Tuesday, November 7, 2017

मैं कवि और सब खामखाँ..

(संजीव परसाई) कवि, शायर हो या लेखक बहुत अच्छा लिखने वाले हों या ढेर लगाने वाले 98 प्रतिशत लोगों की हकीकत यही है कि वो उसके सहारे अपना ईगो चला सकते हैं घर नहीं। एक कवि ने गोष्टी में शानदार रचनापाठ किया, साथी कवियों ने खूब तालियाँ पीटी, कवि खुश हुआ। उसकी कविता के एक एक छंद पर साथियों के हाथ लाल हो गए। कवि रचना पाठ करके बैठ गया, अपनी उपलब्धि पर मुग्ध होने लगा। उसे बाकी कवियों को सुनने और सराहने का ख्याल ही नहीं रहा।

गोष्ठी खत्म करके अपने स्कूटर को शाही अंदाज में किक मारकर सड़क पर उतार दिया।
कवि पेट्रोल डलवाने रुका, आत्ममुग्धता में भूल गया कि पेट्रोल पैसे से डलता है और लाइन में लगना पड़ता है। चहककर बोला -लड़के जानते नहीं हम कवि हैं पहले पेट्रोल हमारी गाड़ी में डालो। लड़के ने नजरअंदाज कर दिया। कवि को बुरा लगा लेकिन वो गंभीरता के चोगे

बीबी को बताने लगा कि किस तरह आज लोगों ने उसकी रचनाओं की सराहना की। बीबी ने उसका दिल रखने के लिए सब सुन लिया। फिर अंदर जाकर थैली ले आई, बोली कपड़े बाद में बदलना पहले सब्जी लेकर आओ।  कवि सोचने लगा शायद मैने गलत महिला से शादी की है, जो कभी साहित्य चर्चा में सब्जी की थैली को घुसा देती है और साहित्य पुरुस्कार की बात पर आटे का डब्बा थमा देती है। खैर, कलेजे पर पत्थर रखकर सब्जी लेने चला गया।
सब्जी वाला अठन्नी का भी मोल भाव करने की स्थिति में नहीं था, कवि को लगा ये तो अन्याय है, उसके एक महान कवि होने की किसी को जरा भी फिक्र नहीं है। खैर वो चुप रहा, घर में आज लगातार तीसरे दिन कद्दू बना था, उसे कददू से ज्यादा उसके लाल होने पर गुस्सा आया। लाल कद्दू उसे चिढ़ा रहा था, वो उसे मारने के लिए कोने में रखे लाल झंडे का डंडा निकाल लाया। तंद्रा टूटी तो उस कद्दू का वजूद नींबू, चावल से मिलकर नेस्तनाबूत हो चुका था आखिर उसे संतोष मिला। अब उसने उसे चावल के साथ मिलाकर नेस्तनाबूत कर दिया। ठंडी आह भरी और डकार मारकर सोने चल दिया। सरकार ने उसे जीएसटी से छूट दी है, कवि के लिए डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर का भी प्रावधान होने वाला है, हर कविता के लिए मोटी रकम, लेकिन सपने भी कहीं सच होते हैं भला।
अगले दिन अखबार और सोशल मीडिया में कवि छाया हुआ था। उसे लगा अब तो लोगों को उसका महत्त्व पता चलेगा, ऑफिस पहुंचकर उसने अपनी सीट पर ताजा अखबार फैला दिए। चपरासी और साथी उसकी जयजयकार करने लगे, वो मुग्ध हो गया। मैनेजर कहने लगा यहां काम करने आते हो या पेपर पढ़ने। वो कहने लगा मैं श्रेष्ठ कवि हूँ, मुझे मेरे लायक श्रेष्ठ दर्जा चाहिए। मैनेजर ने कहा जिस काम का पैसा मिलता है, दर्जा भी उसी से तय होगा, मैं खुद हाई क्लास कवि हुँ। कवि दुखी हो गया।
अगले दिन एक गोष्ठी थी, उसकी तैयारियों में व्यस्त हो गया। आज उसे पहले से भी ज्यादा जलवा बिखेरना था। वो सुबह से ही प्रफुल्लित था। लकदक कुर्ता डाल कविताएं बांचने लगा, पर ये क्या आज तो जैसे सारे साथियों के हाथ बंधे हुए थे इक्का-दुक्का वाह और चंद तालियाँ ही उसके हिस्से में आईं।  अब वो वाकई दुखी हो गया। उजड़े चमन की तरह बैठकर गोष्ठी खत्म होने का इंतजार करने लगा। कवि जो या लेखक दोनों में कॉमन ये है कि वो दाद और सराहना के लिए लार टपकाता है लेकिन दाद देने या सराहना करने में आलोचक हो जाता है। उसका मन की बात जान, साथी कवि कान में फुसफुसाने लगा, ये कायदा है कि जब हम एक दूसरे की सराहना करें, लेकिन कुछ लोग भूल जाते हैं। उनको याद दिलाना जरूरी है। अब हमारी रचनाओं पर दाद देने क्या वो पेट्रोल पंप वाला या सब्जी वाला आएगा, हैं जी।

कवि अचानक बुद्ध हो गया, ज्ञान से लबालब होकर सीधे पेट्रोल पंप पर लाइन में लगा, फिर घर से थैली लेकर सब्जी लाया और अब उसे कददू पर प्यार आ रहा था। लगातार चौथे दिन इसे कददू खाकर भी वो तृप्त था। अब वो दो भागों में बंट रहा था एक दिल बहलाने के लिए दूसरा पेट भरने के लिए।

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Sanjeev Persai

Thursday, October 26, 2017

सड़कों के गड्ढे और गड्ढों की सरकार

(संजीव परसाई ) गड्ढे अनेक हैं, अनेक का मतलब बहुत सारे। बहुत सारे मतलब हम गिन नहीं सकते उतने। सो हम ने गड्ढों को स्थाई पहचान देने के लिए उनके नाम रख दिए। लोगों ने तो बाकायदा उनके आधार कार्ड तक बनवा लिए हैं, ताकि सनद रहे। वे बहुत खुश थे, हम बात करते कि देखो ये गुप्ता के घर के सामने वाला बिल्लू एक साल में ही कितना बड़ा हो गया। कितना प्यारा है, बिल्लू गड्ढा अपनी तारीफ से फूला नहीं समाता। बारिश का पानी  जब इन प्यारे से छोटे बड़े गड्ढों में समाता तो हम जल बचाओ अभियान का हिस्सा मान लेते, उसके एवज में ये प्यारे गड्ढे बच्चों को अपने पानी में छपाक-छपाक करने देते। हम सब एक दूसरे के साथ बहुत खुश थे।
एक दिन खबर आई कि सरकार ने उन्हें अपनाने से ही इंकार कर दिया. सरकार कहने लगी हमारे यहां तो गड्ढे हैं ही नहीं तो सारे बिफर गए। कुछ बुर्जुग गड्ढों को तो हार्ट अटैक आ गया. फीमेल गडिढयों ने अपनी चूड़ियां तोड़ कर प्रलाप प्रारंभ कर दिया।
आनन फानन में गड्ढा बचाओ महासंघ की उच्च स्तरीय बैठक आयोजित की गई। महासंघ के अध्यक्ष श्री रामू गड्ढा जो एन मंत्रालय के सामने स्थित हैं, ने अपने संघ के हित की जोरदार दलील दी और महासचिव श्यामू गडढ़ा ने गड्ढों के लाभार्थियों की सूची जारी कर दी। जैसे ही सूची  जारी की गई राजनीतिक और प्रशासनिक हल्कों में हाहाकार मच गया। सड़क ठेकेदारों से लेकर टटपुंजिए सप्लायर तक डेमेज कंट्रोल में लग गए। उधर  प्रशासन ने उन गडढों के खिलाफ सख्त कार्यवाही के निर्देश जारी कर दिए। नगर निगम, नगर पालिकाओं, पीडब्ल्यूडी, और केन्द्रीय सरकार के संगठन गड्ढों के खिलाफ सख्त कार्यवाही करने के लिए एकजुट हो गए। व्यापक पैमाने पर गड्ढा संहार की योजना बनाई जाने लगी.
उधर गड्ढा संघ भी अपने खिलाफ की जा रही कार्यवाही से बिफर गया।  साहनी, दास, भाटिया, सभरवाल, गुप्ता, चडढ़ा और चावला गड्ढा के नेतृत्व में वीआईपी इलाकों के गड्ढों सरकार को ज्ञापन दिया. सरकार ने उनको कहा कि तुम लोग इस टंटे से दूर ही रहो तो बेहतर है। वैसे भी तुम तो न संख्या में हो न ही आकार में हो, सो वे मुंह लटकाकर आ गए। दूसरी ओर नील, निरंजन, गडढेष्वर, पाल गड्ढा, शाहरूख, सलमान और हरमीत गड्ढा के साथ होकर शहरों और बाजारों के गड्ढों ने सरकार का मुखर विरोध शुरू कर दिया। सरकार को सबसे अधिक हलाकान समरथ, कालू, युसूफ, आमिर और दशरथ के नेतृत्व में ग्रामीण और कस्बाई इलाकों के गड्ढों ने किया। वे संख्या बल में भी सबसे अधिक जो हैं। सो उनके प्रदर्शन के आगे सरकार की घिग्घी बंध गई।
पूरे प्रदेष में गड्ढा संघ एकजुट होकर प्रदर्शन करने लगा। आज शहर में गड्ढों की हड़ताल है। मुददा है कि यह गड्ढा संहार कितना उचित है, गड्ढे अपना आधार कार्ड लहराकर सरकार को चुनौती दे रहे थे।  कुछ अतिउत्साही गड्ढे तो कहने लगे कि हमने तो वोट भी दिया है, हमारे वोट से तो सरकार तक बनी है। फिर हमारे अस्तित्व को कैसे नकारा जा सकता है। गड्ढों के गडढ़ीय अधिकारों के समर्थन में अधबनी और जीर्ण-शीर्ण पुलियाओं, नालों, पक्का होने की बाट जोह रहे कच्चे रास्तों और हाल ही में पहली बरसात में उधड़ गए रास्तों ने भी अपना समर्थन जारी कर दिया। इसी श्रृंखला में एक सड़क ठेकेदार पर अधिक सीमेंट मिलाने का केस भी दायर कर दिया।
गड्ढों ने अपने चारों ओर रंगोली बना ली और अपने अस्तित्व को  मानने पर सरकार को मजबूर करने लगे। उधर सोशल मीडिया पर गडढ़ा समर्थकों ने मोर्चा संभाल लिया। अबकी बार गड्ढा समर्थक सरकार का नारा बुलंद किया जाने लगा।
छोटे, बड़े, बच्चे, बूढ़े जवान गड्ढे अपने अधिकारों के लिए बिल्डिंगों में आ गए. सरकार के कर्ता-धर्ता अब गड्ढों के क़ानूनी अधिकारों पर विशेषज्ञों से राय मशवरा कर रहे हैं. जल्द ही इस समस्या का हल निकल जाने की उम्मीद है. वैसे राष्ट्रीय गड्ढा पार्टी ने इस मुद्दे को लपक लिया है, सो राजनीतिक तमाशा तो चलेगा ही.

Tuesday, October 17, 2017

अथ श्री नरक चौदस कथा !!!

(संजीव परसाई) एक राजा था, वो अपने नागरिकों से तरह तरह के कर वसूल करता था। उसने विकास के नाम पर लोगों का जीना मुहाल कर रखा था। पुल, सड़कें, बाज़ार, आमदनी, बच्चे, कपडे लत्ते, खाना-पीना, चिकित्सा आदि सब कुछ पर कर वसूलता था। 
एक बार वो नगर भ्रमण पर निकला, वो मर्सडीज में बैठा  शहर पर कर थोपने के नए आइडिया सोच रहा था, अचानक उसकी नजर कार के सीसे पर बैठी मक्खी पर पड़ी। वो गुस्से से मक्खी से बोला-मक्खी तेरी ये हिम्मत जो मेरी कार पर बैठे। मैं तुझे सजा ए मौत देता हूँ। और अपने सिपाहियों से बोला- जाओ इस मक्खी को मौत के घाट उतार दो. सिपाही- जी सरकार कहकर, राजा का हुकम बजाने निकल पड़े.
वो दौड़ते भागते रहे,लेकिन बदमाश मक्खी एक मक्खियों के झुण्ड में जाकर मिल गई. अप सिपाही परेशान की किस तरह उस मक्खी को तलाशें.  किसी दूसरी मक्खी को भी नहीं मार सकते.
मंत्री ने राजा को सलाह दी, कि राजन. उस मक्खी को तलाशना असंभव है, लेकिन एक आइडिया मेरे दिमाग में आया है, इजाजत हो तो कहूँ!!!
राजन की हाँ होने पर – मंत्री ने कहा, राजन मैंने पता लगाया है, कि इस मक्खी का पैदा होना प्रजा की जिम्मेदारी है, क्योंकि वो ध्यान नहीं रखती और गंदगी करती है. सो क्यों न उनकर एक टैक्स लगा दिया जाए जो पुरे नगर के नागरिकों से वसूल किया जायेगा.
राजा को आइडिया जमा, उसने अपने सिपाहियों को वापस बुलाया और मंत्री को नगर में नई टैक्सयोजना का ड्राफ्ट करने का आदेश दिया. मंत्री दो- चार कंसल्टेंट के साथ बैठा और एक महीने बाद एक बड़ी योजना लेकर हाजिर हुआ, जिसमें नागरिकों पर 35 तरह के विभिन्न कर थे. राजा हैरत में पड़ गया, उसने कहा – मैंने तो तुम्हें एक कर का बोला था लेकिन तुम तो 35 करों का जुगाड़ कर लाए, तुम्हें  इसका इनाम मिलेगा, कंसल्टेंट का कांट्रेक्ट दो साल के लिए और  बढ़ा दो.
राजा ने प्रस्ताव के अनुसार अपने शहर में एक नगर विभाग बनवाया, जिसका काम सिर्फ कर वसूल करना था, साल भर उसके कर्मचारी शहर में घूम घूमकर लोगों से अड़ीडाल कर कर वसूला करते थे. जो भी कुछ काम करने की कहता वो उसे धमकाते और उसपर दोगुना टैक्स लगा देते.प्रजा को तो इस सब की आदत थी. लेकिन एक बार प्रजा ने आवाज उठाई, कि जब इतने कर लेते हो तो सफाई भी तो करो. प्रजा के इस प्रकार सवाल खड़े करने पर राजा को गुस्सा आया लेकिन थोड़ी लज्जा भी आई, सो उसने मंत्री से कुछ इस प्रकार को जुगाड़ तलाशने को कहा जिसमें यह भी न लगे की हम प्रजा के सामने झुक गए हैं और नगर में सफाई भी हो जाए.  सो  मंत्री फिर कंसल्टेंट के साथ बैठा, और राजा को आइडिया दिया – राजन ऐसा करते हैं कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष  की तिथि चौदस को हमारे शहर में नगर विभाग बना था. सो इस दिन को हमें सेलिब्रेट करना चाहिए. इस दिन को हम शहर में “नगर चौदस” के रूप में मनाएंगे. इस दिन सभी नागरिक मिलकर अपने घरों और शहर की सफाई करेंगे. इसका फायदा यह होगा की हम इस झंझट से बच जायेंगे और दीवाली के दिन पूरा शहर साफ़ हो जाएगा. इसका क्रेडिट हमें मिलेगा और आप अच्छे से दीवाली मना सकेंगे.
राजा ने खुश और गदगदायमान होकर इसके लिए सहमती दे दी और खुश होकर कंसल्टेंट का पेमेंट रिलीज करने पर सहमती दे दी. तभी से नगर चौदस का त्यौहार धीरे धीरे पूरे देश में प्रचलित हो गया. कालान्तर में नागरिकों के गुस्से और कुछ भाषा के धिसाव ने इसको नरक चौदस कर दिया….

Thursday, October 5, 2017

चायना, सोशल मीडिया और चैनल वीर

(संजीव परसाई) सामान्य तौर पर मैं छुट्टी के दिन कहीं निकलता नहीं हूँ. पर इस ऐतवार घर में करने, कहने सुनने को कुछ ख़ास नहीं था सो मैंने सोचा चलूँ कहीं बैठकर निन्दारस का ही आनंद लूँगा. अब इसके लिए मुफीद जगह कॉफी हाउस ही समझ में आई, सो गाडी वहीँ मोड़ दी. पहुंचा ही था कि दरवाजे के गेट पर काले कोट में एक आदमी दुखी या करीब करीब लुटा पिटा सा नजर आया. अपन भोपाल के हैं सो थोड़ी यहां की सभ्यता भी फालो करते हैं, सो पूछ लिया - कोखां क्या हो रिया है? उसने मुझे ऐसे देखा जैसे चिल्लर उठाने वाला हूँ। लेकिन मैंने भी छोड़ा नहीं - भिया कौन हो, ऐसा लगता है कि कभी मिले हैं हम...मुंह बिचकाकर करने लगा, तुम इंडियन का यही प्रॉब्लम है, तुम लोग आदमी को जानते जरुर हो पर पहचानते नहीं हो. थोड़े डिस्टेंस से बात करो, मैं जिनपिंग हूँ, चायना का सदर.

मैं गिरते गिरते बचा, भाई तुम यहाँ क्या घास छील रए हो, वहां चायना में सब ठीक तो चल रहा है न, या वहां भी लत्ते लग गए...दुखी मन से बोले...मेरी जो हालत है उसके जिम्मेदार सोशल मीडिया सेना और यहां के टीवी न्यूज चैनल हैं, बड़ी मुश्किल से मैंने इज्जत और हिम्मत जुटाई थी, वो सब आपकी सरकार और सेना ने मिलकर मिटा दी और कहते हुए फफक-फफककर रोने लगे. भाई कांधे पे मुंडी धर दी।  मैं उनको लपक के कॉफी हाउस में अन्दर ले गया, उनको उनकी मनपसंद कड़वी कॉफी और सिगरेट पेश किया, सो चेहरे पर थोड़ी मुस्कान आई. सिगरेट का गहरा कश लेकर कहने लगे, भारत सरकार, सोशल मीडिया और टीवी के एंकरों से मैं बहुत डरा हुआ हूँ, सबूत के तौर पर उन्होंने अपने खड़े हुए रोंगटे भी प्रस्तुत कर दिए. मैं निरुत्तर ही रहा. मुझे विदेश नीति से, व्यापार नीति से, मीडिया नीति से सब तरफ से घेर रखा है. आए दिन सोशल मीडिया सेना पर लौंडे-लपाड़े मेरी बिजली की लड़ियाँ, और खिलौने खरीदना बंद करने की धमकी देते रहते हैं, सो मेरी कंपकंपी और बढ़ जाती है. मेरे दोस्त को आपकी सरकार ने कड़ी निंदा कर करके इस हालत में ला दिया है की अब वो लहुलुहान होकर घर में ही पड़ा हुआ है. मेरी भी हालत वैसी ही होने जा रही है, अभी पतंजलि कम्पनी की ब्लड प्रेशर की दवाई खाकर बैठा हूँ. मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊं मुझे सूझ नहीं पड़ रहा है. अगर तुम मेरी मदद करोगे तो मैं तुमको इस दीवाली पर दो सीरिज मुफ्त में दूंगा.

वैसे मैं ईमान का पक्का हूँ पर 25 रूपट्टी की सीरिज का नाम आते ही थोडा कमजोर हो गया, हें हें करके बोला...न भिया वो बात नहीं है, हमारी तो संस्कृति ही सबकी मदद करना है, सो करेंगे न. आप दुखी मत हो, तुम अच्छी चीजें बनाते हो, हम जरुर खरीदेंगे चिंता मत करो. हमारे तो घर तुम्हारी बनाई चीजों भरे पड़े हैं, अभी राखी भी खरीदी थी, अब दिवाली का सामान भी खरीदेंगे, सब कुछ खरीदेंगे जो तुम हमें टिकाओगे. मेरे अधिकृत आश्वासन के बाद वो थोडा सामान्य हुए. चहक के बोले – तो मैं पक्का समझूँ कि अब मुझे और चायना को भारत की तरफ से कोई खतरा नहीं है. हाँ हाँ – मैंने भारत की तरफ से हुलसकर कह दिया. तुम चिंता मत करो अभी हमारे यहाँ एक बलात्कारी बाबा पकड़ाया है, सो सब नेता, सरकार, मीडिया सब उसी में व्यस्त हैं. टीवी चैनल उसकी 'मुँहबोली' लड़की के पीछे मनोहर कहानियां बनाने में लगे हैं, उसके बाद कुछ और होगा. ये सब चलता रहेगा, कोई कमीवेशी हो तो बताना मैं अपने क्षेत्र के पार्षद से कह दूंगा वो मोदीजी से भी निवेदन कर लेंगे. उनका खासा रसूख है। दस एक राज्यों के मुख्यमंत्री से उनकी रोज राम-राम होती है, वो बात अलग है कि अभी हमारे यहाँ की सड़कें सालों से अधबनी पड़ी हैं. और सुनो भाई तुम लोग ये धमकी वगैरह से मत डरा करो, हमारे यहाँ  सरकार में स्थाई निंदा विंग हैं, जो अपना काम करते रहते हैं. दूसरे ओर हमारे नेता और सोशल मीडिया सेना पूरे पांच साल, सोते, जागते, उठते, बैठते, खाते, .........चुनावी मोड पर ही रहती है, सो ये सब करना पड़ता है. सुनकर उसकी आँखें चमक गयीं. कहने लगा ये सब चुनाव के लिए होता है तो भाई मैं भी ट्राय करूँगा. पर एक बात तो आपको मुझे और बतानी हैं, जो मुझे और मेरे देश को खाय जा रही है. आपके खबरिया चैनल के एंकर मुझे आए दिन धमकाते हैं, उसका नाम सुनकर मैं और 1 अरब 40 करोड़ चीनी एक साथ कांपने लगते हैं. निशानी के तौर पर उसने फिर बांह उघाड़कर अपने खड़े हुए रोंगटे दिखाए। अब हमसे सही न गई, सो कह दिया - अबे तुम हमारे यहां खरबों का बिजिनेस करते हो, उनको विज्ञापन काहे नहीं देते हो, अब वो निरुत्तर रहा.
हमने कहा -हो गया तुम्हारा, अब हमारी कंसलटेंसी फीस का बात भी कर लिया जाए। हमें चाहिए इंडिया में प्रोजेक्ट पार्टनरशिप, 10 चायनीज सीरीज और एक ठौ चायनीज इन्वर्टर..इन्वर्टर ...इन्वर्टर...इन्वर्टर
तभी पीछे से आवाज आई ये अल सुबह ये इन्वर्टर का क्या नया राग लेकर बैठ गए...हम उठे और चायनीज टूथब्रश पर पतंजलि का टूथपेस्ट लगा के घिसने लगे।

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Thursday, September 21, 2017

फटे जूते और बीड़ी का साहित्य में स्थान

(संजीव परसाई)  डिप्टी डायरेक्टर रामलखन रिटायरमेंट के बाद खुद को साहित्य के दंगल में झोंकने को उद्यत थे. उन्हें नौकरी में लिखी नोटशीट और साहित्य लेखन में कुछ ख़ास अंतर नहीं समझ में आया. किसी की सलाह पर सिगरेट छोड़ कर बीड़ी पीने लगे और पैरों में फटे जूते डाल साहित्य गोष्ठियों में इठलाने लगे. नोटशीटनुमा साहित्य का जोर शोर से सृजन होने लगा. हर रचना मेरे अभिमत से शुरू होकर पाठकों के अवलोकनार्थ और अनुमोदनार्थ पर ख़त्म होती.
फटे जूते और बीड़ी हिंदी साहित्य के यादगार प्रतीक हैं, जो इसकी दशा को व्यक्त करने के लिए काफी है. आधुनिक हिंदी साहित्यकार, प्रेमचंद की फटे जूते पहने वाली और मुक्तिबोध की बीडी पीते हुए तस्वीर अपने ड्राइंग रूम में जरुर सजाते हैं. समझ में नहीं आता कि ये दोनों तस्वीरें लेखन के लिए माहौल बनाती हैं या चेतावनी देती हैं कि अभी भी समय है बच सके तो बच ले.
सरकारें साहित्य और साहित्यकारों को गंभीरता से लेने के लिए बाध्य नहीं हैं. कमी ढूंढने वाले कहते रहते हैं कि सरकार बजट में भी साहित्यकारों के लिए कोई प्रावधान नहीं करती है. पूरा बजट छान मारा लेकिन उसमें साहित्य प्रेम कहीं नहीं मिला. अंग्रेजी के साहित्यकार एलीट क्लास को प्राप्त हो गए हैं वो अपना सामान दूसरे देशों में भी खपा कर खुद को सेलेब्रिटी घोषित करवा लेते हैं. प्रकाशक, लेखकों से एडवांस पेमेंट लेकर किताबें छाप रहे हैं.  हिंदी और क्षेत्रीय भाषा के साहित्यकारों को यह सुविधा प्राप्त नहीं है. वे अपने अछे भले साहित्य को लेकर प्रकाशक के दरवाजे पर बैठे हैं. अब वे सरकार से बीपीएल कार्ड देने की मांग कर सकते हैं. कुछ दिन में साहित्य रचना पार्ट टाइम काम होने वाला है. लोग दफ्तरों, दुकानों में बैठकर या बचे समय में घर के कामों से बचकर साहित्य की रचना करेंगे और बीबी और बॉस के ताने सुनेंगे. लोग इसके भी तरफदार हैं कि साहित्य रचना फुल टाइम काम नहीं होना चाहिए. प्रेमचंद खुद कुल जमा 56 साल का जीवन जिए. जिसमें से 16 साल उनके निकाल दें तो बचे कुल 40 साल उन्होंने अपने जीवन काल में 16 उपन्यास सहित डेढ़ सौ से अधिक छोटी बड़ी रचनाएँ लिखीं. अपने जीवनकाल में हर साल तीन-चार सौ पेज लिखे होंगे और साथ में नौकरी भी की, बीमार भी पड़े और बाकी सब दुसरे काम भी किये होंगे. वो भी तब जब न तो घोस्ट राइटर हुआ करते थे न ही कंप्यूटर, सब कुछ हाथ से. ये बात अलग है कि इस दौरान न तो उन्हें कहीं भाषण देने का मौका मिला, न फीता काटने का और न ही किसी चैनल पर चर्चा की न फेसबुक पर भाड़ झोंकी, बस लिखते ही गए.
आज का साहित्यकार आधुनिकतावादी हो गया है, वो सरकारी किरपा की जुगाड़ में मंत्रालय और महानुभावों के द्वारे टहलता रहता है. ड्राइंग रूम मुक्तिबोध की फोटो टांग कर लिखता है और खुद के घटिया लेखन पर चाँद की तरह मुंह टेढ़ा कर लेता है. खिड़की हरियाली की ओर खुलना चाहिए, लेकिन फिर खिड़की की ओर पीठ करके बैठता है, उसे उजाला चुभता है. अपनी टेबल पर व्हिस्की की चुस्की के साथ सर्वहारा वर्ग की दुर्दशा पर उपन्यास का प्लाट बना रहा है. अब विचार नहीं विचारधारा का साहित्य लिखने का चलन है. सोशल मीडिया इस साहित्य की खुली मंडी हो चला है, अब पढने के पहले तस्दीक करना पड़ता है कि वेज है या नॉनवेज. हालात ये ही रहे तो साहित्य का कूड़ा हटाने के लिए भी एक स्वच्छता अभियान चलाना पड़ेगा. नोटबंदी और जीएसटी पर लोगों को उम्मीद थी कि ये जरुर चें-चें करेंगे. लेकिन वे मुंह में दही जमा के बैठ गए. इनकी चुप्पी से ट्रोल सम्प्रदाय निराश हो गया, वो चिंता में है कि अब गालियां देकर किसे देश से बाहर निकलने का फतवा जारी करेगा, हुआ और बाकियों ने चैन की सांस ली.
रामलखन चौराहे पर पान की दूकान पर रोज जाकर बैठते हैं, और लिखने के लिए नए-नए विषय तलाशते हैं, लिखते तो विचार हैं, पर विचारधारा दिखाई देती है. उनका लक्ष्य है कि उनकी कहानियों या उपन्यास पर एक दो फिल्म बन जाएँ फिर वो भी कामेडी नाइट्स जैसे हल्के ठिकानों पर बैठकर चुटकुले सुनायेंगे, भांड की तरह नाचेंगे, और विदेशी व्हिस्की की आहिस्ता से चुस्कियां लेंगे. मुक्तिबोध की बीड़ी पीते हुए तस्वीर देखकर उनको लगा की उन्होंने पूरी जिन्दगी सिर्फ बीड़ी पी है. आज के कई साहित्यकार इस बीड़ी पीते हुए महान लेखक की फोटो अपने ड्राइंग रूम में सजाकर महान बन रहे हैं. रामलखन ने फेसबुक पर तुरंत अपडेट किया कि सरकार ने बीड़ी पर कोई टैक्स नहीं लगाया है, ये सरकार की साहित्य के प्रति सहृदयता को प्रदर्शित करता है.

Wednesday, August 30, 2017

नेता और बाबा मुस्कुरा दिए, जनता पगला गई


(संजीव परसाई) बाबा अपनी मर्सडीज से निकला और लपककर गादी पर बैठ गया, नीचे भक्त शाष्टांत हो गए. बाबा ने ऊपर वाले का नाम लेकर हुंकारा लगाया, भक्तों ने भी साथ दिया. अब भक्तों की बारी थी, सो भक्तों ने बाबा के नाम का जयकारा लगाया, सो बाबा मुस्कुरा दिया. नीचे हाथ जोड़े बैठे नेता ने बाबा को व्हाट्सएप पर मेसेज किया – छा गए गुरु....लगे रहो. बाबा ने इगनोर कर दिया और देवताओं और असुरों के बीच युद्ध में देवताओं की जीत का किस्सा सुनाने लगा.  भक्त भावनाओं के सागर में हिलोरें लेने लगे. युद्ध में देवताओं की जीत पर भक्तों ने बाबा के नाम का जयकारा लगाया....बाबा मुस्कुरा दिया
बाबा दुनिया के हर धर्म और देश में पाए जाते हैं, लेकिन हमारे बाबा सबसे अनूठे है. दूसरों को माया मोह से दूर रहने की सलाह देता है, और खुद उसी के पास बैठा रहता है. भले ही दुसरे धर्मों और देशों में पढ़ लिखकर बाबागिरी के धंधे में आते हैं. निठल्ले, नकारे और शातिर होना पहला क्वालिफिकेशन है. बाबा होने के लिए न ही ज्ञान न ध्यान की जरुरत है. वेदों और शास्त्रों की सुनी सुनाई बातों को मिर्च मसाला लगाकर भोले भले जनमानस को ठेल दो, वो गदगद और उसकी जेब अपनी. ये एक मात्र धंधा है जिसमें लोग लुटने के लिए न सिर्फ खुद आते हैं बल्कि अपने घर परिवार, खानदान, पुरा-पड़ोस तक को खींच लाते हैं. और आगे चलकर यही वोट में बदल जाते हैं. नेता ने बाबा को फिर मेसेज किया – गुरु हम भी बैठे हैं, नीचे जरा हमें भी ऊपर बुलवा लो, जनता से थोडा हम भी मुखातिब हो लें. बाबा ने प्रवचन झाड़ते हुए सन्देश दिया , कि  कभी भी आपको आपकी किस्मत से अधिक नहीं मिलता, जब तक तुम देवता और संतों के काम नहीं आओगे सो ये परमात्मा तुम्हारे कैसे काम आएगा. नेता समझ गया कि बाबा सरकारी जमीन को कब्जाने की फ़ाइल की बात कर रहा है. सो अगला मेसेज डाला की फ़ाइल हो गई है, बस आदेश निकलने हैं. बाबा ने फिर इग्नोर कर दिया, लेकिन भक्तों को कहा की भगवान् आपके वादे पर कभी संदेह नहीं करता लेकिन जब आपका वादा पूरा करोगे तब ही भगवन आपको प्रसाद देता है. अतः भक्तों भगवान् और संतों के सामने किये गए वादे को हमेशा निभाओ, तभी भक्तों का आशीर्वाद मिलेगा. धर्म का ठेकेदार नेता दो घंटे अपने सामने धर्म की ऐसी-तैसी होते देखता रहा. और जब समझ गया कि बाबा हाथ नहीं आने का. सो हाथ जोड़कर बाहर निकल  गया.
युद्ध का प्रसंग वर्णन करते हुआ बाबा अपने ईगो में मुस्कुरा दिया. शाम को बाबा के खिलाफ एक पुराने केस में चार्जशीट दाखिल हो गई. न्यूज चैनल में बाबा की खाट खड़ी होने लगी. नेता एक सभा को संबोधित कर रहा था, बाबा ने नेता को मेसेज किया – अरे गुरु तुम तो गुस्सा हो गए... नेता ने इग्नोर कर दिया. जनता को संबोधित करके बोले हम धर्म की राजनीति नहीं करते, हमारा धर्म तो आम लोगों की सेवा करना है. इसलिए हम ईगो नहीं पालते. हमारी तो सब कुछ ये जनता ही है. बाबा ने फिर मेसेज डाला – केस तो तुम्हारे भी पेंडिंग हैं, कहो तो तुम्हारे बड़े नेता से बात करूँ. नेता ने इगनोर कर दिया और जनता से कहा – जब तक हमें आप लोगों का साथ है, ऊपर वाला भी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता. जनता ने नेता के नाम का जयकारा लगाया. नेता इगो में मुस्कुरा दिया. बाबा समझ गया कि ये आसानी से मानने वाला नहीं है. बाबा ने अगला मेसेज विरोधी दल के नेता को डाला और उसे अपने प्रवचन में बुलाया. उधर अख़बारों में खबर चली गई की विरोधी नेता बाबा के प्रवचन में जा रहा है, बाबा मुस्कुरा दिया.

सुबह सुबह विरोधी नेता बाबा की गादी के बगल में हाथ जोड़कर खड़ा हुआ और आशीर्वाद लेकर निकल गया. बाबा के भक्त समझ गए कि इस बार झंडा पार्टी को वोट देना है. झंडा पार्टी की सरकार आ गई, बाबा अब खुश है उसका धंधा भी खूब चला रहा है, उधर बाबा के केस खुल गए, बाबा अब जेल जाएगा, बाबा की संपत्ति जब्त होगी. देश के सब छोटे बड़े बाबाओं को सबक मिल गया. पागल भक्त थोड़े दिन पगलायेंगे, नेता अपनी दुकानदारी चमकाने के लिए फिर एक बाबा गढ़ेगा, गोदी मीडिया उसकी ब्रांडिंग करेगा, जनता उसके चक्कर लगाने लगेगी और इसी तरह धर्म की मिटटी पलीत होती रहेगी. 

Monday, August 7, 2017

व्हाट्स एप ग्रुप पर ठेला -ठाली

(संजीव परसाई) रम्मू,फत्तू, गोलू और किसन चारों दोस्त नहीं थे, उनका बस एक नाता था कि वे रोज सुबह मैदान में हलके होने साथ साथ जाते थे. स्वाभाविक है उनके बीच लोटा ज्ञान पर चर्चा भी होती थी. किसन ने देखा कि लोग इस ज्ञान चर्चा पर गंभीरता खोते जा रहे हैं, सो उसने एक बार दिशा मैदान से लौटते समय प्रस्ताव रखा, भाई ऐसा ये रोज रोज लेट आना या आगे पीछे आने से नहीं चलेगा. हम ऐसा करते हैं कि एक व्हाट्स एप ग्रुप बना लेते हैं, जो भी आगे-पीछे होगा या लेट होगा उसपर अपडेट करेगा. और एक फायदा अब गोलू बोला – भैया उसपे तो हम हलके होते होते भी चर्चा कर सकते हैं. और नियम बना लेंगे जो भी फुर्सत हो जायेगा ग्रुप पर बताएगा सो सब लोग एक साथ उठेंगे. आइडिया चल निकला, अब सारे लोटा छाप अपना ग्रुप बना कर ढेर लगा रहे हैं.
व्हाट्स एप ग्रुप आज की हकीकत है, आज पूरी सरकार, यारी दोस्ती, व्यापार, गोलमाल, ठगी सब कुछ व्हाट्सएप ग्रुप पर चल रहा है. अभी सुनने में आया की एक चोरों का गिरोह पकडाया जो व्हाट्स एप ग्रुप बनाकर सूचनाओं का आदान-प्रदान किया करता था. सरकार में हर विभाग के अधिकारीयों से चपरासी तक के ग्रुप बने हुए हैं. अधिकारी अपने ग्रुप पर कम अपडेट करके अपनी जिम्मेदारी अपने मातहतों पर ठेल रहे है. बड़े साहब पूछने लगे – काम हो गया, सो बड़े बाबु कहने लगे सर, ग्रुप पर डाल दिया है. असल में ये परदे के पीछे मातहतों की खुशियाँ खाने का प्रोग्राम बनकर रह गया है. छोटे बाबु ने ऑफिस के ग्रुप पर एक जोक ठेल दिया, बड़े बाबु पहले तो खूब हँसे फिर उसे कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया. नोटिस में लिखा कि ये छोटा बाबु ख़ुशी-ख़ुशी काम करते हुए पाया गया. जो इसका अधिकार नहीं है, सरकार में काम तो हर दम रोते हुए करना चाहिए और इसने प्रोटोकॉल का उल्लंघन किया है, सो क्यों न तुम्हें दो वेतन वृद्धि रोक कर रुलाया जाए. असल में क्योंकि सरकार में जो कर्मचारी रोता नहीं उसे रुलाया जाता है, फिर काम कराया जाता है. छोटे बाबु ने अपनी गलती मान ली, अब वो अपने ऊपर दबाव महसूस करके रोनी सूरत बनाकर काम करता है, बड़ा बाबू खुश है.

अब मोबाइल ग्रुप से ही भरा हुआ है, कभी कभी तो ग्रुप मोबाइल से निकल कर नीचे बिखर जाते हैं सो उन्हें सड़क पर उकडू बैठ कर समेटना पड़ता है. स्कूल के दोस्तों का, कोलेज के दोस्तों का, छः कम्पनियों में काम किया है सो उस सभी का, ससुराल वालों का, बिरादरी वालों सहकर्मियों का, लाइक माइंडेड का हल्कों का, ऑफिस का जूनियर का सीनियर का, सब्जी वालों और बीफ खाने वालों का, अनाज वालों का, भिखारियों का, बीमारियों का, लुटे हुओं का पिटे हुओं का, कद्दू पसंद करने वालों का लौकी के दुश्मनों का, समर्थकों  विरोधियों का, पत्रकारों का सरकार के पिट्ठुओं का...सबने अपने अपने ग्रुप बना रखे हैं. सब अपने ग्रुप पर ज्ञान आधारित समाज बनाने की दिशा में बढ़ चले हैं. चुटकुलों और अफवाहों को प्रसारित करने में इन सबका योगदान इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा जायेगा. अब प्रशासन और प्रबंधन में असफल होने पर काम में टेक्नोलॉजी को शामिल करने के नाम पर व्हाट्स एप ग्रुप बनाने का रिवाज है. जल्दी ही मेनेजमेंट की कक्षाओं में व्हाट्स एप ग्रुप प्रबंधन भी सिखाया जायेगा. दुनिया के टॉप मेनेजमेंट गुरु सी.के. प्रहलाद सर ये जानकर सर पीट लेंगे कि सरकार अब व्हाट्स एप ग्रुप पर चल रही है. लेकिन सरकार खुश है कि उसका काम अब तेजी से होता दिख  रहा है, जल्दी ही व्हाट्स एप ज्ञान को ही असली ज्ञान का दर्जा देने के लिए कानून लाया जायेगा. सब खुश...चलो बजाओ तालियाँ