Wednesday, June 14, 2017

कुत्ता, गड्ढा और पुत्तन - व्यंग्य कथा (अंतिम किश्त)

(संजीव परसाई)

अब तक आपने  पढ़ा ....

पुत्तन कुत्ते को सरे राह पीट रहा था, जैसा कि कस्बों में होता है भीड़ जमा हो गयी, लोगों के पूछने पर भी पुत्तन ये बताने को तैयार नहीं था कि वो आखिर कुत्ते को क्यों पीट रहा है... सुविधा के लिए  प्रथम भाग का लिंक  - http://pungibaaj.blogspot.in/2017/06/blog-post.html 

आगे पढ़िए व्यंग्य कथा कुत्ता, गड्ढा और पुत्तन का दूसरा और अंतिम भाग.....


....भीड़ और मीडिया के जमावड़े को पुत्तन अपनी जीत के रूप में देखकर मन ही मन खुश हो रहा था। मीडिया लाइव फुटेज दिखाने में लगा था लेकिन बाइट नहीं मिलने से चैनलों  का रिपोर्टरों पर दबाव बढ़ता जा रहा था और पुत्तन भाव खा रहा था। एक पत्रकार ने हिम्मत करके कहा कि - आप इस बेजुबान प्राणी पर इतना जुल्म क्यों कर रहे हो। आपको यह अधिकार किसने दिया, पुत्तन तैश में आकर उस पत्रकार की ओर बढा, लेकिन पत्रकार किसी बड़े खतरे को भांपकर चार कदम पीछे हट गया। सो पुत्तन भी मूल लक्ष्य से भटक गये.. कुत्ता हाथ से सटककर भाग-खड़ा हुआ। भीड़ तो जैसे इंतजार ही कर रही थी, कुछ छिछोरे ठठाकर हंस पडे़, यह तो सरासर दबंगई पर चोट थी। पत्रकार को इशारे और आंखों से समझाया कि तुझे देख लूँगा। भीड़ को भी आंखों ही आँखों से देखकर कहा कि ^$$^^&&@@% और दौड़ लगा दी कुत्ते के पीछे। लेकिन अब तक तो देर हो चुकी थी कुत्ता अपने लिये एक सुरक्षित कोने की तलाश कर चुका था।
मीडिया ने पुत्तन के फुटेज दिखा-दिखा कर माहौल में आग लगा दी। सब पुत्तन के इस कृत्य को अमानवीय व अकुत्तनीय बताने में बढ़-चढ़ कर लग गये। राजनीतिक दलों ने कठोर शब्दों में इसकी निंदा की। उन्होंने इसके खिलाफ सरकार से कठोर से कठोर कार्यवाही और जानवरों के विभाग के मंत्री से इस्तीफे की मांग की। उधर मीडिया अभी भी खबर को अधूरी ही मानकर चल रहा था। पुत्तन तो खा खुजाकर लंबलेट हो गये लेकिन मीडिया लगा उन्हें रगड़ने। चैनल वाले अपने रिपोर्टरों को दिल्ली से गरियाने लगे कि उन्हें हर हाल में पुत्तन की बाइट चाहिए। बाइट मिले तो खबर आगे बढे़, दिनभर में वे कुत्ते से लेकर, हर खास-ओ-आम की बाइट चला चुके थे। लेकिन खबर को प्राइम-टाइम तक जिंदा रखने के लिये जरूरी था कि पुत्तन की बाइट हो। सहसा दो दो कौड़ी की प्रेस विज्ञप्ति बनाकर बाँटने वाले और एक सिंगल कॉलम खबर छपने पर हफ्ते भर अखबार कांख में दबाकर घूमने वाले पुत्तन मीडिया की आँख के तारे हो गये, सो लगे डील करने। अब तक वे समझ चुके थे कि मीडिया को उनकी जरूरत है। वे इस जरूरत को अपने लिये अवसर बनाने में अपने रणनीतिकारों से सलाह मांगने लगे। टीवी चैनलों के आउटपुट एडीटरों ने रिपोर्टरों पर दबाव बनाया। वे रिरियाने लगे कि भाई मान जाओ प्राइम-टाइम में हम राष्ट्रीय स्तर के प्रवक्ताओं के साथ बैठा रहे हैं। तुम्हारा कुछ लोकल जुगाड़ भी बनवा देंगे । पुत्तन के सलाहकारों ने सलाह दी कि अगर इस घटना की निंदा मेनका गांधी करें, तो छा जाओगे गुरु। सो प्रस्ताव दिया गया कि पहले इस घटना की निंदा मेनका गांधी से करवाओ। पत्रकार समझ गया कि उसका सामना एक कमीने से हो गया है। ये बात चैनल को समझाना तो मुश्किल था। सो उसने मेनका गांधी के दक्षिणपंथी रूझान की ओर भी ध्यान दिलाया। लेकिन पुत्तन टस से मस न हुए, सो भागम-भाग मची । किच-किच चैनल ने आखिर यह कारनामा कर दिया। मेनका जी ने इस घटना की कठोर शब्दों में निंदा की और कार्यवाही की मांग की।
उधर भीड़ में आए हर-एक का हाजमा खराब था। पुत्तन ने आखिर ऐसा क्यों किया शहर में चर्चा का विषय था। आखिर अपने घर पर ओवी बुलाकर किच-किच न्यूज चैनल पर पुत्तन आये और अपने कृत्य की सफाई पेश की। उन्होंने बताया कि किस तरह वे आज सुबह सफेद झक्क कुर्ता पाजामा पहनकर घर से निकले थे और किस तरह से इस कुत्ते ने उनके बगल वाले गडढे़ में छलांग लगा दी जब वे ठीक गडढे़ के पास थे। उनकी सफाई को चैनल ने 14 ब्रेक लेकर दिखाया और आगे दूसरा भाग भी अगले दिन चलाया।
चार सदस्यीय पैनल ने इस घटना की पुत्तन की मुँह पर ही निंदा की। एक पैनलिस्ट ने प्रति प्रश्न पूछा कि - उस गडढे़ को बनाने में कुत्ते की कोई भूमिका नहीं थी, इसिलिए कुत्ते का इसमें कोई दोष ही नहीं है। दरअसल दोष तो नगर निगम का है, जहाँ सत्ता पक्ष पसरा हुआ है।
दूसरे ने पुत्तन के बहाने सरकार को घेरने का सुझाव दिया।
तीसरे ने इस मुददे पर सरकार की तीखी आलोचना करते हुए प्रधानमंत्री से स्पष्टीकरण की माँग की।
चौथा पैनलिस्ट पढ़ा-लिखा था सो उसने कुत्तों के साथ समाज का व्यवहार और गड्ढों की सामाजिक उपयोगिता पर विस्तृत चर्चा की।
इस  बीच टी.वी. पर टिकर चलने लगा कि पुत्तन के विरोधी दल से संबंध हैं। इसी बीच पत्रकार उस गडढे के जन्म की कहानी भी खोज लाए। उन्होंने गुप्ता जी की बाइट अरेंज की जिनकी लड़की की शादी में उस गडढे़ को भट्टी के रूप में बनाया गया था। गुप्ताजी ने भी उस भट्टी पर बनी गुलाब जामुन व नुक्ती के कसीदे पढे़। सोशल मीडिया पर पक्ष और विपक्ष की मिलीजुली प्रतिक्रियाएं ट्रेल करने लगीं।
मात्र दो दिन में पुत्तन राष्ट्रीय व्यक्तित्व है। जिसे पार्टियां चुनावों अपना प्रत्याशी बनाना चाहेंगी। उसने तय कर लिया कि वह राष्ट्रीय गडढ़ा पार्टी की स्थायी सदस्यता लेगा और गडढ़ों की भलाई के लिए काम करेगा।

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