Friday, September 21, 2018

सरकारी जमीन का टुकड़ा

(संजीव परसाई) वो चौराहे से लगा हुआ यूं ही पड़ा था। एकदम उपेक्षित सा, उसे अपने जीवन से कोई अपेक्षा नहीं थी। एक बार वहां से गुजरा तो फफक पड़ा- कहने लगा भैया जिस दौर में जमीनों और कमीनों के भाव आसमान छू रहे जॉन, उस दौर में मेरी ऐसी दुर्दशा होगी सोचा न था।
दस एक साल पहले पी.डब्लू.डी. से दो लोग आए थे, एक बोर्ड ठोंक कर चले गए। तब से आज तक पलटकर नहीं देखा। अब तो वो बोर्ड भी सड़ गया, उसके एंगल से कुछ दिन मोहल्ले के आवारा बच्चों ने झूला झूला और कुछ दिन बाद पाउडर के शौकीनों ने उसे काटकर बेच दिया। अब तो मेरा नाम भी खत्म हो गया। पहले उस सरकारी बोर्ड के सहारे ही इतरा लेता था। अब वो नहीं रहा, लेकिन उसके ऊपर बचे नुकीले एंगल अपने हिंसक स्वभाव से आते जाते वाहनों को मिटाने की फिराक में रहते हैं। कहते हैं टायर फटने की आवाज में उनको मजा आता है। लोग उनसे कानून व्यवस्था की तरह बचकर निकलते हैं, लेकिन उपेक्षा का शिकार में हो रहा हूँ। मैं उसे समझाता 'आदमी हो या प्लॉट, अगर कमर्शियल वेल्यू है तो सब पूछते हैं, कभी न कभी तुम्हारा भी कोई तारणहार जरूर आएगा।'
बस यूं ही दिन महीने साल गुजरने लगे, मैं उसे यूं ही पड़े देखता रहा, उसके दुख और मेरी जिंदगी दोनों में नीरसता स्थाई निवास करने का प्रयास करती रही , और हम दोनों उससे बचने का नाटक करते रहे। इस उपक्रम में हम भूल जाते हैं कि विधाता सब के लिए कोई न कोई भूमिका लिख रहा होता है। उसके पीछे वाले हिस्से में नुकीले एंगल के पास एक दिन एक भिखारी सा दिखाई देने वाले परिवार ने अपना डेरा डाल लिया, वो सुबह निकलते और शाम को भिक्षाटन करके लौटते। कभी आसपास के पर्यटन स्थलों पर निकल जाते, कभी मंदिरों के सामने जाकर भीख मांगते। शहर के मिजाज के हिसाब से मस्जिदों और गिरजों के सामने भी भीख मांगते। कुल मिलाकर उनकी ऊपरवाले की कृपा से कट रही थी। उसका एक 14-15 साल का लड़का एक बार कहीं से एक पुराना सा स्टोव उठा लाया और वहीं चाय बेचने लगा। स्टोव की भरभराहट प्लॉट पर संगीत की तरह गूंजने लगी। पार्षद के दरवाजे पर पहुंच गया, सो बीपीएल कोटे के राशनकार्ड पा गया। अब तो शकर, मिट्टी का तेल अनाज सब साथ बहने लगा।
धीरे धीरे उसने वहाँ दूसरे आवारा लड़कों को सब्जी, पानीपुरी, पान बीड़ी सिगरेट के  ठेले लगवा दिए और उनसे कमीशन लेने लगा। अब चौराहे ने आकार ले लिया था, वो दिन में गुलजार होने लगा था। मैं देखता वो अब पहले से खुश था
 लेकिन एक दिन वहाँ किसी की बुरी नजर पड़ गई। नगरनिगम का अतिक्रमण विरोधी दस्ता किसी मुगल हमलावर की तरह आया और सबकुछ उजाड़कर चला गया। लड़के अपने टूटे फूटे सपनों पर बैठकर बीड़ी पीने लगे। दोपहर के बाद वहां अक्सर साठ पार के रंगीले सियार टहलने आते थे, वैसे तो वो रोज निकलते थे, लेकिन रुकते नहीं थे। क्योंकि उनके वहां रुकने की कोई वजह नहीं थी। लेकिन मलबे के ढेर पर बैठे लड़के उनको अवसर की तरह चमकदार लगे। उनके घाव कुरेदने के बाद कहने लगे चिंता मत करो इस जगह पर इस साल अपन गणेशजी बिठाते हैं, भगवान गणेश की कृपा से सब ठीक जो जाएगा। तुम लोग इन बांस बल्लियों से मंडप बना लो, मोहल्ले के बीस पच्चीस घरों से चंदा ले लो। ये लो सबसे पहले मेरे इक्कावन। लड़के देखते रहे, उनको समझ में नहीं आ रहा था। लड़कों ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा, और उससे चंदा झेल लिया। थोड़ी देर बाद पास की कलारी में जाकर उस पैसे से दारू पी ली और सबकुछ भूल गए।
लेकिन वो नहीं भुला था, वो सुबह फिर आ गया। आज घर से सब्बल फावड़ा लेकर आया था। उसने आते ही सबको काम पर लगा दिया। थोड़ी ही देर में मंडप ने आकार ले लिया, और शामतक छोटे से गणपति भी बिराज गए। स्थापना पूजा में पार्षद आया, अगले दिन एक प्रोजेक्ट स्वरूप में हटाई गई सारी गुमठियां लगने लगीं और उनकी संख्या दोगुनी होकर पूरे प्लाट पर फैल गयीं।
चंद दिनों में वहां सबकुछ गुलजार हो गया। पीछे के किसी निजी प्लॉट पर कब्जा करके सुबह देश और हिन्दू धर्म को दुश्मनों से बचाने पर चर्चा की क्लास लगने लगी। अब दुर्गा उत्सव, दशहरा, दीवाली, होली सब वहीं से संचालित होते हैं। चौराहे के नाम हिन्दू उत्सव चौराहा हो गया। वहाँ एक स्थायी मढिया है, उसके सामने गुमठियों की कतार है। रोज सुबह - शाम पूजा आरती होती है। साल भर भाँति भाँति के बहानों से चंदा इकट्ठा करने का उपक्रम चलता है। बड़े बड़े लोग आते-जाते हैं। अब वो बहुत खुश है, वो क्या अब तो सब खुश हैं। सारे लड़के चुनाव में भी काम करते हैं, और रैलियों के लिए भीड़ भी जुटाते हैं। अब चर्चा गणेश पूजा की सार्थकता पर है, जो कभी व्यर्थ नहीं जाती।

Saturday, September 8, 2018

साहित्य रत्न और मैं अधम

(संजीव परसाई) यार मेरी तड़प का कोई अंदाजा लगाओ, मैं मरा जा रहा हूँ,साहित्य के एक अदद पुरुस्कार के लिए। मैने पुरुस्कार सभा में देने के लिए एक संक्षिप्त सा बड़ा भाषण भी तैयार कर के पहले से ही रख लिया है। अब पुरुस्कार न जाने कब मिलेगा, कहीं मेरे भाषण को दीमक ही न चाट जाए सो आपके सामने ही पेल रहा हूँ -

सम्माननीय मुख्य अतिथि, चयनकर्ताओं और सभा में बैठे अपना समय जाया कर रहे दर्शकों । आज मेरे बचपन की कई आस एक झटके में पूरी हो गईं। मैं सोचता था कि ऊंचे मंच पर चढ़कर दुनिया कैसे दिखती होगी। मेरे एक दोस्त ने जिसे चौथी में डिस्टिंक्शन आई थी, तब वो स्टेज पर चढ़ा था, उसने बताया था कि मंच से सब कुछ काला काला नजर आता है। इंसान कम बालों की दुकान ज्यादा दिखाई देतीं हैं। दूसरे ओर फुरसतियों का हुजूम फुरसत में देखना हो तो ये सबसे सुनहरा मौका है। आज यहां खड़े होकर मुझे मेरा वो दोस्त याद आ रहा है, मुझे पक्का भरोसा है कि वो जरूर कहीं भाड़ झोंक रहा होगा। क्योंकि वो आजतक फेसबुक पर भी नहीं है, बताओ वो कितना पीछे हो गया होगा।
आठ-दस साल पहले में आयोजनकर्ता श्रीमान बंटवारे लाल जी के पास गया था, कि मैं लिखता हूँ मुझे भी व्यंग्य श्रेणी में नामांकित करो तो बंटवारे लाल कहने लगे, व्यंग्य तुम जो लिखते हो उसे व्यंग्य नहीं भड़ास कहते है। व्यंग्य तो मेरा भतीजा लिखता है। तुम चाहो तो तुम्हें जनसंपर्क श्रेणी का पुरुस्कार दे देते हैं, उस श्रेणी में कोई ढंग का चमचा मिल नहीं रहा है। तब मैंने उनके पैर छूते हुए कहा था कि तुम्हारा सत्यानाश हो। उसने सुन लिया और मुझे धमकी दी कि तुम्हारा छपना बंद करवा दूँगा। फिर में साहित्य अकादमी के मुखिया के पास भी गया, उनसे कहा अखबारों में विज्ञापनों के लिये मारे मारे फिरने वालों तक को आपने पुरुस्कार बांट दिए, वाकई लिखने वालों से क्या दुश्मनी है आपकी। कहने लगे आप आवेदन कर दो देखेंगे।  आज उन दोनों को कोढ़ हो गया है जिसे वे खाज कहते हैं। साहित्य जगत से उनकी स्मृतियां तक खत्म करवा चुके हैं और में पुरुस्कार ले रहा हूँ।

कुछ मेरे स्थाई विरोधी हैं, वो मेरे मरने के अलावा हर तरह के नुकसान होने की कामना करते हैं। उनको मेरे लिखने पढ़ने पर आपत्ति है, उनकी नजरों में में ढपोरशंख हूं, उनकी राय है कि मैं अंग्रेजी के व्यंग्यों को ट्रांसलेट करके ठेलता रहता हूँ। वो मुझे सत्ता पक्ष का विरोधी कहते हैं, वो मुझे वामपंथी कभी समाजवादी कहते हैं। कभी कांग्रेसी कभी भाजपाई कहते हैं। लेकिन अंततः इस मंच पर आकर मैं उनकी गढ़ी छवियों से निजात पा लूंगा, और उनको भी निजात मिलेगी। क्योंकि अब आप, बसपा और दलित चिंतक के रास्ते पाकिस्तानी होना ही रह गया है।

अपनी किताब छपवाने के लिए कई प्रकाशकों के पास गया। कइयों ने आश्वासन दिया। लेकिन उनकी बुद्धि का प्रकाश मुझतक पहुंच नहीं पाया। वो समझते थे मै थोड़ा कड़वा लिखता, हो सकता है कोई उनकी क़िताबों की फैक्टरी पर कोई घात लगाकर हमला कर दे। उनकी किताबों का बायकाट ही न कर दे। कोई सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ जहर न थूंकने लगे। या उनके यहां इनकम टैक्स का छापा ही पड़ जाए। वो मुझसे टमाटर की सब्जी और उसके देशी उपचार पर टीकाएँ लिखने की अपेक्षा कर रहे थे। वो मुझसे आउट ऑफ बॉक्स आइडिया चाहते थे, जैसे में कद्दू की सफल खेती पर व्यंग्य लिखूं। ऐसा नहीं कि मैंने कोशिश नहीं कि मैं टमाटर के बारे में लिखता तो उसमें टमाटर किसानों की बर्बादी दिखाई देने लगती और उपचार पर लिखता तो स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल व्यवस्थाएं सामने आ जाती । उससे टमाटर का खूबसूरत चटख लाल रंग जख्मों से रिसते लहुँ जैसा हो जाता। युवाओं पर लिखता तो उनकी बेरोजगारी और बेचारगी सामने आ जाती। लेकिन अब मैं खुश हूँ, की उनकी परेशानी टल गयी और मुझे मान्यता मिल गयी।
इस पुरुस्कार के लिए मैं  ज्यूरी को साधुवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने साहित्य के अथाह सागर में गोते लगाकर मुझ जैसे हीरे को खोज निकाला। मैं बचपन से ही प्रतिभाशाली था, कभी कभी तो मेरे गुरु मेरे बारे में सोचते कि इस महान बालक को क्या पढ़ाना, सो वे मुझे दूसरे फालतू कामों में लगा देते, वहां मैं उन कामों में उलझा, यहाँ तीस-चालीस बच्चों का भविष्य संभल गया। वैसे उन्होंने आजतक कोई तीर नहीं मारा, पर उनके ऊपर मेरा अहसान तो हो ही गया। आज मुझे इस मंच से पुरुस्कार लेते हुए देख वे ये जरूर ये सोच रहे होंगे, कि इस भोंदू का जीवन संवर गया। अब आज से साहित्यिक जगत में व्यंग्य के एक धूमकेतु का उदय हुआ है। जो कई दशकों तक चमकता रहेगा। अब मैं पेड़, पत्थर, आकाश, पानी, दानी, नेतागिरी, चमचागिरी सब पर व्यंग्य ठेलूँगा। इस दौर में लिखना एक बड़ी चुनोती है, लेकिन मैं पुरुस्कारों के लिए लिखूंगा। मेरे व्यंग्य पढ़ने के लिए कभी भी आधार पंजीयन की जरूरत नहीं पड़ेगी। बस आपको बुराई करने या कमी निकालने का कोई अधिकार नहीं होगा। अगर आप ऐसा करते पाए गए तो मेरी सोशल मीडिया टीम के लौंडे आपको तरह तरह से नवाजेंगे।
और हाँ, अगले किसी पुरुस्कार के लिए अगर मुझे नामांकित करने का अगर कोई सोच रहे हों, तो मुझसे फिर से शॉल श्रीफल लेकर आने की अपेक्षा न रखें। भारत माता की जय

आगे आप सोचिये, मैं तो चला सब्जी लेने....जय जय

Wednesday, August 15, 2018

प्रिय पाकिस्तान !!!

(संजीव परसाई) रामसिंग धड़धड़ाते हुए कमरे में घुसा। इतना बलबला रहा था कि जोश उसके थूथन से लार बनकर टपक रहा था। गमछे से अपने सवा हाथ के मुंह को साफ करते हुए बोला - सुना भैया आपने, आज तो इंडिया ने खुश कर दिया। मैने उसे करेक्ट करते हुए कहा - पगलैट ये हमारा देश है, ये हमें हर हाल में खुश रखता है। बाकी सरकार है जो हमसे हमारी खुशी का हिसाब तरह तरह के टैक्स वसूल करके लेती है। तुझे क्या लड्डू मिल गए सो अलग से खुश हो रहा है।

अरे नहीं भैया, आप ने गलत ट्रेक पकड़ ली, मेरा वो मतलब नहीं था, मैं तो आज के मैच की बात कर रहा था। आज इंडिया ने पाकिस्तान को नेस्तनाबूद कर दिया। ऐसा हाहाकार मचाया है, कि पाकिस्तानियों को तो हगना लग गया होगा। भैया आज तो लड्डू बांटना बनता है 

असल में रामसिंग फालतू जज्बाती आदमी है, उसके लिए देशभक्ति पाकिस्तान को मटियामेट करने तक सीमित है। देश में ऐसे लाखों रामसिंग बिखरे पड़े हैं जो पाकिस्तान को कोसकर अपनी देशभक्ति साबित करने को आतुर हैं। जब उनसे देश के लोगों की हालत, किसानों, सैनिकों, मजदूरों, बेरोजगारों की हालत पर चर्चा करो तो बिखर जाते हैं। 

राजनीति ने पाकिस्तान को चूर्ण की पुड़िया बना कर रखा है, जिसे फांक कर देशभक्ति के नशे में डूबा जा सकता है। 

हम बैल गति को प्राप्त हो चुके हैं, हमें जहां हांका जाता है हम वहीं अपनी गर्दन मटकाते, पूंछ हिलाते हुए चल देते है। बैल स्वरूप में गो वंश के प्रतिनिधि होकर हम खुश भी हो जाते हैं।

पहले हम प्रायः साल में दो बार देशभक्ति से सराबोर होते थे, अब हम प्रतिदिन प्रतिक्षण होते हैं, देशभक्ति न हुई टैक्स हो गया, जो आपका गुसलखाने में भी पीछा नहीं छोड़ेगा। हमारे सिर्फ दो राष्ट्रीय पर्व हैं, इनके अलावा हमें देशभक्ति बघारने के अवसर समझ में नहीं आते हैं। ये बढ़िया हो कि हर हफ्ते एक दिन ऐसा तय किया जाए जो सिर्फ सुबह से शाम तक देशभक्ति दिखाने के ही काम आए। देश के कुछ छोटे मोटे लोग रोजमर्रा के काम में देशभक्ति दिखाते हैं, वे सारे काम सही प्रकार से करते हैं। वो कोई देशभक्ति कि किसी नौटंकी में शामिल नहीं होते, वे अपना योगदान ईमानदारी और समर्पण के रूप में देते हैं । बाकी इन सब से बहुत ऊपर हैं, हम पाकिस्तान की मट्टी पलीत होने की खबर से ही खुश हो जाते हैं। आजकल पाकिस्तानी कम पड़ रहे हैं तो हम देश में ही पाकिस्तानी और देशद्रोही तलाश रहे हैं पहले किसी को देशद्रोही कह दो तो उसके तन-बदन में आग लग जाती थी, अब लोग हँसते हैं। अगर हमें पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था चौपट होने की कोई झूठी खबर ही सुना दे तो हम अपनी दिनों दिन पतली होती माली हालत का गम भूलकर, दुश्मन की खात्मे के जश्न में डूब ही जाते हैं। वहां बेरोजगारों और भिखमंगों की फौज देखकर अपने देश के बेरोजगारों को सांत्वना देने लगते हैं। पाकिस्तान में हो रहे बलात्कारों के व्हाट्सअप मैसेज शेयर करके देश में महिलाओं और बच्चियों के नरक होते जीवन पर पर्दा दाल देते हैं। एक राष्ट्रभक्त मिल गया कहने लगा भैया, पाकिस्तान में धर्म के खिलाफ बोलने वाले को जेल में डाल देते हैं और मुंडी काट देते हैं। अपने यहां तो लोग हिन्दू धर्म को मजाक बना कर रख दिये है। मैंने कहा - चल तू और मैं दोनों मिलकर इस देश को पाकिस्तान बनाते है, तो कहने लगा - नहीं मैं तो यूँ ही कह रहा था 
पार्ट टाइम और भाड़े के देशभक्त पगडण्डी से पाकिस्तान या दूसरे खाड़ी देशों की रवायतें भारत में लाना चाहते हैं, क्योंकि ये लोकतंत्र की मलाई चाट चाट के अपना हाजमा खराब कर बैठे हैं। अब ये उस जहर को दवा के रूप में परोसना चाह रहे हैं । इनको उम्मीद है कि ये जहर उनके मनमुताबिक या तो मार देगा या मानसिक विकलांग कर देगा  
साल के दो दिन देशभक्ति का ढोंग करने वाले देश के किसानों, मजदूरों, गरीबों, मजलूमों के नाम पर सोशल मीडिया पर अपना मल-मूत्र विसर्जित कर रहे हैं, और भाड़े के फ़ॉलोवर उसको लाइक और शेयर करके देश के विकास में अपना योगदान दे रहे हैं जिस देश में मजलूमों के साथ थोक में बर्बरता हो रही हो, उस देश के सभ्य समाज के लिए जरुरी है कि वे अपना समय गोबर, कंडे, नेताओं की बकवास, जात-पांत, हिन्दू-मुसलमान और अपने नेताओं की चमचागिरी में ही लगायें नहीं तो शर्म से गड़ने के सिवा उनके पास कोई चारा नहीं होगा इस लिहाज से मुझे पाकिस्तान प्रिय है क्योंकि वो हमें साल में पांच-दस बार शर्म से डूब मरने से बचा लेता है। 
रामसिंग अब तक अपने चेहरे से लार साफ कर चुका था, उसकी मनोदशा को पढ़कर मैंने कहा – बोल रामसिंग, भारत माता की जय, वंदेमातरम्, स्वतंत्रता दिवस अमर रहे....उसने गमछा उठाया और चल दिया। मैंने पीछे से कहा - अबे लड्डू तो खाता जा, उसने पलट के भी नहीं देखा

Thursday, August 9, 2018

अभूतपूर्व,अभिनव, क्रांतिकारी...


(संजीव परसाई) प्रशासनिक भवन की लिफ्ट में घुसते हुए मंत्री जी सोच रहे थे कि आखिर ये चुनाव की वैतरणी कैसे पर होगी। इतने काम किये लेकिन लोगों की भिखमंगाई में कुछ खास बदलाव नहीं आया। जब देखो कुछ न कुछ मांगते रहते हैं। रोजगार तो मिला नहीं उल्टे लोग निकम्मे हों गये और सरकार को गालियां देने लगे। न सड़कें बनीं न गड्ढे भरे गए, एन चुनावी सीजन में सड़कों में बने क्यूट से छोटे बड़े गड्ढे मुंह चिढा रहे हैं। लाला कमान अलग दबाव बना रहा है।
चिन्ता में मगन होकर लिफ्ट से सीधे धड़धड़ाते हुए अपने 5 स्टार ऑफिस में समा गए। पीए को निर्देश दिया कि किसी को अंदर न आने दिया जाए, उसने बिना कॉमा फुलस्टॉप विस्मयादि बोधक के जी सर कहकर निर्देश को अंगीकृत कर लिया।
लेकिन समस्या अब भी वही थी, बैचेन जनता, सिर पे सवार लाला कमान, अहसान फरामोश पार्टी कार्यकर्ता, अविश्वसनीय अधिकारी कर्मचारी, और धैर्य विहीन मीडिया से कैसे निपटा जाए। उनका मंथन खत्म ही नहीं हो रहा था। चुनावी साल में उनको अपनी कुर्सी हिलती दिख रही थी। सहारे के नाम पर दूर दूर तक कोई नहीं दिख रहा था। जिन अधिकारियों के इशारे पर वे फाइलों पर दस्तखत किया करते थे, वे अब उनसे कन्नी काटने लगे। चुपचाप निर्देशों का पालन करने वाले अब कायदों और नियमों का हवाला देकर फाइलें अटका रहे थे। कायदों के जाल में फंसे मंत्री अपने आप को हताश पा रहे। भारत के राजनीतिज्ञों को दुनिया में सबसे अनोखा माना जाता है। क्योंकि वे एक तो सफेद झूठ बोलने में माहिर हैं वहीं दूसरी ओर पूरी तरह से कीचड़ में सराबोर होने पर भी सफेद झक्क होने का ढोंग कर सकते हैं। अब जब लत्ते लगे पड़े हों तो बेफिक्र दिखाई देना भी एक चुनोती है। सो मंत्री जी ने घंटी बजाके पीए को बुलाया और उसे किसी अनकहे काम के लिए जोरदार डाँट लगाई। टुकड़ों पर पल रहे चाकर को हड़काने से उनका आत्मविश्वास वापस लौटा। एक गिलास पानी, एक चाय और चार इंच लंबी सिगरेट के साथ वे मैदान में वापसी के तरीके सोचने लगे। अब जैसे ही उनका खुद पर विश्वास स्थापित हुआ, सो फिर घंटी दबा दी। ओएसडी  साहब को बुलाओ, और दरवाजा जी सर की आवाज से बंद हो गया।
हाथ में एक दस पन्ने का राइटिंग पेड दबाए, मुंह से हैं हैं करते ओएसडी ने प्रवेश किया। आते ही रिंगटोन की तरह बजने लगे। सर वो उनको फोन करके सब कुछ समझा दिया है, आदमी निकल चुका है, आता ही होगा। पर सर वो दूसरा वाला थोड़ा मुश्किल कर रहा है, लेकिन मैं उसे मैनेज कर लूंगा। सर आपने बुलाया था, कोई आदेश।
मंत्री जी हाथों की उंगलियों को एक दूसरे में फंसा के बोले - चुनाव सिर पर हैं, क्या उपलब्धियां है, जो इस बावली जनता को दिखानी हैं। सर वो ही है सब आप तो जानते हैं, सड़क बनाई थी सो टूट गयी, पुल पुलिया बनाये थे, वो बर्बाद हो रहे हैं, बिजली कभी आती है कभी जाती है। लोगों की नॉकरियाँ छूट रही हैं, सो नए रोजगार की बात किसी काम की नहीं है। सर, ऐसा करते हैं अब जनता को आईटी दिखा देंगे सर। किसी को कुछ पल्ले ही न पड़ेगा। फिर जैसा आप कहें। आप कहें तो खेती किसानी में विकास के आंकड़े दिख दें । ओएसडी को घूरते हुए मंत्री जी ने कुर्सी पर शरीर को हल्का सा तिरछा किया, सो एक अजीब सी दुर्गंध पूरे कमरे में फैल गई।
हालांकि इस दुर्गंध की ओएसडी को आदत पड़ चुकी थी, पर ये पहले से अधिक भयानक थी, उसे बेहोशी छाने लगी। असहज स्थिति को भांपकर मंत्री ने बात बदल दी। कुछ अनोखा, अभिनव और क्रांतिकारी होना चाहिए, लोगों और मीडिया को अपील करता है।
सर ऐसा करते हैं, कि जो भी भला बुरा किया है, उन सभी कामों में अभूतपूर्व, अविस्मरणीय और ऐतिहासिक शब्द जोड़े देते है। अब कुछ नया तो हो नहीं सकता है, आप भी जानते है। एक यात्रा निकालकर ये बात जनता को बताएंगे, कि को भी हुआ था वो असल में अभूतपूर्व और क्रांतिकारी था। हल्की सी मुस्कान के साथ मंत्री जी फिर तिरछे होने लगे। ओएसडी मौका देखकर निकल गया। अब चुनाव तक हर काम ऐतिहासिक होगा, हर निर्णय क्रांतिकारी, अभूतपूर्व और सरकार अविस्मरणीय होगी।

Wednesday, August 8, 2018

द कंसल्टेंट - ए मिस्ट्री विथ नो हिस्ट्री

(संजीव परसाई) लड़का गले में लैपटॉप टांगे रेगिस्तान में भागे जा रहा था। चारों ओर घने अंधेरे और सनसनाती हुई हवाओं ने माहौल को और भयावह बना दिया था। पसीना पसीना हो चुका था, रुककर चारों ओर देखता और फिर दौड़ पड़ता। अचानक मोबाइल पर टिंग टोंग की आवाज ने उसे चौकाया, देखा तो बैंक से सैलरी क्रेडिट हुई है, वो हौले से मुस्कुराया और फिर दोगुनी ताकत से दौड़ पड़ा। उसे अपनी दौड़ का कहीं कोई अंत समझ नहीं आ रहा था, लेकिन फिर भी पूरी शिद्दत से भागे चला जा रहा था। सामने देखा कि कहीं से कोई रोशनी नजर आ रही थी। वो एक पल फिर रुका और रोशनी की ओर दौड़ पड़ा। लेकिन उसने देखा कि वो रोशनी उससे और दूर होते जा रही है। वो रुककर अपने अंतहीन रास्ते के बारे में सोचने लगा, थक कर चूर हो चुके पैरों को अपने ही हाथों से दबाने लगा। उसका पसीना नाक के सहारे जैसे ही जमीन पर गिरा, अचानक धरती फटी, बिजली चमकी और भगवान प्रकट हो गए।
वो आंखें फाड़े ये मंजर देखता रहा, वो शानदार मुकुट, डार्क  ब्ल्यू ब्लेज़र, एप्पल लैपटॉप, दूसरे में आईफोन, तीसरे में किंडल और चौथे से मुफ्त का डाटा रूपी आर्शीवाद बरसाते भगवान को देखकर मंत्रमुग्ध हो गया। भगवान ने अपनी मोहक मुस्कान से पूछा - वत्स तुम कौन हो, और इस तरह कहाँ भागे जा रहे हो। लड़का कहने लगा - भगवान मैं, एक कंसल्टेंट हूँ।
एक पल को भगवान भी चकरा गये। ये कंसल्टेंट कौन होता है, जरा विस्तार से बताओ। लड़का बताने लगा - सलाहकार होता है, भगवन, ये आज की सबसे बड़ी खोज है। आजकल काबिल लोगों को फांसने के लिए इसी शब्द का उपयोग किया जाता है, ये प्राणी प्रायः अपना जमीर साथ लेकर नहीं चलता है । वो इस संसार का ऐसा एम्प्लोई है, जिसको उसका एम्प्लॉयर और क्लाइंट दोनों ही नहीं अपनाते हैं।

भगवान अचरज से टोकते हुए बोले -वत्स ये क्लाइंट किस बला का नाम है? भगवन आप समझे नहीं जब एक काम को दो लोग मिलकर करते हैं तो उनमें से एक क्लाइंट होता है और वेंडर और वेंडर ही एम्प्लायर होता है । अब भगवान के माथे पर सलवटें ना शुरू हो गईं। वत्स, जहाँ तक मेरी समझ है जब एक लक्ष्य को दो लोग मिलकर प्राप्त करने का प्रयास करते हैं उसे तो पार्टनरशिप कहते हैं। कंसल्टेंट ठठाकर हंस दिया, बोला - भगवन आप वाकई भगवन हैं, बिलकुल भोले, ये सब इस दुनिया में नहीं होता. यहाँ तो बस यही चलता है।
फिर संभलकर बोला - भगवन, ये जो क्लाइंट होता है, न बस काम चाहता है, जिम्मेदारी से दूर भागता है। उसे बस के ऐसे आदमी चाहिए जो जैसा भी काम हो, उसे बिना ना नुकर के करने बैठ जाये और कोई समस्या न गिनाए। मौके पर गालियाँ भी खा ले और उफ भी न करे। वैसे भी आजकल काम के लोग हर किसी आलतू फालतू जगह काम करने तो जाते नहीं हैं, सो एडवाइजरी फर्म  के माध्यम से काबिल लोगों को फांस लिया जाता है। कंपनी प्रॉफिट देखती है, और क्लाइंट बिना टेंशन का काम देखता है, जिसमें न तो लोगों की सीधे हायरिंग करनी है न एचआर है, न कोई भविष्य कि जिम्मेदारी.....
सुनकर भगवान का दिमाग चक्कर खाने लगा। बोले - वत्स, तुम ये किस प्रकार के प्राणियों की बात कर रहे हो, हमने तो ऐसा मानव बनाया ही नहीं था। जी, भगवन, आपने नहीं ये ग्लोबलाइजेशन ने बनाया है, ये मात्र प्राणी नहीं है, प्राणियों की टीम है जो सिर्फ काम का क्रेडिट लेने के लिए बनाई जाती है। वो क्षण भर में भगवान की तरह व्यवहार करने लगता है । भगवान हैरत से आँखें घुमाते हुए बोले - क्या कह रहे हो, वत्स। क्या वो वाकई में भगवान होता है, जिसे तुम क्लाइंट कह रहे हो।

नहीं भगवान, है तो वो बस एक कमजोर हृदय का प्राणी, पर उसे बीच बीच में दौरे आते हैं, भगवान होने के। उसे क्वालिटी का अर्थ नहीं मालूम लेकिन इसके लिए अड़ जाता है। वो बच्चे पैदा करने के लिए भी एडवांस सॉफ्टवेयर की बात करता है। वो लोगों के पर्सनल डाटा के साथ उनकी साँसों को भी एनालिटिक्स में चाहता है, टेक्नोलॉजी के नाम पर नित नए रार करता है। जो उसने सालों से नहीं किया, उसे वो एक दिन में चाहता है। हफ्ते में एक बार बिल रोकने को धमकी भी परोक्ष रूप में दे ही देता है। भगवान आश्चर्य से बोले -ओ हो वत्स ये तो धंधे का चक्कर है। ये टेंडर से जुड़ा मसला तो नहीं है कहीं। लड़के ने हाँ में सिर हिलाया तो भगवान गंभीर मुद्रा में बोले  - वत्स, हम भी इसी के जले हुए हैं, हमारे यहाँ भी हमने जीवन-मृत्यु और धर्म-कर्म के डाटा का रियल टाइम डाटा फ्रेमवर्क बनाने के लिए एक टेंडर किया था। आइडिया ये था कि लोगों कि उम्र और आधार को इससे लिंक कर दें, जो यमराज के सेक्शन का लोड थोड़ा कम हो जायेगा। लेकिन सारे देवता अपनी अपनी बिजिनेस लाइन के डाटा का कंट्रोल मांगते हुए, आपस में उलझ गए तो हमें टेंडर टालना पड़ा। तुम हमारी मदद करोगे क्या वत्स इस टेंडर में । कर तो दूंगा सर, लेकिन मेरे कम्पनी पार्टनर को एक रिक्वेस्ट लेटर लगेगा, फिर रिसोर्स कॉस्टिंग करके आपको इन्फॉर्म करूँगा। इसके  साथ ही वो धूलभरे लैपटॉप बैग में से लैपटॉप निकालकर जमीं पर बैठ गया और भगवान् को भी अपने पास बैठाकर कम्पनी की सिमिलर प्रोजेक्ट परफोर्मेंस और ग्लोबल प्रेजेंस समझाने लगा । इस हालत में भी उसे बिजिनेस के बारे में ही सोचते देख भगवान मुस्कुरा दिए। बोले, वो तो मैं बाद में बताता हूँ, लेकिन वत्स मैं तुम्हारी समस्या समझ गया हूँ, लेकिन टू बी वैरी फ्रेंक,  इस मामले में तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता। लेकिन ये बताओ तुम भाग कहाँ रहे थे?
अरे भगवन, मुझे क्लाइंट ने बोला तुम्हें बस दौड़ना है, मैंने बॉस को बताया कि दौड़ने का प्रोजेक्ट है। फिर बॉस और क्लाइंट, दोनों ने मिलकर तय किया कि सामने जो लाइट दिख रही है न, आपको वहां तक दौड़ना है, सो मैं दौड़ने लगा। भगवान बोले - पर उस लाइट के पास क्या है?
वो मैं नहीं जानता भगवन, मुझे तो बस दौड़ना है। बॉस ने कहा है कि जब में उस लाइट तक पहुंच जाऊंगा तब मेरा प्रमोशन होगा। अब चलता हूँ, आपके चक्कर में लेट हो गया वो देखो बॉस का फोन भी आ रहा है...

सर आया , बस अभी आया सर....

पीछे से पत्नी बोली, जल्दी उठो, तुम तो बोल रहे थे कि आज कोई मीटिंग है...जल्दी तैयार हो जाओ तुम्हारे बॉस का फ़ोन भी आ रहा है। वो बैड से उचक कर सीधा बाथरूम में जा गिरा।

Monday, June 11, 2018

पूंजीवादी जगमग और राग दरबारी

(संजीव परसाई) व्यंग्यकार वैसे तो कहीं ज्यादा आता जाता नहीं है, लेकिन प्रयासरत रहता है कि कम से कम लोग उसे बुलाएं तो। इस प्रकार उसका ईगो बना रहेगा और लोगों का भ्रम भी। भोपाल में राग-दरबारी के पचास साल पूरे होने पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा एक गरिमामय कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें मशहूर व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी को बतौर मुख्य वक्ता बुलाया गया। मंच पर उन्हें दो हजार वॉट का लाईट के ठीक सामने बिठा दिया गया, ताकि उनका व्यक्तित्व जगमगाता रहे। ये मंच को  समाजवादी से पूंजीवादी में बदलने का सामाजिक प्रयास था। उनकी आँखें चौंधियाने लगीं, लगा कि शायद कोई शरारती उनके सरोकारी होने की परीक्षा ले रहा है। हालांकि मंच पर ही उनके आजू-बाजू में बैठे दूसरे साहित्यकार मजे से इस पूंजीवादी जगमग का आनंद ले रहे थे, शायद इसिलिए कि वो व्यंग्यकार नहीं थे। मेरे बगल में बैठा रामसिंग कहने लगा – भैया, देखो तो दाल-रोटी खाने वाले पंडत का चेहरा कैसे दमक रहा है। मैंने जोड़ा – न रे..ये उन मुस्कुराहटों और कहकहों की चमक है जो इन्होने लूटे है, रामसिंग भंवें सिकोड़ कर मेरा चेहरा देखने लगा। हेलोजन लाईट में चमचमाता ज्ञान जी का व्यक्तित्व इस आरोप को काट रहा था कि इण्डिया में बड़ा व्यंग्यकार होने के लिए धूप में बाल सफ़ेद करने पड़ते हैं।
ज्ञान जी के चेहरे पर आ-जा रहे भाव उनकी मनोदशा को व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने मंच पर अपना पूरा समय ये सोचने में गुजारा कि श्रीलाल शुक्ल जी ने ये किताब आखिर लिखी ही क्यों होगी, उनका गुस्सा राजकमल प्रकाशन पर भी होगा, जिन्होंने इस किताब को छापा। वे सोच रहे थे क्या शिवपाल गंज के किस्से में इस हैलोजन का जिक्र भी कहीं किया है या नहीं। जैसे की सत्य के अनेक पहलु होते हैं, उसी तरह वे हेलोजेन लाईट के भी अनेक पहलुओं के बारे में सोचने लगे। वे आयोजक को वैध जी और खुद को रुप्पन बाबु मानकर अपने आसपास बद्री अग्रवाल, रंगनाथ, प्रिंसिपल, खन्ना, जोगनाथ और सनीचर को महसूस कर रहे थे। सामने बैठा जन समुदाय उनको लंगड़ दिखाई दे रहा था। आने जाने वाले वक्ता उनके गंभीर चेहरे को देखकर और ज्यादा समय लेने के लिए बेताब थे, पर वे अन्दर ही अन्दर उनसे रहम की भीख मांग रहे थे। हिन्दी का लेखक न तो तेज रोशनी का आदी है न ही व अपनी रोशनी दिखा पाता है सो जल्दी असहज हो जाता है। वैसे तो व्यंग्यकार व्यवस्था से चुहल करने के लिए जाना जाता है, लेकिन यहां मसला आयोजन की व्यवस्था का था। टेंट वाले की बुद्धिमत्ता से एक समाजवादी व्यंग्यकार पूंजीवाद का स्वाद चख पाया, वरना ये सुख उनको कहां नसीब होना था। समय इन बड़े लाइटों का है, लाईट विहीन या कम लाईट के लोगों की कोई औकात ही नहीं रही।
ज्ञान जी ने मंच पर पासंग बिराजे पड़ौसी से इस बारे में जिक्र किया, लेकिन उनको लगा कि कहीं उनको ही स्टूल पर चढ़कर बदलना न पड़े, सो उन्होंने ज्ञान जी की आगामी किताब पर चर्चा शुरू कर दी। इस मुददे पर कितना ही बड़ा लेखक क्यों न हो लरज जाता है। सो उन्होंने इस समस्या को चूल्हे में डाल, चूल्हे जैसी गर्मी में बैठना स्वीकार कर लिया। उन्होंने अपने सामने रखा एक कागज उठाकर चेहरे पर लगा लिया, सो फोटोग्राफर चेहरा दिखाने की मनुहार करने लगा। अब व्यंग्यकार का जो फोटो खिचना शुरू हुआ तो बंद होने का नाम  ही नहीं ले रहा, फ्लैश की लाइटों ने उन्हें रूसी  क्रांति पर लिखे गए नाटकों और रूजवेल्ट द्वारा अदालतों का मटियामैट करने की कोशिशों पर लिखे आलेखों का मिक्स तैयार कर दिया। सामान्यतौर पर इस प्रकार के सीमित बजट के आयोजनों में एक आध बार लाइट चली जाती है या लाइट ही खराब हो जाता है, चूंकि व्यंग्यकार का मामला  था, सो लाइट भी नहीं गई। इस दौरान उन्हें सरकार पर किए कटाक्ष याद आए, शायद बिजली विभाग ने अपना  बदला  लिया है। उन्होंने अपने चेहरे को घुमाकर बैठने की कोशिश भी की लेकिन लाईट देश की हुकूमत की तरह था, जो हर तरफ से आपको दबोचने के लिए बेताब है। जब लेखक मुंह घुमाकर बैठने लगे तो तय समझो की उसकी राज्यसभा में भेजे जाने की बात हो गई है । सो वे सतर्क होकर सीधे बैठ गए। कालांतर में अपने हाथ को ही जगन्नाथ मानकर कभी दाएं कभी बाएं करते रहे। वे मन में सोचने लगे कि शायद व्यंग्यकार को भी इसी गर्मी में तपकर शीर्ष व्यंग्यकार का दर्जा प्राप्त होता हो, सो मन मारकर पॉजिटिव सोचने लगे। उधर सारे लंगड़ सोच रहे थे की इस प्रकार के आयोजन में चाय समोसे की बजाय पेस्ट्री, पेटिस और केक मिलना चाहिए। उधर ज्ञान जी के दमकते चेहरे से ये साफ नहीं हो पा रहा था कि ये उनके दिव्य व्यक्तित्व का प्रभाव था या उनके अंदर घुमड़ते बारामासी के संवादों का। आयोजक भले मानस थे, सो बस झेलना ही है। जैसे ही प्रोग्राम ख़तम हुआ सबसे पहले ज्ञान जी हॉल से निकलकर बाहर खड़े हो गए। उनके पीछे निकले सारे लंगड़ उन्हें घेरकर भीड़ की शक्ल में ऐसे खड़े हो गए जैसे चौराहे पर कोई एक्सीडेंट हो गया हो, वे अपने सफ़ेद रुमाल से पसीना पोंछते रहे।

Friday, June 8, 2018

pungibaaj: व्हाट्स एप ग्रुप पर ठेला -ठाली

pungibaaj: व्हाट्स एप ग्रुप पर ठेला -ठाली: (संजीव परसाई) रम्मू,फत्तू, गोलू और किसन चारों दोस्त नहीं थे, उनका बस एक नाता था कि वे रोज सुबह मैदान में हलके होने साथ साथ जाते थे. स्वाभा...