आखिरकार धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो ही गया। लेकिन यह आंदोलन हमारे सामने लोकतांत्रिक यादों के साथ कुछ सवाल भी छोड़ गया। आंदोलन क्या हुआ, समाज, राजनीति और प्रशासन के सारे नकाब एक-एक करके उतर गए। क्या लड़के, क्या आम लोग, नेता, अभिनेता, पुलिस, पत्रकार, 'सिस्टम' और 'कस्टम'—हर कोई बेपर्दा खड़ा नज़र आने लगा।
जिन लड़कों को कल तक घर में माँ से ‘दिन भर मोबाइल में घुसे रहने’ का ताना मिलता था, जो पिता से 'आलसी' होने का सर्टिफिकेट जेब में लिए घूमते थे, वही दुबले-पतले, मोटे चश्मे वाले युवा जब सड़क पर उतरे, तो तस्वीर बदल गई। वे सिर्फ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन ही नहीं कर रहे थे; वे व्यवस्था संभाल रहे थे, धरना स्थल का कचरा बीन रहे थे, घायल साथियों को अस्पताल पहुँचा रहे थे और ज़रूरत पड़ने पर पुलिस को छका भी रहे थे। उनका आंदोलन पारंपरिक नहीं, 'स्मार्ट' था—जहाँ Swiggy और Zomato से खाना ऑर्डर हो रहा था और वहीं से नए-नए नारे गढ़े जा रहे थे। आंदोलन की सबसे सशक्त तस्वीर लड़कियों ने पेश की। इस दौर की लड़कियों ने वो कर दिखाया, जो पहले के दौर में शायद ही कभी देखा गया। वे पुलिस के सामने डटकर खड़ी हुईं, नारे गढ़े, तंज कसे, सरकारी गाड़ियों के आगे दीवार बनकर खड़ी हो गईं और सोशल मीडिया पर सीधे लाइव आकर सिस्टम से सवाल पूछे। उन्होंने स्थापित मानकों को तोड़ते हुए यह साबित कर दिया कि सिस्टम की अकड़ को चुनौती देने में वे किसी से पीछे नहीं हैं।
इस आंदोलन में राजनीति की भूमिका पुराने ढ़र्रे पर ही रही। वही अड़ियल और नाक बचाने की हर कोशिश और भूल को स्वीकार करने से बचने वाला। यह निर्णय समय से भी लिया जा सकता था। लेकिन हमेशा की तरह राजनेता इस बार भी स्थिति का आकलन करने में चूक गए। जब तक वे अपनी रणनीति सोचते, तब तक पानी सिर से ऊपर जा चुका था। वे इस उलझन में फंसे रह गए कि अपना राजनीतिक करियर और राजनीति बचाएं या देश की भावना को समझें। इस आंदोलन ने राजनीति को स्पष्ट संदेश दिया है कि उनके पुराने दांव-पेच अब सिर्फ पुराने ही नहीं, बल्कि पूरी तरह सड़ चुके हैं। नेताओं से तो कहीं बेहतर वे अभिनेता साबित हुए, जिन्होंने बिना किसी झिझक के अपनी बात बेबाकी से जनता के सामने रखी।
'सिस्टम' की अकर्मण्यता और पंगु पुलिस ने सबसे ज्यादा दुखी किया । हमारा प्रशासनिक ढांचा (सिस्टम) भले ही थोड़ा हिला हो, लेकिन उसकी अकड़ और काम करने का सामंती तरीका अब भी वही है। हर बड़े अधिकारी ने अपनी टेबल पर पार्टी का एजेंडा रखा हुआ है। अब नेता से ज्यादा अधिकारी राजनीतिक नफा-नुकसान तौलते हैं। यही कारण है कि गलत फैसले, अधूरे प्रोजेक्ट और सिर्फ मीटिंग दर मीटिंग भागना ही इनकी नीयत बन चुकी है।
रही बात पुलिस की, तो उसने इस दौरान वो सब किया जो एक पेशेवर पुलिस को कभी नहीं करना चाहिए। पारंपरिक नेतृत्व की जंग और राजनीतिक आकाओं के इशारों पर चलने की मजबूरी में संविधान और नियम-कायदों को किनारे रख दिया गया। ऐसा लगता है कि हमारी पुलिस व्यवस्था अब सिर्फ जेबकतरी, छोटी-मोटी चोरी, रॉन्ग पार्किंग, हेलमेट चेकिंग या आम आदमी को दबाने तक ही सीमित रह गई है। निष्पक्षता और संवेदना की जगह पुलिस ने संवैधानिक संरक्षण में सख्त और एकतरफा रवैया अपना लिया है। देश की पुलिस को अब बड़े रिफॉर्म और सेंसिटाइजेशन से गुजारने की जरूरत है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे निराशाजनक भूमिका मुख्यधारा के मीडिया की रही। एसी स्टूडियो में बैठकर नरेटिव गढ़ने वाले और टी पी पर आदेश बजाने वाले 'गोदी एंकर' मैदान से गायब दिखे। प्रायोजित रिपोर्टिंग करने वाले चैनलों को अब यह समझ लेना चाहिए कि जनता सब समझती है। युवा पत्रकारों को भीड़ के गुस्से का सामना करने के लिए आगे धकेलने के बजाय, उन एंकरों को खुद धरातल पर उतरना चाहिए। अब मीडिया की इस एकाधिकारवादी व्यवस्था की जरूरत नहीं रही, क्योंकि युवाओं ने सूचना का तंत्र (मोबाइल) अपने हाथों में ले लिया है। इलेक्ट्रॉनिक समाचार मीडिया अपने अंतिम दौर में है, जिसे बस व्हाट्सएप फारवर्ड से आंखें सूजने के बाद रिटायर्ड लोगों के मनोरंजन का साधन भर बचा है।
यह आंदोलन इतिहास के पन्नों में सफल जरूर दर्ज हो गया, लेकिन इसका सबसे बड़ा हासिल यह है कि इसने हमारी मौजूदा राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक व्यवस्था के खोखलेपन को पूरी तरह उजागर कर दिया है।
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