Sunday, June 18, 2017

पाकिस्तान से हार और म्यूट टीवी

(संजीव परसाई) देश की चिंता करना इतना आसान नहीं है. हमेशा एक आशंका बनी रहती है कहीं कोई हमपर कब्ज़ा न कर ले कोई देश पर हमला न कर दे. हफ्ते भर से ये चिंता और बढ़ी हुई थी. भारत चैम्पियंस ट्राफ़ी के फाइनल में क्या पहुंचा ब्लड प्रेशर बढ़ने लगा. इलेक्ट्रानिक मीडिया के बाहुबलियों, देवसेनाओं और सोशल मीडिया के कटप्पाओं ने हलकान कर रखा था. फाइनली हम हार गए और एक पूरी रात और अगला दिन शान्ति से गुजर गया, तब जाकर संतोष हुआ की कहीं कुछ नहीं होने वाला, हम सुरक्षित है. वरना हालात तो यहाँ तक हो चले थे कि हम हारे तो नवाज शरीफ मोदी जी से कहेगा कि बंगला खाली करो, हम रहेंगे अब दिल्ली में या जीत गए तो नवाज शरीफ का बेघर होना तो तय था. लेकिन कुछ नहीं हुआ अब जाकर चैन की सांस ली.
मैं कल डरा हुआ सा मैच देखने की तैयारी में था. टॉस हुआ ही था, कि मोहल्ले का रामस्वरूप आ धमका कहने लगा भैया मैच नहीं देख रहे हो क्या...मैंने इशारे से उसे टीवी की ओर दिखाया जिसपर मैच लगाया था. वो कहने लगा - आवाज खोलो न भैया – मैंने फुसफुसा कर कहा म्यूट करके ही देखेंगे भैया. भड़क गया,  अरे भैया, हम आजाद देश में रह रहे हैं और आप इतने डरे हुए हो कि मैच भी म्यूट करके देखोगे तो हम कैसे जीतेंगे. मैंने कहा ऐसी बात नहीं है रामस्वरुप, बात भारत और पाकिस्तान के संबंधों की है. अगर सम्बन्ध सुलझे होते तो हम इसे मैच मानते. लेकिन दुनिया जानती है कि यह सिर्फ मैच नहीं है ये महायुद्ध है. महायुद्ध में जोर से बोलना और अपनी रणनीति का खुलासा करने या होने देने से बचना चाहिए. क्रिकेट हमारे यहाँ धर्म कहा जाता है, और धर्म के लिए लड़ना धर्मयुद्ध ही होगा. ये वो धर्मयुद्ध है जिसमें लड़ाने वाले और लड़ने वाले मोटी रकम लेकर युद्ध तय करते हैं. इसे और आसान बनाने के लिए मीडिया भगवानों की रचना करता है. मजे के बात यह है कि भगवान् भी पैसे लिए बिना न तो मैदान में कूदते हैं न ही आशीर्वाद देते हैं. भगवान पर बात जाते देखकर रामस्वरूप बिफर गया. कहने लगा आप जैसे लोगों ने ही देश का विकास नहीं होने दिया. जहाँ देश के सम्मान की बात होती है आप जैसे लोग न जाने कहाँ से आकर मजा खराब करने में लग जाते हैं. बात बिफरने की हो चली थी सो मैंने उसके सामने पॉपकार्न का कटोरा सरका दिया और कहा लो चाय भी आ रही है. उसने मुट्ठी भर पॉपकार्न उठाते हुए टीवी की आवाज खोल दी. पाकिस्तानी योद्धाओं को माँ-बहन की गालियों और भारतीय योद्धाओं को कोसते हुए रामस्वरूप ने पूरे घर को युद्ध का मैदान बना दिया. हमें अपने घर में टैंकों, मोर्टार और फाइटर प्लेन की गर्जना सुनाई देने लगी. हम अपना मुंह बंद किए सहमति देते रहे. उधर विरोधी टीम के रन बनते जा रहे थे, यहाँ हम रामस्वरूप के सामने से कांच और स्टील के बर्तन उठाते जा रहे थे, चालीस ओवरों तक आते आते उसके सामने सब प्लास्टिक-प्लास्टिक हो गया था. पचास ओवर होते ही रामस्वरूप का दिल बैठ गया, कहने लगा भैया इस देश का कुछ नहीं हो सकता, हमारे देश पर कुछ लोगों की बुरी नजरें लगी हुई हैं. ऐसा करते हुए उसने मुझे घूर कर देखा. उसकी प्रतिक्रिया से पाकिस्तान के रनों के लिए मैं खुद को जिम्मेदार मानने लगा. फिर सोचा कि अब इसके जाने का टाइम आ गया है सो चुप रहना ही बेहतर है.
टीवी पर विज्ञापन शुरू हुए तो कहने लगा, भैया ये विज्ञापन क्यों दिखाते हैं, यहाँ रोने को जी कर रहा है और ये लड़की हंस रही है. हमने कहा - हंसने के उस लड़की को लाखों मिले हैं, हंसती लडकी दिखाने के चैनल को करोड़ों मिले हैं. वो फिर बैठ गया बोला – भैया अभी कुछ नहीं बिगड़ा है हमारे हिन्दुस्तानी शेरों के आगे ये स्कोर कुछ भी नहीं है कहकर वो फिर जम गया. अब हमें चिंता अपने घर से ज्यादा रामस्वरूप की थी, जिसका ब्लडप्रेशर हद से बाहर जा रहा था, लेकिन हमारी चिंता निर्मूल साबित हुई, उसे जल्दी ही समझ आ गया बोला भैया चलता हूँ अब, कुछ नहीं रखा इस सब में, काम धंधा देखूं, मैंने भी सेटमैक्स पर सुर्यवंशम लगा ली.
दूसरी पारी का मैच अभी तीस ओवर का ही हुआ होगा कि ज्ञानियों के खुले चक्षु मेसेज के रूप में बरसने लगे...क्या लाये थे, क्या ले जाओगे, क्रिकेट में क्या धरा है, जिन्दगी देखो, खुश रहो, वो तो अपना बेटा है आदि आदि ..उधर इलेक्ट्रोनिक मीडिया भी देश में किसान आन्दोलन और जीएसटी पर अपनी दूकान खोल ली, अब लाइव स्कोर पट्टी पर चलने लगा था.
बहरहाल अब सब कुछ शांत है, मीडिया अब नए मुद्दे तलाश रहा है, सोशल मीडिया पर ज्ञान की बाढ़ आ गयी है, विज्ञापन एजेंसियां नोट गिन कर रहीं हैं, बीसीसीआई नए सीजन की तैयारी में है, खिलाडी लम्बी छुट्टी के लिए विदेश जा रहे हैं, बेरोजगार नौकरी तलाश रहा है, किसान पेड़ के नीचे बैठ आसमान की ओर देख रहा है, मजदुर अपने काम पर चला गया है, बाकी सब म्यूट हैं और आप ये व्यंग्य पढ़ रहे हैं....जय जय 

Wednesday, June 14, 2017

कुत्ता, गड्ढा और पुत्तन - व्यंग्य कथा (अंतिम किश्त)

(संजीव परसाई)

अब तक आपने  पढ़ा ....

पुत्तन कुत्ते को सरे राह पीट रहा था, जैसा कि कस्बों में होता है भीड़ जमा हो गयी, लोगों के पूछने पर भी पुत्तन ये बताने को तैयार नहीं था कि वो आखिर कुत्ते को क्यों पीट रहा है... सुविधा के लिए  प्रथम भाग का लिंक  - http://pungibaaj.blogspot.in/2017/06/blog-post.html 

आगे पढ़िए व्यंग्य कथा कुत्ता, गड्ढा और पुत्तन का दूसरा और अंतिम भाग.....


....भीड़ और मीडिया के जमावड़े को पुत्तन अपनी जीत के रूप में देखकर मन ही मन खुश हो रहा था। मीडिया लाइव फुटेज दिखाने में लगा था लेकिन बाइट नहीं मिलने से चैनलों  का रिपोर्टरों पर दबाव बढ़ता जा रहा था और पुत्तन भाव खा रहा था। एक पत्रकार ने हिम्मत करके कहा कि - आप इस बेजुबान प्राणी पर इतना जुल्म क्यों कर रहे हो। आपको यह अधिकार किसने दिया, पुत्तन तैश में आकर उस पत्रकार की ओर बढा, लेकिन पत्रकार किसी बड़े खतरे को भांपकर चार कदम पीछे हट गया। सो पुत्तन भी मूल लक्ष्य से भटक गये.. कुत्ता हाथ से सटककर भाग-खड़ा हुआ। भीड़ तो जैसे इंतजार ही कर रही थी, कुछ छिछोरे ठठाकर हंस पडे़, यह तो सरासर दबंगई पर चोट थी। पत्रकार को इशारे और आंखों से समझाया कि तुझे देख लूँगा। भीड़ को भी आंखों ही आँखों से देखकर कहा कि ^$$^^&&@@% और दौड़ लगा दी कुत्ते के पीछे। लेकिन अब तक तो देर हो चुकी थी कुत्ता अपने लिये एक सुरक्षित कोने की तलाश कर चुका था।
मीडिया ने पुत्तन के फुटेज दिखा-दिखा कर माहौल में आग लगा दी। सब पुत्तन के इस कृत्य को अमानवीय व अकुत्तनीय बताने में बढ़-चढ़ कर लग गये। राजनीतिक दलों ने कठोर शब्दों में इसकी निंदा की। उन्होंने इसके खिलाफ सरकार से कठोर से कठोर कार्यवाही और जानवरों के विभाग के मंत्री से इस्तीफे की मांग की। उधर मीडिया अभी भी खबर को अधूरी ही मानकर चल रहा था। पुत्तन तो खा खुजाकर लंबलेट हो गये लेकिन मीडिया लगा उन्हें रगड़ने। चैनल वाले अपने रिपोर्टरों को दिल्ली से गरियाने लगे कि उन्हें हर हाल में पुत्तन की बाइट चाहिए। बाइट मिले तो खबर आगे बढे़, दिनभर में वे कुत्ते से लेकर, हर खास-ओ-आम की बाइट चला चुके थे। लेकिन खबर को प्राइम-टाइम तक जिंदा रखने के लिये जरूरी था कि पुत्तन की बाइट हो। सहसा दो दो कौड़ी की प्रेस विज्ञप्ति बनाकर बाँटने वाले और एक सिंगल कॉलम खबर छपने पर हफ्ते भर अखबार कांख में दबाकर घूमने वाले पुत्तन मीडिया की आँख के तारे हो गये, सो लगे डील करने। अब तक वे समझ चुके थे कि मीडिया को उनकी जरूरत है। वे इस जरूरत को अपने लिये अवसर बनाने में अपने रणनीतिकारों से सलाह मांगने लगे। टीवी चैनलों के आउटपुट एडीटरों ने रिपोर्टरों पर दबाव बनाया। वे रिरियाने लगे कि भाई मान जाओ प्राइम-टाइम में हम राष्ट्रीय स्तर के प्रवक्ताओं के साथ बैठा रहे हैं। तुम्हारा कुछ लोकल जुगाड़ भी बनवा देंगे । पुत्तन के सलाहकारों ने सलाह दी कि अगर इस घटना की निंदा मेनका गांधी करें, तो छा जाओगे गुरु। सो प्रस्ताव दिया गया कि पहले इस घटना की निंदा मेनका गांधी से करवाओ। पत्रकार समझ गया कि उसका सामना एक कमीने से हो गया है। ये बात चैनल को समझाना तो मुश्किल था। सो उसने मेनका गांधी के दक्षिणपंथी रूझान की ओर भी ध्यान दिलाया। लेकिन पुत्तन टस से मस न हुए, सो भागम-भाग मची । किच-किच चैनल ने आखिर यह कारनामा कर दिया। मेनका जी ने इस घटना की कठोर शब्दों में निंदा की और कार्यवाही की मांग की।
उधर भीड़ में आए हर-एक का हाजमा खराब था। पुत्तन ने आखिर ऐसा क्यों किया शहर में चर्चा का विषय था। आखिर अपने घर पर ओवी बुलाकर किच-किच न्यूज चैनल पर पुत्तन आये और अपने कृत्य की सफाई पेश की। उन्होंने बताया कि किस तरह वे आज सुबह सफेद झक्क कुर्ता पाजामा पहनकर घर से निकले थे और किस तरह से इस कुत्ते ने उनके बगल वाले गडढे़ में छलांग लगा दी जब वे ठीक गडढे़ के पास थे। उनकी सफाई को चैनल ने 14 ब्रेक लेकर दिखाया और आगे दूसरा भाग भी अगले दिन चलाया।
चार सदस्यीय पैनल ने इस घटना की पुत्तन की मुँह पर ही निंदा की। एक पैनलिस्ट ने प्रति प्रश्न पूछा कि - उस गडढे़ को बनाने में कुत्ते की कोई भूमिका नहीं थी, इसिलिए कुत्ते का इसमें कोई दोष ही नहीं है। दरअसल दोष तो नगर निगम का है, जहाँ सत्ता पक्ष पसरा हुआ है।
दूसरे ने पुत्तन के बहाने सरकार को घेरने का सुझाव दिया।
तीसरे ने इस मुददे पर सरकार की तीखी आलोचना करते हुए प्रधानमंत्री से स्पष्टीकरण की माँग की।
चौथा पैनलिस्ट पढ़ा-लिखा था सो उसने कुत्तों के साथ समाज का व्यवहार और गड्ढों की सामाजिक उपयोगिता पर विस्तृत चर्चा की।
इस  बीच टी.वी. पर टिकर चलने लगा कि पुत्तन के विरोधी दल से संबंध हैं। इसी बीच पत्रकार उस गडढे के जन्म की कहानी भी खोज लाए। उन्होंने गुप्ता जी की बाइट अरेंज की जिनकी लड़की की शादी में उस गडढे़ को भट्टी के रूप में बनाया गया था। गुप्ताजी ने भी उस भट्टी पर बनी गुलाब जामुन व नुक्ती के कसीदे पढे़। सोशल मीडिया पर पक्ष और विपक्ष की मिलीजुली प्रतिक्रियाएं ट्रेल करने लगीं।
मात्र दो दिन में पुत्तन राष्ट्रीय व्यक्तित्व है। जिसे पार्टियां चुनावों अपना प्रत्याशी बनाना चाहेंगी। उसने तय कर लिया कि वह राष्ट्रीय गडढ़ा पार्टी की स्थायी सदस्यता लेगा और गडढ़ों की भलाई के लिए काम करेगा।

Saturday, June 3, 2017

कुत्ते की पिटाई और चैनल चिंता

(संजीव परसाई)  पुत्तन सरे राह धोबी के कुत्ते को रपारप डंडा कुदाये जा रहा था। एक-एक करके कोई बीस-पचीस दर्शक जुड़ गए। यूँ तो कस्बे की फितरत ही है कि जोंर से छींकने पर भी जय हो का हाँका लगाने वाले दस से कम  नहीं होते। ये तो फिर पुत्तन के हाथों कुत्ते की धुलाई (धुलाई को पिटाई का पर्यायवाची के रूप में पढ़ा जाये) का प्रसंग था। सो पुत्तन अपनी परंपरागत इस्टाइल में कुत्ते पर हाथों से और डेढ़ गज लंबी जुबान से वार किये जा रहा था। कुत्ता भी अपनी रेडियोजेनिक आवाज से पुत्तन का क्रोध कम करने की कोशिश में कांय-कांय का स्वर सृजित कर रहा था।


दूसरी ओर भीड़ इस इंतजार में बेजार हो रही थी कि पुत्तन का मुंह और हाथ रुके तो पूछे कि दादा ये क्या कर रहे हो, आखिर इस बेजुबान जानवर ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, क्या काट-वाट लिया, क्या तुम्हारे दरवाजे पर हग-वग दिया, क्या मुहल्ले में तुम्हारे रसूख को चुनौती दे डाली, क्या तुम्हारी धोती खींच दी या जूता ले भागा, भीड़ में मौजूद हर एक दर्शक के मन में ऐसे सवाल बेकरारी मचा रहे थे। बात पुत्तन की थी सो हर व्यक्ति इस बात की तस्दीक करना चाहता था कि कोई गंभीर बात तो नहीं है। पुत्तन की हैसियत का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उसने जीवन भर ढाई सौ ग्राम के पैसे लेकर दो सौ ग्राम ही जलेबी तौली लेकिन किसी में उफ करने तक का साहस न हुआ। अचानक पुत्तन की रौबीली आवाज गूंजी - अब बोल हरामखोर ^&^&%^$$^^&&@@%#@...(यहां अपर केस प्रतीकों का अर्थ आप आगे पढ़ने के बाद समझेंगे, क्योंकि लेखक की अपनी साहित्यिक सीमा है, जिससे बाहर जाने की इजाजत अभी तक प्राप्त नहीं हुई है सो डॉटस का अर्थ स्वयं समझें )...अब बोल, ऐसा करेगा... लोग सांसे रोके अब तक खडे़ थे क्योंकि एक गंभीर रहस्योदघाटन श्री पुत्तन करने वाले थे। लेकिन पुत्तन, कुत्ते के खानदान और उससे जुड़े बिदुओं की व्याख्या करने में अधिक इच्छुक लग रहा था । सो अपनी आवाज में प्रभावी उतार-चढ़ाव लाते हुए अपने कार्य को जारी रखे रहा ।....लेकिन अब तो लोगों का सब्र भी टूट रहा था। भीड़ में पीछे की ओर खड़े हुये इक्का-दुक्का तो दुखी होकर ही चले गये। बाकियों ने भी उन्हें भरे दिल से रवाना किया और आंखों ही आंखों में यह वादा भी किया कि तुम्हारी कुर्बानी बेकार नहीं जायेगी, जब भी पता चलेगा तुम्हें जरूर जानकारी दी जायेगी।

दरअसल भीड़ का एक सिद्धांत होता है, भीड़ अपना मजमा वहीं लगाती है जहां विरोधी सुरों के साथ मनोरंजक सामग्री भी परोसी जा रही हो। यह हुजूम अपनी प्रतिक्रिया तब तक व्यक्त नहीं करता, जब तक कि वह पूरी तरह से आश्वस्त न हो जाये कि कुछ भी बकने या करने पर उनके साथ इस कुत्ते जैसा वर्ताव नहीं होगा। वैसे मजाक ही मजाक में एक अनूठे सिद्धांत की रचना हो गयी है, अगर आप पाठकों ने इस सिद्धांत की सही जगह चर्चा की तो मैं भी समाजशास्त्री का दर्जा पाकर सम्मानयोग्य हो जाउँगा। कई बार यह भीड़ कम या बिल्कुल भी जानकारी नहीं होने पर भी पूरी गंभीरता का प्रदर्शन करती है। भीड़ के पास खोने को समय और जागरूक भारतीयों की सूची में अपना नाम लिखाने के लिये उत्सुकता के अलावा कुछ नहीं होता है। जिसे जागरूकता का नाम देकर महिमामंडित किया जाता है। भीड़ अपने लिए भगवान् भी चुनकर नियुक्त करती है, समय आने पर उन्हें ही गालियों से लथपथ कर देती है।

बौद्धिकता में यही एक खामी है कि वह आपको मूल मुद्दे से इस कदर भटका सकती है कि आप अपने घर लौटने का रास्ता भी भूल जायें। लेकिन मैं ऐसा नहीं हूं.... तो मुददा यह था कि - पुत्तन कुत्ते को क्यों मार रहा था, लेकिन लोग सोच रहे थे कि पुत्तन अपना काम पूरा कर चुका होगा सो अब उवाचेगा। पुत्तन तो इस मेहनत के दौरान आये पसीने को पौंछने और लगातार बलबलाने से बाहर निकल आयी नाक को छिनकने के लिये रूका था। सो गमछे को निष्णात पवित्र करके पुनः गंभीरता पूर्वक अपने काम में लग गया। अचानक एक बिजली सी कोंधी तो एक पवित्र आत्मा सामने आई। उसने बिना किसी लाग-लपेट के पुत्तन से पूछा - का हुआ रे, इतना काहे बिफर रहा है, अब सभी की नजर पुत्तन पर टिक गयीं कि अब तो पुत्तन बोलेगा ही बोलेगा। पुत्तन ने एक गहरी सांस ली और माथे पर हाथ फिराया, उस आत्मा की तरफ देखा और एक हाथ के इशारे से उस महान आत्मा को जाने को कहा। (इशारे से स्पष्ट था वह कह रहा था - तू निकल बे... इसे भीड़ और पवित्र आत्मा समझ गयी थी)

अब तक तो इस घटना की जानकारी देश के हर टीवी चैनल को लग गयी थी। पुत्तन की खबरें सोशल मीडिया पर धड़ाधड़ ट्रेंड कर रही थी। कुछ अतिउत्साही युवाओं ने इस घटना को व्हाट्स एप चला दिया..अब तक इस महान घटना की सूचना देश के खास-ओ-आम तक पहुँच रही थी.
....भीड़ और मीडिया के जमावड़े को पुत्तन अपनी जीत के रूप में देखकर मन ही मन खुश हो रहा था। मीडिया लाइव फुटेज दिखाने में लगा था लेकिन बाइट नहीं मिलने से चैनलों  का रिपोर्टरों पर दबाव बढ़ता जा रहा था और पुत्तन भाव खा रहा था। एक पत्रकार ने हिम्मत करके कहा कि - आप इस बेजुबान प्राणी पर इतना जुल्म क्यों कर रहे हो। आपको यह अधिकार किसने दिया, पुत्तन तैश में आकर उस पत्रकार की ओर बढा, लेकिन पत्रकार किसी बड़े खतरे को भांपकर चार कदम पीछे हट गया। सो पुत्तन भी मूल लक्ष्य से भटक गये.. कुत्ता हाथ से सटककर भाग-खड़ा हुआ। भीड़ तो जैसे इंतजार ही कर रही थी, कुछ छिछोरे ठठाकर हंस पडे़, यह तो सरासर दबंगई पर चोट थी। पत्रकार को इशारे और आंखों से समझाया कि तुझे देख लूँगा। भीड़ को भी आंखों ही आँखों से देखकर कहा कि ^$$^^&&@@% और दौड़ लगा दी कुत्ते के पीछे। लेकिन अब तक तो देर हो चुकी थी कुत्ता अपने लिये एक सुरक्षित कोने की तलाश कर चुका था।
मीडिया ने पुत्तन के फुटेज दिखा-दिखा कर माहौल में आग लगा दी। सब पुत्तन के इस कृत्य को अमानवीय व अकुत्तनीय बताने में बढ़-चढ़ कर लग गये। राजनीतिक दलों ने कठोर शब्दों में इसकी निंदा की। उन्होंने इसके खिलाफ सरकार से कठोर से कठोर कार्यवाही और जानवरों के विभाग के मंत्री से इस्तीफे की मांग की। उधर मीडिया अभी भी खबर को अधूरी ही मानकर चल रहा था। पुत्तन तो खा खुजाकर लंबलेट हो गये लेकिन मीडिया लगा उन्हें रगड़ने। चैनल वाले अपने रिपोर्टरों को दिल्ली से गरियाने लगे कि उन्हें हर हाल में पुत्तन की बाइट चाहिए। बाइट मिले तो खबर आगे बढे़, दिनभर में वे कुत्ते से लेकर, हर खास-ओ-आम की बाइट चला चुके थे। लेकिन खबर को प्राइम-टाइम तक जिंदा रखने के लिये जरूरी था कि पुत्तन की बाइट हो। सहसा दो दो कौड़ी की प्रेस विज्ञप्ति बनाकर बाँटने वाले और एक सिंगल कॉलम खबर छपने पर हफ्ते भर अखबार कांख में दबाकर घूमने वाले पुत्तन मीडिया की आँख के तारे हो गये, सो लगे डील करने। अब तक वे समझ चुके थे कि मीडिया को उनकी जरूरत है। वे इस जरूरत को अपने लिये अवसर बनाने में अपने रणनीतिकारों से सलाह मांगने लगे। टीवी चैनलों के आउटपुट एडीटरों ने रिपोर्टरों पर दबाव बनाया। वे रिरियाने लगे कि भाई मान जाओ प्राइम-टाइम में हम राष्ट्रीय स्तर के प्रवक्ताओं के साथ बैठा रहे हैं। तुम्हारा कुछ लोकल जुगाड़ भी बनवा देंगे । पुत्तन के सलाहकारों ने सलाह दी कि अगर इस घटना की निंदा मेनका गांधी करें, तो छा जाओगे गुरु। सो प्रस्ताव दिया गया कि पहले इस घटना की निंदा मेनका गांधी से करवाओ। पत्रकार समझ गया कि उसका सामना एक कमीने से हो गया है। ये बात चैनल को समझाना तो मुश्किल था। सो उसने मेनका गांधी के दक्षिणपंथी रूझान की ओर भी ध्यान दिलाया। लेकिन पुत्तन टस से मस न हुए, सो भागम-भाग मची । किच-किच चैनल ने आखिर यह कारनामा कर दिया। मेनका जी ने इस घटना की कठोर शब्दों में निंदा की और कार्यवाही की मांग की।
उधर भीड़ में आए हर-एक का हाजमा खराब था। पुत्तन ने आखिर ऐसा क्यों किया शहर में चर्चा का विषय था। आखिर अपने घर पर ओवी बुलाकर किच-किच न्यूज चैनल पर पुत्तन आये और अपने कृत्य की सफाई पेश की। उन्होंने बताया कि किस तरह वे आज सुबह सफेद झक्क कुर्ता पाजामा पहनकर घर से निकले थे और किस तरह से इस कुत्ते ने उनके बगल वाले गडढे़ में छलांग लगा दी जब वे ठीक गडढे़ के पास थे। उनकी सफाई को चैनल ने 14 ब्रेक लेकर दिखाया और आगे दूसरा भाग भी अगले दिन चलाया।
चार सदस्यीय पैनल ने इस घटना की पुत्तन की मुँह पर ही निंदा की। एक पैनलिस्ट ने प्रति प्रश्न पूछा कि - उस गडढे़ को बनाने में कुत्ते की कोई भूमिका नहीं थी, इसिलिए कुत्ते का इसमें कोई दोष ही नहीं है। दरअसल दोष तो नगर निगम का है, जहाँ सत्ता पक्ष पसरा हुआ है।
दूसरे ने पुत्तन के बहाने सरकार को घेरने का सुझाव दिया। तीसरे ने इस मुददे पर सरकार की तीखी आलोचना करते हुए प्रधानमंत्री से स्पष्टीकरण की माँग की।
चौथा पैनलिस्ट पढ़ा-लिखा था सो उसने कुत्तों के साथ समाज का व्यवहार और गड्ढों की सामाजिक उपयोगिता पर विस्तृत चर्चा की।
इस  बीच टी.वी. पर टिकर चलने लगा कि पुत्तन के विरोधी दल से संबंध हैं। इसी बीच पत्रकार उस गडढे के जन्म की कहानी भी खोज लाए। उन्होंने गुप्ता जी की बाइट अरेंज की जिनकी लड़की की शादी में उस गडढे़ को भट्टी के रूप में बनाया गया था। गुप्ताजी ने भी उस भट्टी पर बनी गुलाब जामुन व नुक्ती के कसीदे पढे़। सोशल मीडिया पर पक्ष और विपक्ष की मिलीजुली प्रतिक्रियाएं ट्रेल करने लगीं।

मात्र दो दिन में पुत्तन राष्ट्रीय व्यक्तित्व है। जिसे पार्टियां चुनावों अपना प्रत्याशी बनाना चाहेंगी। उसने तय कर लिया कि वह राष्ट्रीय गडढ़ा पार्टी की स्थायी सदस्यता लेगा और गडढ़ों की भलाई के लिए काम करेगा।

Friday, April 14, 2017

हम बड़ी ई वाले लोग....

(संजीव परसाई)  राजनीति और व्यंग्य हमेशा पूरक रही है, लेकिन कुछ तथाकथित आधुनिक पुरोधाओं ने व्यंग्य को चुटकुला और राजनीति को जुगाड़ नीति के रूप में स्थापित कर दिया। जबकि दोनों ही अपने विशिष्ट स्वरुप में प्रासंगिक हैं। असल में इन दोनों को ही विशिष्ट होने की बीमारी है। राजनीति का ग्रसित व्यक्ति हैसियतदार दिखने और दिखाने के लिए लालायित रहता है। वो अलग बात है की आजकल अपनी हैसियत को कम दिखाने का रिवाज चला है। लाल बत्ती मिल जाती है लेकिन फिर भी बिना बत्ती की गाड़ी में घूमते हैं। व्यंग्य लेखन का शिकार व्यक्ति चाहता है कि लोग उसे बुद्धिजीवी मानें , सो वो बुद्धिजीवी की तरह (अर्धसेल्फी मुख मुद्रा) मुँह बनाए घूमता है, बोलता कम है, हुंकारा ज्यादा भरता है।
हम भी अपने आप को हमेशा से ही विशिष्ट मानते आए हैं, ज्यों ज्यों उम्र पकती जा रही है, हम विशिष्ट से अति विशिष्ट होते जा रहे हैं। ये बीमारी कैसे और कहाँ लगी इसका अवश्य ही कोई गहरा इतिहास रहा होगा। इतिहास इसीलिए कि लोग कहते हैं की ये बीमारी हमारे पूर्वजों को भी थी। हम अपने नाम परसाई, काम पंडिताई के प्रति सदियों से ही सतर्क रहे। यह सब कमाल हमारी बड़ी ई का है। देश गवाह है कि बड़ी ई धारक लोगों ने खासा नाम कमाया है फिर चाहे वो राजनीति हो या व्यंग्य। लोग कहते हैं कि मोदी जी मेहनत करके देश के प्रधानमंत्री बने हैं , लेकिन हमारा मानना है कि वो आज जो भी हैं अपनी बड़ी ई की वजह से हैं। यही बात इंदिरा जी , शास्त्री जी चौधरी जी, वाजपेयी जी आदि करीब 10 प्रधानमंत्री पर लागू होती है।  व्यंग्य में भी अगर जोशी और परसाई के पास बड़ी ई नहीं होती तो वे भी पांडुलिपियों में ही धरे रह जाते।

अभी पिछले शादी के सीजन में एक शादी का कार्ड आया उसने हमारे नाम में बड़ी की जगह छोटी इ की मात्र लगा दी थी, हमने खानदान सहित उस शादी का बहिष्कार किया। लोग कहने लगे अरे लिखने में गलती हो गयी होगी गुस्सा थूक दो। अब ये कोई छोटी गलती तो थी नहीं, आखिर हम बड़ी ई वाले लोग हैं। जब मिले तो मनुहार करने लगे। हमने कहा – अगर हम तुम्हारे में से बड़ा आ निकाल फेंकें तो तुम्हें कैसा लगेगा, वर्मा जी झेंप कर निकल गए।  हम अपनी बड़ी ई को बहुत संभाल कर रखते हैं और उसे समय आने पर ही निकालते हैं। पहले हम नाक कटाई और जग हंसाई से डरते थे लेकिन जबसे नकटा होना गौरव का और जग हंसाई प्रसिद्धि का विषय हुआ है, हमने तय कर लिया की हमारा फोकस बड़ी ई पर ही रहेगा।
आधुनिक दौर में लोग ताना देते - कब तक पंडिताई करके अपने रोजी रोटी चलाओगे। कुछ काम धाम क्यों नहीं कर लेते?? और हम मुंह ठेल देते कि हर कुछ कर लेंगे क्या भाई।।।कुछ लेवल का भी तो होना चाहिए।।।
वे ज्ञान झाड़ते अरे बेटा काम कोई छोटा बड़ा नहीं होता। हम बहस पर उतर आते और इस धारणा को सिरे से नकार देते। मोहल्ले के एक काका कहने लगे बेटा ज़माने के हाल समझो और कुछ काम शुरू करो। हमने कहा जरुर करेंगे। उन्होंने तत्काल अपने लड़के की कम्पनी में बाबू की नौकरी हमारे आगे धर दी। हम उनकी चाल समझ गए। वे नौकरी के नाम पर नौकर बनाकर हमारी बड़ी ई को काटना चाह रहे थे। हमने उनको टाइट कर दिया तो बुरा मान गए कहने लगे लड़का मुंहजोर है। हमने कहा काका मुंहजोर नहीं बदतमीज हैं, क्योंकि उसमें भी बड़ी ई है। अब वो दिन नहीं रहे, न ही हम वैसे रहे काका के लड़के की कम्पनी बंद हो गयी वे अब हमसे मदद मांगते हैं सो हम उनको कह देते हैं की कोई काम करने दो काका, काम कोई छोटा बड़ा थोड़ी होता है। और तुम्हारे साथ तो बड़ी ई वाली समस्या नहीं है। काका डबल बुरा मान गए। वे मिश्रा थे किसी के बहकावे में आकर अपना बाद आ गवां बैठे, अब छोटे अ से ही काम चलाते हैं, सो मिश्रा की बजाए मिश्र कहलाते हैं। हम तो अपनी कार के पीछे भी बड़ी ई छपवा लेते हैं ताकि सनद रहे।

अगर रिश्वत लेते पकड़ा जाएं, घोटाला कर मारें, बे टिकट पकड़ा जाएं, या चुनाव में जमानत जब्त करा लें तो बेखटके बड़ी ई को अपने साथ चिपका कर रखते हैं, ये बुरे समय में होंसला देती है। कोई ताना मारे तो साफ कह देते हैं कि हमसे पंगा न लेना हमारे वाले हर दल में ऊपर तक बैठे हुए हैं, भाजपाई, कांग्रेसी, माकपाई, सपाई, बसपाई, आपी आदि... । आजकल वैसे भी "ई" का ही जमाना है
बड़ी ई धारक लोग कम बचे तो दूसरे तरह से ई होने लगे हैं हमारी बिरादरी के बड़ी ई वाले प्रधानमंत्री बन गए हैं दूसरे भी फिराक में हैं तीसरे लड़-लड़ के हलाकान मचाये हुए हैं। बचे हम सो हम अभी जुगाड़ में हैं, लेकिन कहे देते हैं तब तक अपनी बड़ी ई को आंच भी न आने देंगे।

Thursday, March 16, 2017

घुइयाँ छीलने का काम...

(संजीव परसाई) हमारा लोकतंत्र कितना समृद्ध है यह इस बात से पता चलता है की हम हर नेता को कम से कम 5 साल का समय देते हैं। सत्ता की मौज लूटने वाले चुनाव हारने के बाद स्वयं को लोकतंत्र की रक्षा में खपाने के बजाए घर बैठकर घुइयाँ छीलना पसंद करते हैं। हालाँकि लोकतंत्र एक सक्षम विपक्ष की अपेक्षा से इनके सिर्फ एक बार जीतने पर आजीवन  उनका बोझा ढोने की गारंटी देता है, पर उन्हें सिर्फ सत्ता का सुर ही सुहाता है। जो विचारधारा सत्ता काल में पींगें भर रही होती है वह चुनाव हारने के बाद बेसहारा हो जाती है.
चुनाव में नकारे जाने पर अपनी विचारधारा को दोषी ठहराकर घुइयाँ छीलने का बहाना बनाते हैं।

एक - वो चुनाव हारता है तो वो अपने घुइयाँ मंदिरों के आगे या अपनी गद्दी पर बैठकर छीलता है. मातृ परिवार सत्ताकाल में उसे अड़चन महसूस होता है, सत्ता न होने पर वह उसके नजदीक दिखाई देने की कोशिश करता है। इस दौरान अपेक्षाकृत नरम स्वर व सौहाद्रपूर्ण रवैये से पेश आता है। भगवान् की बात करता है, गली नुक्कड़ चौराहों धार्मिक आयोजन कराता है. इस दौरान उसे हिन्दू धर्म कुछ अधिक मुश्किल में लगता है। वो अपनी घुइयाँ लेकर अन्य छोटे दलों के दरवाजे पर भी जाता है. अगर उन्होंने इजाजत दे दी तो वे कुछ समय वहीँ बैठकर छीलते हैं. घुइयाँ छीलते वह अपने बंधू बांधवों को भी साथ ले जाते हैं. सब मिलकर घुइयाँ छीलते समय जोर जोर से चिल्लाते हैं, जिससे भय का वातावरण निर्मित होता है।  इससे तंग आकर अन्य राजनीतिक दल इनको अपने साथ घुइयाँ छीलने की इजाजत नहीं देते हैं.

दो- इनका घुइयाँ छीलने का काम बड़ी तेजी से चल रहा है, अगर ऐसा ही रहा तो अगले कुछ सालों में उनके पास इसके अलावा और कोई काम नहीं बचेगा. ये इस दौर में भी लोगों से मालिक की तरह ही व्यवहार करते हैं. उनकी ठसक कभी कम नहीं होती यही इनका अंदाज है. ये अपने काम में इतने प्रवीण हैं की सत्ताकाल में भी घुइयाँ छील सकते हैं. सत्ता जाने के बाद भी इनके ठाठ कम नहीं होते है, वे हमेशा अपने एसी चेंबर में बैठकर ही घुइयाँ छीलना पसंद करते हैं. इस दौरान वे अपनी कथित प्रजा को पर्ची भेजने के आधा घंटा बाद ही छीलन कक्ष में प्रवेश देते हैं. इनका हमेशा प्रयास यह होता है कि अन्य छोटे दल अपनी घुइयाँ लेकर इनके पास बैठकर ही छीलें, इक्का दुक्का दल एसी और चायपानी के लालच में इनके पास गए भी लेकिन बाद में पता चला की उन्होंने इस बहाने अपनी घुइयाँ छीलने के काम में ही लगा दिया, उनकी घुइयाँ तो पड़ी रह गई, सो वे खीझकर भाग निकले. वे प्रायः अपने साथियों से भी खीझे खीझे रहते हैं, उन्हें हमेशा यह लगता रहता है कि सत्ता काल के मजे उनके साथियों ने अधिक लिए हैं, सो वे मौके बे मौके उनसे रूठकर घुइयाँ छीलने का बहाना ढूंढते हैं. 

तीन- सबसे अनूठी दुनिया इन्ही की है, उन्होंने यह मान लिया है की उन्हें अधिकांश समय घुइयाँ ही छीलना है, सो वे अपने खर्चे सीमित रखते है, उन्हें चिंता तो उस समय की होती है जब वे सत्ता में होते हैं. इन्होने घुइयाँ छीलने के लिए मुफीद जगहों की स्थाई जुगाड़ कर रखी है . सामान्यतौर पर वे पार्टी दफ्तर  में ही इस काम को अंजाम देते है, या फिर देर सबेर वे शहरों के मजदूर संघों के दफ्तरों में, विश्वविद्यालयों के केन्टीन या कॉफ़ी हॉउस में घुइयाँ छीलते पाए जाते है. इनको काम में तल्लीनता  के लिए कॉफी के साथ तम्बाखू के धुंए की दरकार होती है, खाने की कोई खास चिंता नहीं. घुइयाँ छीलने के दौर में ये अपने सगे भाइयों की विचारधारा से सहमत हो जाते हैं, बाकी वे दुनिया में हर एक को दुश्मन मानने के लिए बाध्य हैं.

चार- ये सबसे उलट हैं, वे घुइयाँ छीलते जरुर हैं लेकिन किसी को महसूस नहीं होने देते, वे छिपकर घुइयाँ छिलते हैं. सत्ता से बाहर रहने का समय इनके लिए विपत्ति काल होता है,  इस दौरान उनको अपने समर्थकों को संभालना खासा मुश्किल होता है. अतः वे इस दौरान घुइयाँ छीलने के छोटे छोटे ठेके अपने समर्थकों को दे देते हैं, ताकि वे व्यस्त रहें और किसी तरह से विपदा काल कट जाए। इन दलों में आज भी सुप्रीमो परंपरा जारी है। इसके अनुसार सुप्रीमो खुद बीच में बैठकर अपने चारों ओर बचे-खुचे समर्थकों को बिठाकर उनसे घुइयाँ छिलवाता है और वे यहाँ वहाँ भागते हैं। हालाँकि राष्ट्रीय दल इनको घुइयाँ छीलने का काम स्थाई तौर पर आवंटित करना चाहते हैं।

लोकतंत्र में सत्ता के साथ विपक्ष को भी जिम्मेदार भूमिका दी गई है, लेकिन विपक्ष के पहले चार साल घुइयाँ छीलने में और बाकी का एक साल अगले चुनाव की तैयारी में निकल जाता है. इस दौरान उन्हें अपने धंधे ठेके भी सही करने होते हैं। विचारधाराओं के लिए घुइयाँ छीलना एक अनिवार्य परिघटना है, इससे उसे आत्मबल मिलता है. कभी कभी परिपक्वता के अभाव में भी विचारधाराएँ घुइयाँ छीलने को मजबूर होती है। बेंजामिन फ्रेंकलिन ने कहा था की घटिया सरकार और नदी दोनों में हल्की चीजें ऊपर होती हैं. राजनीतिज्ञ अपनी हार के दिनों को अवसर के रूप में लेकर अधिक से अधिक हल्का होने की कोशिश करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं की भार उन्हें और नीचे ही ले जायेगा. हर दल अपने इन दिनों की तैयारी हमेशा रखते हैं, जैसे हम साल भर का किराना बारिश के पहले भर लेते हैं, ठीक वैसे ही।

Monday, March 6, 2017

राजनीति में थूकने का महत्त्व..

(संजीव परसाई) नेता चुनाव के दौरानअपने ऊपर लगे आरोपों से व्यथित था। असल में वो आरोपों से ज्यादा इस बात से व्यथित था कि टेंडर का पेमेंट भी पूरा नहीं हुआ था और चुनाव की अधिसूचना लग गयी थी। मिला तो कुछ नहीं , हल्ला ज़माने भर का हो गया। वो दिनभर प्रचार करता, शाम को पार्टी कार्यालय आकर हल्का होता और बिफर बिफर के कुल्ला करता फिर घर जाता। चमचे निहाल होकर कहते- भैया का हिसाब बढ़िया है, पेट और मुँह हल्का करके ही घर जाते हैं। आज तो भैया ने सारे विपक्ष की लंगोट ही खेंच ली। भैया ने आज सबके मुंह पर चार लिवर का ताला टांग दिया।  ऐसा का कह दिया बे, सबने पूछा तो दूसरा बोला - भैया ने सारे विरोधियों की माँ-बहन को याद करते हुए कहा कि - तुम सब साला हमारी बढ़ती इमेज से बौखलाया हुआ है, हम तुम सब पर थूकते भी नहीं हैं। अबे देखा नहीं का बे, टीवी पर तीन बजे से पट्टा चल रहा है, आज तो थूकने के बयान से भैया छाए हुए हैं। टीवी की मैडम तो भैया का इतने बार नाम जप लिए हैं कि भौजी को जलन ही होने लगे।
दूसरी ओर विपक्षी कौन से कम थे, शाम होते होते उन्होंने ये कहकर सनसनी फैला दी कि - हम और जनता दोनों इनके ऊपर ही थूकेंगे। जब सोशल मीडिया नहीं था तब कस्बों की लड़कियां , छेड़ने वाले छिछोरों का विरोध थूककर करतीं थीं, अब तो सीधे पुलिस हेल्प लाइन को टैग कर देती हैं। सो हर हथकंडे अपना चुके नेता ने भी ठान ली कि विपक्षी पर थूकुंगा भी और मानूँगा नहीं, दूसरी ओर जनता नेताओं की हरकतें और ओछे बोल देख-सुनकर अपने मुँह में ढेर सारा थूक भरे घूम रही है। कहाँ थूके, बस जगह और मौके की तलाश में है। नेता बिरादरी यह जानकर सकते में थी, भैयाजी के सूत्रों ने उनतक भी यह खबर पहुंचा दी। उनका एक जड़खरीद समर्थक बाजार से बड़ी साइज़ का पीकदान ले आया। बोला कोई चिंता नहीं भैया जी, इसे साथ में लेकर चलेंगे। जिसको थूकना हो इसमें थूके। साइडवाले ने कहा भैया वैसे आजकल तो खुले में थूकना अच्छा नहीं मन जाता, देश को स्वच्छ जो बनाना है। भैया जी ने माथे पर बल लाकर मुस्कुराते हुए नगरनिगम को पीकदान खरीदकर पुरे शहर में रखने का फोन कर दिया। दो दिन में उनके भतीजे ने सप्लाई भी कर दिए।
चिंता अब भी बनी हुई थी, नेताजी ने ओएसडी से जानकारी ली कि आखिर पब्लिक को समस्या क्या है। वे बोले सर, 5 साल पहले के शिलान्यास यूँ ही पड़े हैं, मोहल्लों में सड़कें चार साल से बन रहीं है, लोगों का चलना दूभर है, आपके कार्यकर्ताओं ने बीच शहर में कब्ज़ा कर लोगों का जीवन दूभर कर रखा है, शहर में गंदगी का अंबार लगा हुआ है लोगों का सांस लेना दूभर है, आपकी पार्टी के उचक्कों की वजह से महिलाओं का घर से निकलना दूभर, तिसपर आपने थूककर विरोध जताने का आइडिया दे दिया.....
नेताजी चिल्ला पड़े..अरे बंद करो ये दूभर-दूभर। ओएसडी डर गया, सर आपने ही बोला था, सो मैं....
अरे, वो बात नहीं है तुम दूभर की जगह कोई दूसरा शब्द यूज नहीं कर सकते क्या, इस शब्द में साला थूक उड़ता है, जो हमारे ऊपर गिर रहा है। सॉरी सर कहकर ..वो निकल गया।
जड़खरीद समर्थक कहने लगा भैया, देखिए हम आपके सामने बोलते हैं, दूभर....दूभर एक बार फिर बोलते है दूभर। हमारे मुंह से तो थूक नहीं उड़ा। वो दूभर की जगह मुश्किल, परेशानी आदि भी कह सकता था, भैया मुझे तो लगता है ये भी मुँह में थूक भरे घूम रहे हैं। दोनों एक दूसरे की ओर देखते रहे...किसी नए आइडिया के बारे में सोचने लगे। उधर जनता थूकने के लिए बैचेन है।

Sunday, March 5, 2017

फूले पेट - फूले दिमाग

(संजीव परसाई) समाज विज्ञानी कहते रहे हैं कि अगर देश को आगे ले जाना है तो बच्चों के पोषण और शिक्षा पर पूरा ध्यान देना होगा।  गूढ़ार्थ यह है कि फूले पेट और फूले दिमागों से न देश बनता है न समाज। जिनको कहना था, वो तो कहकर चले गए, पर देश तो सरकार को चलाना है। आज देश में अगर कोई सबसे ज्यादा व्यस्त सरकारी महकमा है तो वे ये शिक्षा और पोषण ही हैं। इससे ये अंदाजा मत लगाना कि देश में शिक्षा और पोषण का स्तर सुधार पर है। शिक्षा के लिए जिम्मेदार शिक्षक और पोषण के लिए जिम्मेदार आंगनवाड़ी कार्यकर्ता सबसे अधिक व्यस्त हैं। मजे की बात तो ये है कि ये अपने मूल काम के अलावा सारे काम करते हैं।
दूसरे विभागों की योजनाओं का क्रियान्वयन करवाने, अजीबोगरीब सर्वे से लेकर जनधन खाते खुलवाने तक का काम आंगनवाड़ी कार्यकर्ता से करवाए जाने की परंपरा है। उसपर विभाग कुपोषण के लिए इनको ही डांटता है। राज्यों में कुपोषण की सांप सीढ़ी चल रही है, कभी कोई ऊपर तो कभी कोई नीचे। कुछ सरकारों ने अपने लिए कुपोषण के स्थाई प्रमाणपत्र बनवा के रखे हैं। नवजात बच्चों का मरना अब सरकार और समाज के लिए आम घटना हो गयी है। अगर हफ्ते भर कुपोषित बच्चों के मरने की खबर न आए तो महकमा और सरकार जश्न मनाने लगता है। बड़े बड़े ठेकेदार पोषण आहार की चिंता में घुले जा रहे हैं। चवन्नी भर पोषण से कुपोषण की जंग लड़ी जा रही है, दूसरी ओर एक वर्ग अतिपोषण का शिकार होकर चिंतित हैं।

सरकारी शिक्षकों को दूसरे ढेरों काम में लगाना सरकार के शौक में शुमार है। कहते हैं अच्छा छात्र वो है जो शिक्षक होकर सोचे और अच्छा शिक्षक वो है को जीवनभर छात्र बना रहे। यहाँ शिक्षक के पास पढ़ने-पढ़ाने के अलावा क्लर्की से लेकर घर घर घूमने के कई काम थोप दिए गए हैं। अब जो समय बचता है, उसमें वो बस गहरी सांस ही लेता है। शिक्षा का जितना कबाड़ा मैकाले ने नहीं किया होगा, उससे अधिक शिक्षा तंत्र को चलाने वालों ने कर दिया। अब हमारा लक्ष्य प्लास्टिक के नागरिक सृजित करना होना चाहिए। शिक्षकों ने इस देश में गुरुदेव से लेकर शिक्षा कर्मी तक का सफर तय किया है। आज वे आदरणीय गुरूजी से सुन बे मास्टर तक खींचकर पटक दिए गए हैं, अब आगे कुछ बचा नहीं है सो इससे नीचे जाने की संभावनाएं नगण्य हैं। अब सरकार स्कूलों में सड़क पर घूम रहे स्वयंभू ज्ञानियों को ठेल रही है। सरकार समझती है कि शिक्षक तो कोई भी हो सकता है। शिक्षकों की जरुरत ख़त्म हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। अगर ऐसा होता है तो सरकार कई झंझटों से मुक्त हो जायेगी। जब शिक्षा ही न होगी तो सिर्फ कर्मी से काम चल जायेगा। फिर ये नाम के शिक्षक, नेताओं अफसरों की गालियाँ भी ख़ुशी से सुन लेंगे। सरकार चाहे तो इस पद पर हम्मालों और तुलावटियों की नियुक्ति कर सकती है। आला अधिकारी गाहे-बेगाहे मान लेते हैं कि शिक्षक स्तरीय नहीं हैं, दरअसल शिक्षकों के गुरुत्व को जड़त्व में लाने वाले भी वे ही हैं। तभी वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाते हैं। सरकारी स्कूल तो गरीबों और भिखमंगों के लिए हैं मंत्रियों और आला अफसरों के बच्चे तो सुरम्य वादियों में बने अंग्रेजी स्पीकिंग स्कूलों में पढ़ते हैं। सही भी है देश के हर बच्चे को अफसर और नेता थोड़ी बनना है, कुछ प्रजा होने के लिए भी तो होना चाहिए।
अब आप पोषण और शिक्षा में गुणवत्ता की उम्मीद करते हैं। असल में ये दोनों प्रतियोगिता में हैं कि कौन अधिक फूले पेट तैयार करता है और कौन फुले हुए दिमाग। जो तंदरुस्त रहकर अच्छी शिक्षा लेंगे वो विकास की बुलेट ट्रेन में बैठेंगे, जिनसे न हो पाया उनके लिए बस और ट्रेन का सामान्य दर्जा तो है ही।