Thursday, January 19, 2017

कुर्ते की फटी जेबें और लोकतंत्र


(संजीव परसाई) नेताजी भरी सभा में इमोशनल हो गए। भाषण देते देते डायस से सरक कर बाहर आ गए और पब्लिक को अपने कुर्ते की फटी जेब दिखाने लगे। कहने लगे, देख लो मेरी तो जेब ही फटी पड़ी है और एक वो हैं जो लाखों के सूट पहनते हैं। समर्थकों ने जयकारा लगाया, कार्यकर्ताओं में जोश आया , सब अपनी जेब फाड़ने लगे। मैंने रामकरण से कहा तुम भी फाड़ लो शायद इसी बहाने तुम्हारा भी कल्याण हो जाए। कहने लगा- भैया अपनी तो पहले से ही फटी पड़ी है, बस उनको दिखानी पड़ती है अपनी तो सबको पता है।

जैसे-जैसे समर्थकों को पता चलते गया हर एक अपनी जेबें फाड़ने लगा। नेता मतदाता के सामने जाकर अपने कुर्ते की जेब में हाथ डालते, फटी जेब से हाथ निकालकर दिखाते। लोग खुश होते तालियां बजाते, नेता जी से पूछते कि बाबूसाब ये जेब मौज में फटी या मजबूरी में। बाबूसाब खी खी करके आगे निकल जाते। बीबियां पूछतीं ये रोज-रोज जेबें फाड़ कर ला रहे हो ऐसा कब तक चलेगा। वे आश्वासन देते कि अपनी सरकार आने दे भागवान नये कुर्ते सिलवा लेंगे।
कुछ अतिउत्साही अपने कपडे भी फाड़ने लगे और लोगों को अपना उघरा बदन दिखाने लगे, लोगों ने जयकारा लगाया। कुछ ज्यादा जोश में आ गए, दूसरों के कपडे भी फाड़ने लगे हाईकमान को हस्तक्षेप करना पड़ा।
कभी कभी जनता कंफ्यूज हो जाती है कि इस लोकतंत्र की वजह से इनकी जेब फटी है या इनकी फटी जेब की वजह से लोकतंत्र इस हालत में पहुंचा है। हालांकि दोनों सापेक्ष हैं, सत्ताधारी की जेब कभी नहीं फटती, न ही उसे दिखाने की जरुरत होती, सत्ता में रहकर कोई भी दो-पांच लाख के सूट पहन सकता है। सत्ता सुविधा और स्वयं के सरोकारों को साधने का एक उपयुक्त माध्यम है। सत्ता में रहकर असंभव को संभव बनाने की कोशिश की जाती है। अंतिम व्यक्ति के नाम पर जुआ खेल कर धनपतियों को फायदा देने का जुगाड़ किये जाते हैं। इतने सालों में हर सरकार ने गरीब कल्याण की नीति पर चलने की कसम खाई, लेकिन गरीब तो वहीँ रहा, योजना बनाने और चलाने वाले खूब फले-फुले। सत्ता के बिना फटी जेब दिखाने वाला सत्ता पाने के बाद सबसे पहले अपनी फटी जेब को और कपडा लगवाकर बड़ी गहरी और मजबूत बनवाता है। 
आज लोकतंत्र नेताजी की फटी जेब देख ठहाके लगा रहा है। ये चलन हो गया है कि वोट लेने के लिए फटी जेब दिखाओ, सेवा करने की कसमें खाओ, खुद को चौकीदार और सेवादार दिखाओ, लेकिन सत्ता में आकर जनता को आँखें दिखाओ। मैंने रामकरण से पूछा क्या इरादा है, कहने लगा भैया मैं सोच रहा हूँ जब जेब कुछ रखना ही नहीं है तो बिना जेब के कुर्ते सिलवाए जाएँ, कम से कम सस्ते तो पड़ेंगे।

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