Tuesday, July 27, 2010

छाँव की तलाश...


जब भी मैं होता हूँ उदास,
अपनी छाँव में बिठाकर,
कोई प्यार से कहता है,
बेटा धीरज रखो

मैं भूल गया वो स्पर्श,
जिसमें ताकत है मुझे
जी उठाने की,
अपेक्षा बस एक ही है,
बेटा थोड़ी धीरज तो धरो,

मेरी भूल ने मुझे अकेला कर दिया
संघर्ष की ताकत,
वो सुखद अहसास
धीरज धरने की सलाह
बस तेल, बिजली और मरम्मत की जरूरत

मरते हुए अहसास ढूँढ़ते है
वो छाँव, जहां सुकून हो,
जो आइना हो विस्मृत जिन्दगी का
प्यार दे आसरा दे, और दुलार कर पूछे
बेटा कैसे हो.....
संजीव परसाई

2 comments:

राजेन्द्र मीणा said...

मरते हुए अहसास ढूँढ़ते है
वो छाँव, जहां सुकून हो,
जो आइना हो विस्मृत जिन्दगी का
प्यार दे आसरा दे, और दुलार कर पूछे
बेटा कैसे हो.....

मरते हुए अहसास ढूँढ़ते है
वो छाँव, जहां सुकून हो,
जो आइना हो विस्मृत जिन्दगी का
प्यार दे आसरा दे, और दुलार कर पूछे
बेटा कैसे हो.....

नयापन लिए हुए प्रभावशाली रचना ,,,,, संजीव भाई ,,,आपने तो बहुत सुन्दर सृजन किया है ....आपके ब्लॉग की यात्रा पहली बार की ,,,,अच्छा लगा ,,,दोस्त ...! शब्दों की इस सुहाने सफर में आज से मैं भी आपके साथ हूँ ...चलो साथ मिलकर चलते है

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मन के एहसासों को खूबसूरत शब्द दिए हैं