायेगा, किसान उसे सूनी आँखों से देखता है। माँ उसके भविष्य के लिए चिंतित है, वो उससे नजरों नहीं मिला पाता है। बेरोजगार को दूकान पर बिठाकर चाय पिलाता है। जब ये अपने रौ में कोसते हैं तो पैर से जमीन कुरेदता है और जूते की नोंक से पत्थर को जोर से ठोकर मारता है।
वो अभी कच्चा है, इसीलिए सबके भले बुरे में हामी भर लेता है, लेकिन अब उसका प्रमोशन होगा और वो एक पक्का राष्ट्रभक्त हो जायेगा। अब उसके सामने देश सर्वोपरि है। वो देश को जगह जगह खोजता है। वो देश को खोजने पान की दूकान पर जाता है, चंदा मांगते हुए भी वो देश को ढूंढता है। लेकिन देश नहीं मिलता। वो सोचता है या तो देश दूर जा चुका है या वो देश से दूर आ चुका है, सो अब वो राष्ट्र को खोजता है। कभी उसे संस्कारों में राष्ट्र दिखाई देता है, कभी उसे गोमाता में तो कभी फ़िल्मी गीतों में। वो देशभक्ति के गीतों की सीडी लेकर आता है लेकिन मोहम्मद रफ़ी और रहमान के गीत सुनकर कन्फ्यूज हो जाता है। पशोपेश में वो भावुक हो जाता है, और पाकिस्तान कोसता है, फिर सहसा पूरा कश्मीर लेने की जिद करता है और भारत माता की जय जोर-जोर से चिल्लाता है। फिर उसे याद आता है कि स्वतंत्रता के लिए हुए संघर्ष में बड़ा घोटाला हुआ था, वो स्वतंत्रता सेनानियों में मीनमेख निकलता है और अपनी डायरी में पॉइंट नोट करता है, भक्त कहने पर खीझ जाता है।
वो अभी भी कच्चा है, क्योंकि वो व्यथित है। इन्तजार उसके संवेदना शून्य होने का है जब उसे पक्के राष्ट्रभक्त का दर्जा मिलेगा। वो फिलहाल इस बात पर चकित है कि वो तो राष्ट्रभक्त था, लेकिन उसकी भक्ति में राष्ट्र कहाँ है, वो राष्ट्र को खोजने के लिए सोशल मीडिया की सवारी करता है, जोर जोर से चीखता है और पसीना पसीना होकर स्वयं को भी खो देता है। समय उसकी मुट्ठी से रेत की तरह फिसलता जा रहा है, वो मुट्ठियाँ जोर से भींच लेता है। खुद को जख्मी करता है और दूसरों के जख्मों पर अट्टहास करता है। देश दूर खड़ा मुस्कुराता है और उसे गले लगाना चाहता है, वो बिना लक्ष्य के दौड़ता जाता है।

Friday, April 27, 2018

नक्टे की नाक - कटना या नहीं कटना



(संजीव परसाई) हरिवंशराय बच्चन देश के कवि हैं, उनकी रचनाएं गाना गुनगुनाना हर एक का अधिकार है। लेकिन ये हिमाकत एक सेलिब्रिटी कवि ने कर दी तो बड़े बच्चन साहब गुस्सा हो गए। नोटिस थमा दिया, सहमे कवि  ने 32 रू. लौटा दिए और इसरार किया। असल में यह सब सवाल नाक का है, बड़े बच्चन साहब ने ही कहा था कि आधी जिंदगी मुकाम हासिल करने में गुजर जाती है और आधी मुकाम पर बने रहने में... शायद वो खुद ही भूल गए। खुद का तो ठीक है लेकिन रायल्टी के चक्कर में पिताजी की नाक कटवा दी।
हमारे देश में नाक का बड़ा महत्व है। नाक कट जाए या छुपाने की स्थिति बनी तो बहुत भुगतना पड़ता है। यह समस्या दूसरे देषों में नहीं है, वहां तो सबसे बड़े नक्टे की प्रतियोगिता भी होती है। लोग बड़े उत्साह से भाग भी लेते हैं, जीत जाते हैं तो टीवी पर इंटरव्यू भी देते हैं, युनिवर्सिटी में लैक्चर देने भी जाते हैं, नक्टे होने के फायदे-नुकसान पर बेस्ट सेलर किताब भी लिखते हैं। माल बटोरकर नाक कटवाने-जुड़वाने के प्रोजेक्ट में लग जाते हैं। कुछ अंतर्राष्ट्रीय नक्टे होते हैं, वे अपने यहां तो ठीक है दूसरे देशों में जाकर भी नाक कटवाते हैं।
हमारे यहां नक्टे को अपनी नाक छुपाना पड़ता है। लोग पीढ़ियों तक याद रखते हैं। मोहल्ले के एक परिवार से 50 साल पहले एक लड़की भागी थी, लोग आज तक उनकी नाक बढ़ने नहीं दे रहे हैं। ये बात अलग है कि अब देखने का नजरिया बदल गया है। पहले इसे बुराई के रूप में देखते थे लेकिन अब कहते हैं कि - काकी तब भी आधुनिक विचारों वालीं थीं। चोर-चकार, उचक्के, लफंगे, चरित्रहीन, भ्रष्टाचारी, छुटभैये, मवाली अपनी नाक कटवाने हाथ में लिए घूम रहे हैं। निकम्मी औलादों के पिता नाक को छिपाए घूम रहे हैं, कहीं कोई काट न ले। एक बड़े अधिकारी का लड़का उचक्का निकल गया, दारू पीकर सड़कों पर लोट-पोट होने लगा, उन्होंने अपनी नाक को प्लेटिनम स्टील का बनवा लिया सो नहीं कटी। लोगों ने ही ही करके कहा – सर भैया बिलकुल जमीं से जुड़े हुए हैं. कुछ  दिन बाद उनकी बिटिया ने अपनी मर्जी से विवाह कर लिया तो उनकी नाक टुकड़े-टुकड़े हो गई।
नीरव, माल्या, आसाराम जैसों की नाक पहले से ही कटी पड़ी थी सो पूरे चेहरे पर फैल गई. एक घृणित स्थिति निर्मित हो गई, जो थू-थू का कारण बनी। एक गोदी पत्रकार अपने आप को ब्राम्हणों का अगुआ कहते थे. सो सत्ता से डील करली कि इस बार ब्राम्हणों के वोट आपके नाम होंगे. ये अलग बात है कि खुद दो वोट के लायक भी नहीं थे। ब्राम्हणों को ये पता चला तो बिफर गए उन्होंने उनकी मलम्मत कर दी। नेता जी ने कहा यार पंडित तुम्हारी तो नाक कट गई।
एक प्रखर प्रगतिशील अपनी जात का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने को लालायित था, सो लटठ लेकर निकल पड़ा। अध्यक्ष बन गया, अब वो देश की नाक काटकर जाति की नाक बढ़ा रहा है। इस प्रकार उसने अपने साथ प्रगतिशील आंदोलन की भी नाक काट फेंकी। वो एक फार्चुनर खरीदकर उसकी नाक लगाएगा। 
राजनीतिक नक्टों की भी कमी नहीं है, दलबदलु अपनी नाक कटवाते हैं और कहते हैं हमने तो जनता के भले के लिए कटवाई है। वो अपनी नाक कटवाने के लिए बोली भी लगाते हैं। इस प्रकार वे एक नाक कटने के बाद नई नाक का जुगाड़ पहले ही कर लेते हैं। सरकार से कहते हैं कोई बड़ा पद दे दो, कम से कम जनता नक्टा होने का ताना तो नहीं देगी। उनके पास वैसे भी चार छः अलग अलग प्रकार की नाक होती है, एक कट भी जाए तो भी वे चिंता नहीं करते हैं, वो जानते हैं कि जैसे ही कटेगी तुरंत चायना से दूसरी मंगवा लेंगे। पहले वाली से भी और अच्छी।

Monday, April 2, 2018

दंगो के अर्थशास्त्री

(संजीव परसाई) रामस्वरूप भागता हुआ आया, जो रामस्वरूप को जानते हैं वो समझते हैं कि वो हमेशा भागता ही रहता है. वो जब पैदा हुआ था तब से भाग रहा है. भाग रहा है, इसका मतलब ये नहीं कि वो कहीं पहुँच गया है, वो आज भी वहीँ है जहाँ से चला था. दरबज्जे से ही चिल्लाया – अरे भैया आज तो गजब हो गया, हम अन्दर से चिल्लाये – वत्स वो तो रोज की ही बात है, तुम फ़िलहाल पानी पिओ, हम अभी व्हाट्सएप पर व्यस्त हैं.
मेरी बात सुनकर वो बिफर गया....तुम जैसे लोगों ने ही देश को बर्बाद कर रखा है बस लगे रहो इसी में, शहर में आग लगी पड़ी है, कुछ पता भी है. हम रन आउट से उसे देखते रहे, उसे तरस आ गया, सो थोडा नरम होकर बोला – भैया, आज तो मरते-मरते बचा. चौराहे से सब्जी लेकर चला आ रहा था, अचानक दस-बीस लौंडे आ गए और दुकानों में तोड़फोड़ करने लगे...आने जाने वाली गाड़ियों को तोड़ने लगे और लोगों को मारने लगे....मैं एक कोने में दुबक गया..पीछे से तीन लौंडों ने आकर मेरी गर्दन पकड़ ली...एक बोला – कौन जात है बे....मैंने जनेऊ दिखाई तो बोला – साला बाम्हन है, भक यहाँ से और भैया मुझे चार गालियों और दो झापड़ का आचमन करके भगा दिया..अभी सुना है वहां दूसरी पार्टी के लोग भी पहुँच गए और दोनों तोड़फोड़ में लगे हैं....बाजार बंद हो गया है.
पानी पीकर बोला – भैया ये क्या हो रहा है, समझ में नहीं आता? अब लाल बुझक्कड़ की बारी थी... अबे इसे दंगा कहते हैं, समझे हो कि नहीं, दं.....गा...जो एक वैज्ञानिक घटना है. उसमें काहे को इतना चिचियाना. अबे इससे विकास होता है.....समझे कि नहीं. डार्विन का सिद्धांत पढ़े हो कि नहीं – “सर्वाइवल ऑफ़ थे फिटेस्ट” वाला...जो शक्तिशाली है, वही बचेगा...और उसका ही तो हक़ है कि वो जिन्दा रहे. तू फिटेस्ट है सो तू जिन्दा है..लड्डू बाँट.
भैया, सुबह-सुबह भांग चढ़ा लिए हो, दंगों में लोगों का नुक्सान हो रहा है, मर रहे हैं और आप उसे भला बता रहे हो.
अबे,  तुम बताओ क्या टूटा, दूकान-गाड़ी न..........तो गाड़ी का तो इंश्योरेंस होता है, दूकान का भी होता है और नहीं होगा तो अगली बार जरुर करवाएगा...इससे इन्सुरेंस का धंधा बढेगा..बता हुआ की नहीं विकास. अब दूकान वाले अपनी दुकानों में हथियार जरुर रखेंगे तलवार, कट्टा बगैरह, सो हथियारों की बिक्री बढेगा, अब ये कट्टा, तलवार क्या अमेरिका से बनकर आता है? ....वो तो यहीं के लोग बनाते हैं, सो उनका रोजगार-व्यापार बढेगा.
असल में ये जो दंगा हैं न, एक तरह का रोजगार मेला है....अब उसने हमें घूर के देखा...
पर हम नहीं रुके – असल में ये जो लौंडे जो तुझे दो हाथ जमा दिए, सो बता इनकी औकात दो कौड़ी की थी कि नहीं, ये अपनी जिन्दगी में क्या उखाड़ेंगे...दंगों में भाग लेंगे तो किसी लाल-नीली-पीली पार्टी की नजर इन पर पड़ जायेगी तो ये कल के नेता होंगे. इनका अगुआ नेता होगा वो बड़ा नेता बनेगा, ये छोटे नेता. इनपर मुकदमे होंगे, अब, मुक़दमे क्या मुफ्त में हो जायेंगे?? अबे, ये मुक़दमे भी तो कोई वकील लडेगा..सो उसे भी काम मिलेगा...ये लौंडे एक बार मुक़दमे में जेल गए तो फिर ये परमानेंट नेता होकर रह जायेंगे. अबे ये सरकार से नौकरी भी नहीं मांगेंगे, क्योंकि सजायाफ्ता लफड़ेबाजों को सरकारी नौकरी तो मिलती नहीं है न. सरकार भी खुश, लौंडे भी खुश सोच देश को नए नेता मिलने वाले हैं और तू दो लप्पड़ खाकर रो रहा है, स्वार्थी कहीं के.
भैया, सुना है गोली खाकर मर गए चार-छः...... अबे तुम अभी भी समझे नहीं...तू बता वहां था कौन गुप्ता का लड़का था क्या...रामस्वरूप बोला नहीं भैया वो तो नौकरी पे होगा. अच्छा अग्रवाल का था क्या – नहीं भैया वो तो दूकान पे होगा. अच्छा दुबे की लड़की थी क्या – कैसी बात कर रहे हो भैया. वो तो पढने लिखने वाली है, वो कहाँ....
अबे, जब सारे पढ़े लिखे वहां नहीं थे तो वहां वो लौंडे थे, जो अपने परिवार पर बोझ हैं, सो उनके मरने पर परिवार को कोई दुःख भी नहीं होगा, हाँ लाख-दो लाख मुआवजा मिलेगा तो खुश जरुर होंगे. हो सकता है उनके माँ-बाप ने ही उन्हें मरने भेजा हो.
अबे, ये जो दंगे होते हैं न, इनसे सरकारें बनती-गिरती हैं, ये वैज्ञानिक तरीके से होते हैं. हर कहीं न तो होते हैं न किये जाते हैं, तू तो बस ये बता – कि दंगे मीडिया के कैमरों के सामने क्यों होते हैं. टायर ही क्यों जलाए जाते हैं, नेता इसकी कड़ी निंदा ही क्यों करते है, दंगाइयों को सजा क्यों नहीं होती, उलटे सरकार इनके केस वापस क्यों ले लेती है, साल दो साल में ये दंगाई पार्षद-विधायक कैसे बन जाते हैं, इनके पास बिना काम किये इतना पैसा कैसे आ जाता है??
बोल – बोल
अब भैया मैं क्या बताऊँ...
अबे तो क्या इसके लिए भी सी.बी.आई. लगाऊं....रो मत तू बस ये सोच, कि देश विकास पथ पे आगे बढ़ रहा है.....चल चोराहे पे चाय पीकर आते हैं, इससे पहले कि नेता पहुंचें, कुछ दंगा टूरिज्म हो जाए.